(प्रबुद्ध-साथियो ! ये मेरे ही ब्लॉग No -30 Be just with “Roles” का हिन्दी वरजन है..No 33-“भूमिकाओं” के साथ न्याय-संगत हों।)
दक्षिण भारत के महाकवि श्री कम्ब द्वारा रचित तमिल भाषा में एक राम-कथा है, “रामवतारम” जिसमें एक बहुत ही “विचित्र-प्रसंग” है, जो महर्षि वाल्मीकि व श्रीतुलसी-कृत राम-कथाओं (रामायण) में ऐसा नहीं मिलता है। मुझे तो लगता है..ये कविवर “कम्ब” की अपनी लेखनी का सही सन्तुलन है। इसीलिए ‘राम-रावण’ की चरित्र लीलाओं का वर्णन करने में दोनों के गुण-दोषों के बीच एक सही संश्लेषण बनाते हुए लिखा है।
वैसे ये सही यूं भी है क्योंकि सभी ग्रँथ आने वाली पीढियों के लिए एक “आदर्श-पुस्तक” के रूप में तो होते ही हैं। अनावश्यक बड़ा-चढ़ा कर उसे पूरी तरह अधर्म के मार्ग पर चलने वाले “फ़िल्मी खलनायक” जैसा पेश करने से कहानी में रोचकता (ट्विस्ट) तो बढ़ जाती है, जो दर्शक व स्रोताओं की भीड़ भी जुटाने में भी सहायक होती है। मगर देखा जाए,तो एक चरित्र-कलाकार के साथ अन्याय हो जाता है।
और दूसरी बात ये भी है कि, लेखक उसे फिर कितना भी विद्वान व प्रकांड क्यों न बताये, लोगों के दिलों में उस पात्र को वो जगह मिल नहीं सकती, जिसका वो हकदार होता है।
किसी भी पात्र के गुण-दोषों का असंतुलन सदैव “लेखक व रचनाकार” को जनता की अदालत में सवालों के घेरे में, तो ला कर खड़ा कर ही देता है।
मग़र कम्ब जी ने अपनी रचना “रामअवतारम” में रावण के माध्यम से व्यक्ति को अपने जीवन में जीने वाली विभिन्न “भूमिकाओं” के प्रति पूर्ण ईमानदार होने का एक बहुत सुंदर पाठ पढ़ाने का प्रयास तो किया ही है।
मेरे विचार से आज के दौर में न केवल ये प्रसंग प्रेरणादायक है अपितु अनुकरणीय भी है।
ये सभी को पता है, श्री राम ने समुद्र पर पुल (रामसेतु) बनाने से पूर्व “लंका पर विजय” पाने के लिए समुद्र तट पर एक यज्ञ का आयोजन करके “शिव-लिंग” की स्थापना की थी।
तो ज़ाहिर सी बात है, जब श्री राम जी के कर कमलों से “इष्ट की स्थापना’ हुई, तभी तो वे “श्रीरामेश्वरम-ज्योतिर्लिंग” कहलाये, जो आज भी जनसामान्य के लिए विद्यमान हैं।
वही “रामेश्वरम” जिसकी पवित्र मिट्टी ने हमें…श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जैसे महान राष्ट्रपति दिए हैं।
चलो, अब उस “विचित्र एवं अनुकरणीय-प्रसंग” की ओर बढ़ते हैं , तो हुआ यूं कि श्री राम को इस महान कार्य के लिए एक सुयोग्य आचार्य चाहिए थे। जब उन्होंने वहां वनवास में मौजूद अपने सभी संगी साथियों से पूछा तो श्री जामवंत जी ने काफ़ी सोच विचार करके “आचार्य-रावण” का नाम सुझाया, हालांकि वह आज आपके प्रबल शत्रु हैं। लेकिन प्रभु ये आप भी जानते हैं कि ये बात भी अपने आप में सोलह-आना सही है। कि रावण के बराबर विद्वान आचार्य इस क्षेत्र में आज कोई दूसरा है नहीं।
प्रभु श्री राम ने कहा, ठीक है, तो जामवंत जी आप उन्हें बुलाने का प्रयास करके देखिए..
