39-“सनातन” एक संस्कृति है,धर्म नहीं।

“सनातन” क्या है…?

जो करोड़ो वर्षो से है और आने वाले अरबो वर्षों में भी अपने उसी शाश्वत रूप में रहेगा वो है “सनातन” क्योंकि ये तो सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए एक “शाश्वत-संस्कृति” है, किसी वर्ग विशेष के लिये नही।

“धर्म” क्या है..?

इस धरा पर मौजूद सम्पूर्ण ‘प्राणी’ जगत के कल्याण सम्बन्धी बातें जो प्रत्येक जीव के अंतःकरण में स्वतः विद्यमान हैं उन्हें सदैव श्रद्धापूर्वक धारण किये रहना, और उस के अनुरूप ही अपने दैनिक जीवन में बर्ताव करना ही “धर्म” है।

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥”
एक महामानव की दूरदृष्टि देखिए… ये सभी दोहा सूरदास जी ने, आज से करीब 450 वर्ष पहले लिख दिए थे।
सूरदास जी कहते हैं कि “सनातन-धर्म” को छोड़कर विभिन्न शाखाओं में और मतों में जाने की आपको क्या आवश्यकता है..? परमसुख आपको कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगा।
जैसे गंगा जी में स्नान करने वाले को नदी नालों में और कुए पर नहाकर चैन नहीं मिलता।
इसी तरह जहाज पर बीच समुद्र में बैठने वाला..और फिर अपनी मस्ती में उड़ने वाला पक्षी कितना भी इधर-उधर उड़ान क्यों न भर ले, उसको आराम के लिए जहाज पर ही पुनः वापस आना पड़ता है। और जैसे कामधेनु गाय को रखने वाला या उस दूध का सेवन करने वाला कभी बकरी के दूध से संतृप्त नहीं हो सकता ।
इसी तरह चारो तरफ भटकने के बाद, मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति,अर्थात पुन: सनातन-संस्कृति में ही लौटता है। क्योंकि उसके दैनिक क्रिया-कलाप “सनातन-व्यवस्थाओं” में ही रचे-बसे हैं।
आज राधास्वामी, शिर्डी के साईं बाबा,सत्संगी, और बहुत सारे नए-नए मतों में लोग भटक रहे हैं इसके पीछे कई एक कारण है ..
1-एक तो आजकल अधिकतर परिवारों में जहां संयुक्त-व्यवस्था हुआ करती थी उसकी जगह आज एकल-परिवारों ने लेली है।
2-दूसरे पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी हो गए है , दरअसल आत्माभिमानी की जगह (Soul-conscious) आज का इंसान देहाभिमानी (Body-conscious) हो गया है। ठीक है मैं भी मानता हूँ जीवन में भौतिकता भी आवश्यक है। मग़र एक सीमा तक। विद्वानों का मत है कि जीवन की खुशहाली के लिए भौतिकता एवं आध्यात्मिकता के बीच एक बेहतर तालमेल होना बहुत आवश्यक है। लेकिन लोग हैं ऐसी अंधी दौड़ भर रहे हैं ,बच्चों को संस्कार परिवार से ही मिलते हैं परन्तु वहां तो लोग धन-सम्पत्ति अर्जित करने में ऐसे मशगूल हो जाते हैं, कि संस्कार तो बहुत दूर.. बेचारे बच्चों को अपने सारे काम ख़ुद या फिर ‘आया’ के सहयोग से करने होते हैं। अब आप ही बताइये जिन्हें “स्वधर्म” न सिखाया गया हो वो “सनातन-धर्म” को क्या जानें।
