36- “भगवान” या फिर “विज्ञान”….?

ये “आस्था एवं विश्वास” का विषय है। तर्क द्वारा न तो अभी तक कोई “ईश्वर”(पॉवर ऑफ गॉड) को जान सका है न कभी जान ही पायेगा….जैसे,

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते समय श्री कृष्ण, अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, हे पार्थ ! तराजू पर पैर संभलकर रखियेगा….
अर्थात संतुलन बनाये रखना..
लक्ष्य मछली की “आंख” पर ही केंद्रित हो..इस बात का विशेष खयाल रहे।
तब अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु ” सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे…?
वासुदेव कृष्ण हंसते हुए बोले, हे पार्थ जो आप से नहीं होगा वह मैं करुंगा।
अर्जुन ने कहा प्रभु ऐसा क्या है,जो मैं नहीं कर सकता.. ? ज़रा उसे बता तो दो..

तब वासुदेव ने मुस्कुराते हुए कहा – जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे , उस विचलित “पानी” को क्या तुम स्थिर कर सकोगे उसे तो “मैं” ही स्थिर कर पाऊंगा… !!

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हो जाओ,
कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हो जाओ , कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो…,
लेकिन आप स्वंय हर एक परिस्थिति के ऊपर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकते ..दुनियाँ की समस्त चीज़ों को यथा स्थिति साधना ही तो सच्ची “साधना” है।
आप सिर्फ अपना प्रयास ही तो कर सकते हो..
लेकिन उसकी भी एक सीमा है और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है…कायदे से वही परब्रह्म है। उसी शक्ति..
का दूसरा नाम..”भक्तों” के लिए “भगवान” है, तो “तथ्य-विश्लेषकों” के लिए वही उनका “विज्ञान” है।

Now do you believe in the “POWER” of “GOD” Thanks to all

🙏🏻युग पचहरा,
From : श्री साहब सिंह सदन, नीमगाँव
राया, मथुरा, उत्तर-प्रदेश

2 thoughts on “36- “भगवान” या फिर “विज्ञान”….?”

  1. I think sir, जितना आज के दौर के लिए विज्ञान है उतना ही सनातन धर्म के लिए भगवान हैं ।

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