सम्बन्धो के लिहाज़ से , जामवंत जी के दादा जी और श्री पुलस्त ऋषि आपस में अच्छे मित्र थे, आचार्य-रावण पुलस्त ऋषि का पोता था। इस सम्बन्ध से वे पहले से ही एक दूसरे के सम्पर्क में थे। इस बावत जामवंत जब लंका पहुँचे,तो “लंकेश्वर” ने उनका अच्छे से स्वागत किया , और कुशलता पूछी…,तो उसी के साथ जामवंत जी ने निःसंकोच अपना आने का प्रयोजन भी बता दिया। इस पर काफ़ी विचार-विमर्श करके “लंकेश-रावण” ने कहा, वही दशरथनंदन राम जिसने बहन सूर्पनखा की नाक काटी थी, उस “राम” से तो लंकेश्वर की ठनी हुई है।
मैं शास्त्रों का ज्ञाता हूँ इस लिए इंसान के अंदर विभिन्न भूमिकाओं का गणित न केवल ठीक से जानता हूँ ,अपितु उचित तरीके से हर रिश्ते की गरिमा को भी समझता हूँ। चलो, वह जो भी है वो “लंकेश्वर” की अपनी समस्या है। ..यहां प्रश्न आचार्य रावण से है न कि किसी लंकेश्वर से..??
मग़र वन में एक वनवासी इस वन्य-क्षेत्र से अनभिज्ञ हैं, परेशान है… इसलिए शास्त्र व घर्म-नीति ये कहती है। कि एक आचार्य होने के नाते उनके अनुष्ठान में जो हमसे बन पड़े मदद कर देनी चाहिए।
बताइए ! “आचार्य-रावण” का तो उनसे कोई वैर है नहीं..??
दूसरे यज्ञ-संस्कार आदि कराना तो हम ब्राह्मण-आचार्यों का ही कर्म है। इसलिए इस दौरान एक तपस्वी-राम जो वनवासी है वह आपका यजमान है।
जामवंत जी के इस वृतांत ने ‘ लंकेश्वर ‘ को तत्काल ‘ आचार्य रावण ‘ में रुपांतरित होने को बाध्य कर दिया,तब आचार्य रावण बोले! ठीक है जामवंत जी चलो, “आचार्य-रावण’ को आपका प्रस्ताव स्वीकार है। वह ये संस्कार अवश्य करायेगा।
उस वक्त “लंकेश-रावण” का रूपांतरण “आचार्य-रावण”के रूप में होते हुए साक्षत जामवंत जी ने ही देखा होगा। मग़र तमिल भाषा के मशहूर कवि “कम्ब” (कम्बन-ऋषि ) द्वारा ये सौभाग्य आप और हम को भी मिल गया..इसके लिए कविवर को सभी भक्तों का कोटि-कोटि नमन है। यही इस ‘प्रसंग’ या मेरे इस ‘blog’ की विचित्रता है। जो हमें असल जीवन में अपनी सभी भूमिकाओं के साथ “न्याय-संगत” होने का सन्देश दे रही है।
घर-परिवार के सदस्यों के बीच एक ही छत के नीचे एक ही समय में रिश्तों के प्रति “एक-संवेदनशील-व्यक्ति” अनेक भूमिकाओं के ताने-बाने में बंधा हुआ होता है..
जैसे; माता-पिता के लिए “एक-पुत्र”, अपने अन्य भाई-बहन के लिए “एक-भाई” और यदि शादी-सुदा है, तो पत्नी के लिए “एक-पति” और अपने बच्चों का “एक जिम्मेदार-पिता” होता है। अर्थात रिश्तों के नज़रिये से एक ही व्यक्ति एक ही समय विभिन्न भूमिकाओं में होता है।
यहां आते-आते असल प्रसंग से भटक मत जाइयेगा, भूमिकाएं चाहे जितनी क्यों न हों..?