3- तीसरा और अहम कारण ये कि, हमारे कुछ सनातनी तथाकथित समाज के ठेकेदार जिन्होंने सारा वातावरण दूषित कर रखा है। ये सर्वविदित है कि समाज को समुन्नत बनाने के लिए पूर्वजों ने जो वर्ण-व्यवस्था बनाई थी , उसे न केवल जाति वल्कि कुछ मनगढ़ंत उप-जातियाँ इज़ाद करके कुछ लोग बीच से बीच उसे अपने ही तरीके से ले उड़े हैं …बे सिर पैर की बातें गढ़ते रहते हैं, ये बहुत गन्दा सामाजिक-प्रदूषण है। जिससे “वैमनष्यता” की ऊँची-ऊँची दीवारें लोगों के बीच खड़ी कर दी गयीं हैं। सनातनियों के बिखराव की असली जड़ तो ये है।
सभी भारतीय सनातनी हैं मग़र ऐसे ही सामाजिक प्रदूषण से बचने के लिए लोगों ने मज़बूरन अपने आप को अलग-अलग सम्प्रदायों से जोड़ लिया है।
4- चौथा कारण रही सही कसर इस “वॉलीवुड” के कुछ डिज़ाइनर, इनटोलरेंस वाली मानसिकता रखने वाले लोगों ,जैसे,स्क्रिप्ट राइटर्स निर्माता-निर्देशक,अभिनेता लोग और उन्ही से पूरी तरह मिलीभगत किये हुए “सेंसर बोर्ड” भी एक लम्बे अर्से से पूरी तरह धर्मक्षेत्र के कठघरे में खड़ा है, उस पर असंख्य प्रश्न-चिन्ह लगे हुए हैं। क्योंकि उसने आंखों पर पट्टी बांधकर हर तरह की फिल्मों को पास करता रहा है। उसने इतिहास से छेड़छाड़ करके ‘भारतीय-संस्कृति’ और सभ्यता की वो धज्जियां उड़ाई हुई हैं… वो मनगढ़ंत पाश्चात्य-सभ्यता परोसी है.. जिसके लिए जितना कहा…जाय कम ही होगा। मग़र अफ़सोस हमारे देश के नीति-नियंता जाने कहां सोए हुए हैं..?
5-पांचवां कारण अपनी युवा-पीढ़ी की बेपरवाही किसी भी बात की गम्भीरता को न समझना,
बहरहाल मै इसमें उनका कोई दोष नहीं मानता। क्योंकि ये तो पहले कारण का प्रतिफल है..उनके प्रति हमारी भी तो वो “बेपरवाही” ही थी। जो “आया” के द्वारा परवरिश दिलवायी। तो भुगतो अब। मानसिक स्तर पर सनातन-धर्म की आज ऐसी हालत हो गयी है कि..
“दर्द सहने की इस क़दर आदत सी हो गयी है, दर्द होता है मग़र हो…ता… नहीं है।”
अर्थात जब दर्द की पराकाष्ठा हो जाती है, तो दर्द महसूस कराने वाले ‘सेंस-ऑर्गन्स’ भी ब्रेन को वो “अनुभूति-सन्देश” नहीं भेज पाते। तब दुर्भाग्य बस वैसी ही हालत होती है जो आज “सनातन” की दिख रही है। कष्ट तो बहुत होता है मग़र ..करें भी तो क्या..
एक विचारक के पास तो कलम की ही ताक़त है जिससे वो ..सोए हुए सनातनियों को जगाने का एक प्रयास ही कर सकता है।
मानसिक स्तर पर आधुनिक होना तो नितांत आवश्यक है लेकिन आज लोगों में आधुनिकता का बुखार फैंसी-ड्रेसिज व हेयर-स्टाइल , लक्सरी गाड़ी व बंगला तक ही सिमेट कर रह गया है। मग़र विचारों में वही रूढ़िवादिता भाषा में भद्दी-भद्दी गालियाँ सदैव अपनी ही ढिगें बघारने के अलावा कुछ भी नहीं है। मेरा सभी लोगों से पुनः आग्रह है, आज हमें आत्माव्लोकन की महती आवश्यकता है। कृपया इस विषय पर गम्भीरता पूर्वक विचार कीजियेगा…सभी धर्मों का आधार
“सनातन-संस्कृति” ही है। जय “सनातन” धन्यवाद
विचारक.: योगेन्द्र,पचहरा
नीमगाँव,राया,मथुरा
281204

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