31-“सकारात्मक-सोच” के प्रभाव…

.धैर्य रख सको, तो आज का दुःख कल का सौभाग्य भी हो सकता है..
महाराजा दशरथ की कुण्डली में सन्तान का योग नहीं था..मग़र उन्हें श्रवण के पिता का श्राप था कि “हे राजन! तुम एक दिन हमारी तरह पुत्र वियोग में तड़फ तडफ़ के मरोगे” इस से उन्हें हौसला मिलता था। कि ये श्राफ एक दिन पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य बनकर अवश्य आएगा। (कालिदास के रघुवंशम में इसका वर्णन दिया हुआ है।)
ऐसी ही एक घटना 1872 के करीब अमेरिका में एडिसन के साथ घटी..
जब उसकी अध्यापिका ने अपनी ख़ुद की अयोग्यता को छुपाने के लिए एक जिज्ञासु विद्यार्थी एडिसन को महज़ इसलिए स्कूल से एक “आरोप-पत्र” देकर निकाल दिया था। क्योंकि वो किसी बात को समझ न पाने तक अक्सर प्रश्न पूछा करता था। जो एक अच्छे विद्यार्थी होने का संकेत है। अपने इसी स्वभाव में एडिसन ने अपनी माँ से भी पूछ ही लिया कि इस पत्र में क्या लिखा है..? तो माँ ने कह दिया कि बेटे इसमें लिखा है कि “आपका बेटा बहुत होशियार है।इसलिए इसे कल से स्कूल में आने की आवश्यकता नहीं है। ये तो घर पर ही सब कुछ सीख जाएगा।”

और आपको बता दूं उन दिनों स्कूल काफ़ी दूर-दूर भी हुआ करते थे। एडिसन के माता-पिता तो वैसे भी आर्थिक रूप से काफ़ी निर्धन थे। बच्चे के लिए एक माँ के द्वारा इस तरह का “झूठ” बोलना…यहाँ मेरा ऐसा मानना है वो “झूठ” की परिभाषा में नहीं आता.. I mean, it was her proper handling a soft hearted child at that time..एक माँ के लिए उस समय मज़बूरी से कहीं अधिक एक बच्चे को सही तरासने के लिहाज़ से “वक़्त” की मांग भी थी। लेकिन अब प्रभु की लीला एवं “सकारात्मक सोच के प्रभाव” का चमत्कार देखिए.. जो बच्चा स्कूल में महज़ चौथी कक्षा के मध्य तक ही पढ़ सका हो। उसने वो कर.. दिखाया जो उसके स्तर से बहुत ऊपर.. की बात है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि हर बच्चे की प्रथम गुरु माँ होती है। इसलिए उसने सब कुछ घर पर रह कर मां के द्वारा बताये हुए “आरोप-पत्र” की बातों में पूर्ण आस्था एवं उत्साह रखते हुए उसने सब कुछ अपनी माँ के सहयोग से सीखा। उस वक्त एडिसन की माँ का नज़रिया यदि “सकारात्मक” न रहा होता तो क्या एडिसन एक वैज्ञानिक बन पाता..? तो फिर क्या बल्ब एवं ग्रामोफ़ोन जैसे बड़े-बड़े आविष्कार हो पाते..?
ज़ाहिर है विल्कुल नहीं।
मगर कुछ वर्ष बाद जब एडिसन की माँ दुनियाँ में नहीं रहीं.. तो एक दिन घर की साफ-सफ़ाई करते-करते वही “आरोप-पत्र” एडिसन के हाथ लग गया। तब एडिसन ने उसे स्वयं पढ़ा तो दंग रह गया..उसमें लिखा था कि “आपका बेटा न केवल शैतान है वल्कि हद से ज़्यादा मूर्ख भी है इसलिए पढ़ाई तो दूर की बात है..ये अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकेगा। इसलिये हम इससे सदैव के लिए छुटकारा पाना चाहते हैं आप तत्काल इसे ले जाइये।” ये पत्र पढ़ने के बाद एडिसन को अपनी माँ की “सकारात्मक-सोच” का प्रभाव अपने ऊपर जो दिख रहा था। उसके लिए एडिसन का ह्रदय भावुक होते-होते मन ही मन अपनी देवी समान माँ को धन्यवाद दे रहा था। क्योंकि ये तो आप और हम भी समझ सकते हैं। यदि एडिसन के साथ उसकी माँ का रवैया सदैव “धैर्यपूर्ण एवं सकारात्मक” की जगह वही रहा होता जो अमूमन माताओं का होता है..I mean उनके न चाहते हुए भी मजबूरन अपनी घरेलू परिस्थितियों के सामने वे अपना धैर्य खो बैठती हैं, और अक्सर स्थिति बेकाबू होती चली जातीं हैं। यहां एक बात स्पष्ट है। कि माँ का “धैर्यवान” होना भी बहुत आवश्यक है।
इसी लिए किसी ने बहुत सुंदर लिखा है; कि
” अनुकूलता भोजन है,
प्रतिकूलता विटामिन है, उसी प्रकार चुनौतियाँ वरदान है। और जो उनके अनुरूप व्यवहार करें..वही सच्चे “पुरूषार्थी” हैं।
जब हम सुख मिलने पर खुश रहते हैं, तो उसी प्रकार कभी कोई दुःख, विपदा, अड़चन आ जाये..तो घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि क्या पता वो अगले किसी सुख की दस्तक हो। इसलिए सदैव न केवल सकारात्मक अपितु धैर्यवान भी रहें..!!
बस इस आपत्ति काल में धैर्य और संयम के साथ Lockdown का पालन पूर्ण ईमानदारी से करें, अगर जिम्मेदारी निर्वहन हेतु बाहर जाने की विवशता या सेवा का सौभाग्य बने तो पूरी सतर्कता रहें।
धन्यवाद।
युग पचहरा, नीमगाँव, राया, मथुरा।(जन्मभूमि)

के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस (कर्मभूमि)

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