37-“ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो..”

ज़िन्दगी में… “सदा मुस्कराते रहो …..” क्योंकि जीवन का आनन्द मुस्कराने में ही है। रिसर्च के अनुसार एक बच्चा दिन में लगभग 400 बार मुस्कुराता है। मगर इंसान जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है। न जाने क्यों उसकी प्रसन्नता कम होती चली जाती है।दिन-प्रति दिन उसका चेहरा लटकता ही चला जाता है। क्यों=? ..

क्योंकि
अक्सर देखा गया है कि, होस सम्भालते ही व्यक्ति सांसारिक-व्यवस्था के अंतर्गत ईश्वर से प्राप्त “स्वतंत्र-इच्छा” के हाथों मज़बूर ….जीवन में शॉर्ट-कट अपनाते-अपनाते… असल-ज़िन्दगी की राह से भटकर एक दिन अपनी सामर्थ्य से भी परे… चला जाता है। तो चिंताएं उसे घेर लेती हैं। सांसारिक सोच है। कि “परिस्थितियां” पराई हैं। और “स्थितियां” मेरी अपनी हैं।
महोदय, अगर “जीवन-जीना” है।, तो दिखावटी नहीं उसी “सहज-मुस्कुराहट”.. में वापस आना होगा, और ये दोहरी सोच बदलनी होगी .?

युगों के मुताविक आत्मा की चार अवस्थाएं होती हैं …
No.1 Golden Age
No.2 Silver Age
No.3 Copper Age
No.4 Iron Age
अब हम जिस दौर में हैं ये “आयरन ऐज” है। इसलिए भी संसार में समस्याएं अधिक हैं मगर समस्याओं के बीच “मुस्कराना” ही तो असली “आर्ट ऑफ लिविंग” है। मग़र सब कुछ जानने के बावजूद भी
जीवन को ढोना है। तो बात फिर अलग है।..जीवन में “परीक्षा” माने “प्रभु इच्छा”.. अर्थात ईश्वर मनुष्यों को परीक्षाओं से गुज़ार कर दृढ़-निश्चयी और योग्य-सुयोग्य बनाना चाहता है। मनुष्यों का आत्म-विश्वास बढ़ाना चाहता हैं।इतिहास साक्षी है।जितनी बड़ी “परिस्थिति” उतनी बड़ी “उपलब्धि”। महापुरुषों को पढ लो…
किसी कवि ने इस सुंदर रचना द्वारा इस मंज़र को बड़े अच्छे ढंग से अभिव्यक्त किया है …
” वो पथ क्या, पथिक सफलता क्या….?
जिस पथ पर बिखरे शूल न हों।
नाविक की धैर्य कुशलता क्या…?,
जब धाराएं प्रतिकूल न हों। ”

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। जब प्रतिकूल को आप अपने अथक- प्रयासों, ईश्वरीय कृपा,बड़ों के आशीर्वाद एवं छोटों की दुआओं से अनुकूल बना लेते हैं।, उसके बाद चेहरे पर आने वाली मुस्कराहट की आंतरिक प्रसन्नता को आप शब्दों में बयां अवश्य नहीं कर सकते मग़र लोग आपके “आनंदित भाव” को अच्छी तरह समझ जरूर लेते हैं।

अतः मैं अक्सर कहता हूँ कि, “मुस्कराहट के बिना “मुख” खिलता नहीं, सच्चे-ज्ञान के बिना जीवन में सुख मिलता नहीं।” इसीलिए तो मेरे भाई..! “चेहरे” की सच्ची सुंदरता “मेक-अप” में नहीं “मुस्कराहट” में छुपी है। अतएव

“ज़िन्दगी.. में सदा..मुस्कुराते.. रहो…”
धन्यवाद

युग पचहरा,
रेजिडेंस ; पचहरा-हाउस , 88A वसुंन्धरापुरम, निकट बाई-पास, हाथरस

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