असल सवाल, तो उस चुनौती का है..?? कि “हर भूमिका में व्यक्ति को ‘न्याय-संगत’ होना चाहिए..? ” अर्थात व्यवहार में ऐसा संतुलन हो जो अपने प्रत्येक रिश्ते की गरिमा एवं पवित्रता बनाये रखे।
“आचार्य-रावण”, जो तीन लोकों का विजेता था, उसने ये साबित कर दिया कि “प्रत्येक भूमिका” की अपनी एक अंतर्निहित माँग होती है, उसके साथ न्यायोचित व्यवहार करने का निर्णय ही रिश्ते की पवित्रता है।।
प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए, अब जामवंत ने सुयोग्य आचार्य से पूछा यज्ञ हेतु क्या-क्या आवश्यक सामिग्री जुटानी होंगी..? क्योंकि हम और आपके यजमान तो वनवासी हैं, ये व्यवस्थाएं कैसे और कहाँ से कर पाएंगे, आचार्य ने कहा, कभी-कभी ऐसे यजमानों के साथ इस तरह की अपरिहार्य स्थिति के लिए शास्त्रों में उल्लेख है कि सिर्फ बहुत आवश्यक चीज़ों से काम चला लेना ही श्रेयष्कर होता है।
क्योंकि आचार्य की “पूर्ण-प्रबन्ध” करने की हठ से कभी-कभी यजमान का भाव कुभाव में बदल जाता है। ऐसी स्थिति से बचाने के लिए ये सारी “प्रबन्ध-व्यवस्था” आचार्य की ज़िम्मेदारी हो जाती है। अब आप बेफ़िक्र होकर जाइये, “आचार्य-रावण” सब कर लेंगे।
अब आप सुयोग्य-आचार्य-रावण की दूरदृष्टि देखिएगा, वह इसके बाद सीधा अशोक-वाटिका पहुँचा, और देवी सीता को बताया कि समुद्र के उस पार मेरे एक “तपस्वी-यजमान”, जो आपके पति भी हैं, एक यज्ञ का आयोजन कराना चाह रहे हैं, इसलिए “आचार्य-रावण’ को अपने ब्राह्मण कर्म के अनुरूप उनका ये संस्कार कराना होगा। शास्त्रों के अनुसार उसे सम्पन्न कराने के लिए वहां आपको भी मौजूद होना चाहिए इसलिए आप से मैं “आचार्य-रावण” चलने का आग्रह करता हूँ। मग़र स्मरण रहे केवल हवन,यज्ञ-संस्कार हेतु। उसके उपरांत आप इस आचार्य के साथ बापस वाटिका में ही लौटेंगी। क्योंकि “राम-सीता” का पुनर्मिलन तो “लंकेश-रावण” से जीतने के बाद ही सम्भव होगा।
देवी सीता ने रावण की भूमिकाओं के इस अंतरभेदिय रूपांतरण को समझते हुए, उस दिन रावण से आचार्य -प्रणाम कहकर सम्बोधन किया। और एक दृढ़ विश्वास के साथ पुष्पक-विमान से रामादल के समीप पहुंच गए।
जैसे ही आचार्य को राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों ने देखा, उन्होंने भी आचार्य-प्रणाम बोला फिर पुनः श्री राम ने कहा, आचार्य ! दसरथ नंदन श्री राम का प्रणाम स्वीकार कीजियेगा…
आचार्य रावण ने अपने यजमान को “सदैव कल्याण हो।” का आशीर्वाद भी दिया। तब बोला, जामवंत ! चलो,तपस्वी-यजमान जोड़े मे अपने संकल्प के साथ पूजा की वेदी पर मेरे समक्ष आकर बैठें, देर न करें ताकि शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना का कार्य शुरू हो सके।
इस पर जामवंत ने विनती करते हुए आचार्य महोदय से कहा, पत्नी की अनुपस्थिति पर यज्ञ सम्पन्न करने का कोई और उपाय…है क्या..?
