
सभी बन्धुओं को युग,पचहरा का नमस्कार !
आपकी कुशलता जानने के लिए, इसबार मैने ब्लॉग कम एक पत्र लिखा है, मुझे आशा है, आप स्वस्थ होंगे और परिवार में भी सभी स्वस्थ होंगे, मग़र मुझे लगा कि कुशलता जानना, मेरे कर्तव्य की परिधि में आता है, इसलिए कृपया आप अपना और अपने परिवार का ध्यान रखे और देश के हालातों को समझते हुए कुछ समय के लिए सार्वजनिक रूप से मिलने से बचे! क्योंकि आप न केवल अपने परिवार अपितु इस समाज की भी एक अमूल्य धरोहर है, और मै चाहता हूँ, कि मेरा प्रत्येक आत्मीय, प्रेमी जन, मेरे समस्त प्रबुद्ध-पाठक और उनका परिवार स्वास्थ्य के साथ-साथ हर तरफ से महफ़ूज़ रहें। कोई किसी भी तरह की दिक्कत न हो और यदि हों भी तो तुरन्त शेयर करें…
आप उस दौर में हैं जब आपके पास सोशल-मीडिया जैसी सुविधा है, कुछ ही पलों में सूचना कहीं से कही..अर्थात पूरी दुनियाँ में पहुँच जाती है।
इसी से याद आया एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शेयर कर लूँ कि, “हारवर्ड यूनिवर्सिटी” में काफ़ी दिन से क्या… लगभग पिछले सत्तर (70) वर्षों से एक बहुत ही अहम विषय पर काम हो रहा है…अर्थात एक “रि-सर्च’ अभी भी चल रही है। उस शोध के अंतर्गत “हारवर्ड यूनिवर्सिटी’ के जो टॉप ग्रेजुएट्स थे, उनको उन शोधकर्ताओं ने longitude में फॉलो किया तो पता चला कि उनमें बहुत से लोग तो ऐसे निकले जो अमेरिका में काफ़ी ऊंचे पदों पर पहुँचे। जैसे: उनमें से दो-तीन लोग तो अमेरिका के प्रेसिडेंट तक बने, अन्तरिक्ष यात्री बने ,कुछ साइंटिस्ट बने, आर्टिस्ट बने और कुछ ने तो अपने अच्छे कार्य या किसी नए सिद्धांत का प्रतिपादन करके “नॉवेल प्राइज” तक भी हासिल किया हुआ है।
दूसरी तरफ उनमें से कुछ जीवन की वास्तविक डगर से ऐसे भटके जो अपराध की तरफ बढ़ते गए और जेलों में भी रहे। कुछ ने तो सुसाइड तक अटेम्प्ट किये।
दरअसल, शोधकर्ताओं का असल मक़सद टॉपर्स की “लाइफ-स्टाइल” को स्टडी करके ये जानना था कि, उनमें से वास्तव मे “ख़ुश” कौन था..?
क्योंकि हम सब का धेय आखिरकार निजी-जीवन में “प्रसन्नता” ही तो है ?
अब इसके नतीजे देख कर आप हैरान रह जाएंगे,उस सारी स्टडी के निष्कर्ष में “सेंस ऑफ वेल-बीइंग (Sense of well-being ) और Happiness के साथ-साथ एक “सिस्टेमेटिक-लाइफ”और होती है। जब लोगों को उस कसौटी पर कस कर देखा गया, तो उनमें एक चीज कॉमन थी मग़र वो कॉमन चीज़ “धन” नहीं था, कोई अहोदा, पद-प्रतिष्ठा नहीं थी, कोई डिग्री नहीं थी , कोई तालीम नहीं थी , और कोई उनके बच्चों की सफलता भी नहीं थी।
बल्कि वो चीज़ थी कि जिन-जिन लोगों ने अपने रिश्तों को तरज़ीह दी, रिश्ते निभाये… और जिनमें “रिलेशनशिप-डिवलप” करने की योग्यता थी।
‘समाज’ जिसे व्यक्ति का आइना कहा गया है उसमें अपनी ख़ुद की छबि को सुदृढ़ रख पाए, वे लोग अपने दैनिक जीवन में खुश रहे। अगर रिश्तों के सिलसिले में प्रारब्ध बस कभी कोई गतिरोध आ भी गया, तो उसे धैर्यपूर्वक, शिददत के साथ बर्दास्त किया, एक सही सूझ-बूझ से उसे दुरुस्त करने का भरपूर प्रयास किया। न कभी अपनी जिम्मेदारियों से भागे, अर्थात अपने आपको संभालते हुए आचरण की पवित्रता को बनाये रखा ताकि खुद की अंतरआत्मा पर किसी अनैतिक कार्य में सम्मिलित होने का बोझ तक न पड़े। लेकिन ये तभी सम्भव होता है , जब मदद करने वाले के साथ-साथ “मदद पाने वाले की भी नीयत स्वच्छ छवि की होती है। अर्थात उसमें पात्रता होती है।
इतिहास साक्षी है.. ऐसे महामानव,महापुरुष सदैव भीड़ से अलग होते हैं जो स्वयं अपने आपको आदर्श की सीमा-रेखाओं के अंदर रखते हुए अपने जीवन को बहुत ही इत्मिनान से, जी…ते हैं न कि जीवन को ढोते हैं।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम अपनी रिपोर्ट में ऐसे त्याग पूर्ण भाव में जी.. ने वाले सुपात्र चरित्र के लोगों को शत शत नमन करती है।
इस लोकडाउन के दौरान “समय” का ठीक से सदुपयोग कर अपने खुद का आत्मावलोकन अवश्य करें जिससे आचरण की पवित्रता बनी रहे.., इस प्रतिकूल कालचक्र से विधाता अवश्य एवं शीघ्र ही मुक्ति दिलाएंगे। सभी के लिए मेरी परम् पिता परमात्मा से प्रार्थना है ….
” लोका समस्ता सुखिनो:
भवन्तु”🙏
आपका शुभचिंतक
YUG पचहरा
88A,पचहरा-हाउस,वसुन्धरापुरम,हाथरस
सर आपने सही कहा इस दुनिया में सफल व्यक्ति बही है जो अपने घर परिवार और समाज से जुड़ा रहता है धन या पैसा तो भिखारी भी कमा लेता है
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बहुत सुंदर विचार बेटा.. तुम बहुत दूर तक जाओगे..धन्यवाद👍
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