आचार्य ने कहा, हाँ है न ! तीन परिस्थितियों में .. यजमान अकेला भी करा सकता है…
पहला – यदि वह कुंवारा है,तो
दूसरा – यदि उसकी पत्नी इस संसार में ही नहीं है, तो
और तीसरा – यदि वह उसकी पत्नी ने त्याग दिया है, तो।
ये सुनने के बाद “तपस्वी-यजमान” राम ने अपने “आचार्य-रावण” से विनम्र स्वर में कहा महोदय, ये तीनों ही परिस्थितियां न होते हुए भी कैसी विडम्बना है कि हम पति-पत्नी एक दूसरे से दूर हैं। तब जामवंत ने कहा, आचार्य महोदय, अब जो भी स्थिति-परिस्थिति है वह आपके सामने है यज्ञ सम्पन्न कराने का कोई उपाय निकालिये…
आचार्य ने तुरन्त लक्ष्मण और विभीषण को आवाज़ दी, और कहा, देवी सीता पुष्पक-विमान में हैं आप शीघ्र आदर सहित लेकर आओ..लेकिन ध्यान रहे! ये प्रबन्ध सिर्फ यज्ञ व शिव-लिंग स्थापना हेतु एक आचार्य की तरफ से है। इसके उपरान्त उसी आदर-सम्मान के साथ देवी सीता को पुष्पक-विमान में ही बैठा दीजियेगा।
तपस्वी-यजमान (राम) ने अपने आचार्य-रावण को पूर्ण आस्वस्त किया, जी विल्कुल ऐसा ही होगा। तब इत्मिनान से धार्मिक-संस्कार सम्पन्न हुआ..और आचार्य-रावण अपने पुष्पक विमान में सवार हो कर देवी सीता को वहीं अशोक-वाटिका में पहुँचाते हुए लंका में अपने महल को चले गए।
ये होतीं हैं रिश्तों की पवित्रता!!
ऋषि कम्ब ने “रामअवतारम” में स्पष्ट लिखा है कि सभी मनुष्यों को अपनी अलग-अलग भूमिकाओं के साथ न्यायोचित व्यवहार करने की सीख , सुयोग्य-आचार्य ( प्रकांड-पंडित) रावण से लेनी चाहिए। उस वक्त वह तो स्वयं बख़ूबी जानता ही था। लेकिन आज ये हम सब की भी समझ के दायरे में है , कि रावण कोई मूर्ख नहीं था एक हिंदी कहावत के अनुसार “लंकेश्वर-रावण” के दोनों हाथों में लडडू थे।
एक लडडू तो ये कि यदि राम एक साधारण व्यक्ति हैं, तो मैं अपनी अपार सैन्य बल एवं शक्तियों के दम पर अपने मंसूबों में सफल हो जाऊंगा। स्वाभाविक है प्रभुता पाने पर इस तरह की ख़ुश-फहमी हर किसी को हो ही जाती है। ये मनुष्य,देव और दानव योनि में सामान्य सी घटना है।
आज भी ऐसे राक्षस रूपी रावण देश-दुनियाँ में मौजूद हैं। वो तो फिर भी तीन लोकों का विजेता प्रकांड-पंडित “रावण” था।
दूसरा लडडू ये कि यदि वो वास्तव में “त्रिलोकीनाथ भगवन श्री राम” ही हैं, तो पूर्व जन्म के अभिशाप के मुताविक मेरे सम्पूर्ण राक्षस कुल का उनके हाथों उद्धार भी हो जाएगा। …तो
हक़ीक़त में ये एक लीला ही थी।
मग़र भारतीय समाज के लिए इन ग्रन्थों ने सदैव आदर्श स्थापित किये हैं। इसलिए रामायण का एक एक प्रसंग गूढ़ रहस्यों से भरा हुआ है। इसकी प्रत्येक बात में मान्यता के आधार वैज्ञानिक तथ्य ही हैं।
बस आवश्यकता है प्रभु के प्रेम में सराबोर होकर न केवल डुबकी लगाते रहने की,अपितु इन आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने की।
धन्यवाद
योगेंद्र सिंह पचहरा, पौत्र श्री साहब सिंह
मुखिया जी, नीमगाँव,राया,मथुरा