32- “स्वाध्याय” एक संकल्प

बन्धुवर, नमस्कार ! 🙏 ये तो आप देख ही रहे होगे कि आज ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में गूगल (Net) से पल भर में लगभग हर क्षेत्र की पर्याप्त जानकारी मिल जाती है। इस दृष्टि से हम बहुत सौभाग्यशाली हैं। जो इस दौर में पैदा हुए हैं जब से अपनी वेबसाइट के थ्रू मैं ऑन-लाइन हुआ हूँ, तब से थोड़े से पंख तो मुझे भी लग गए हैं। नेट पर बहुत कुछ लिखता-पढ़ता रहने से वक्त की कमी…ही महसूस होती है। मग़र कभी ऐसा भाव नहीं आता, जैसे सामान्य तौर पर लोग बोलते रहते हैं कि “क्या करें समय ही पास नहीं होता।” वैसे भी “वक्त” ने अब तक संसार से हम जैसे कितने गुज़ार (पास कर) दिए, गुज़ार रहा है और इसी तरह गुजारता रहेगा भी……….ये संसार की एक अनवरत प्रक्रिया है। इसलिए सदैव कर्मशील बने रहना ही उचित है। कुछ लोगों ने नेट के प्रति बड़ी गलत धारणाएं पाल रखीं हैं। यूं तो फिर प्लस/माइनस हर चीज़ में होते है। नेट-कम्युनिकेशन में “समझदारी” प्लस है, वहीं “ना-समझी” बहुत बड़ा माइनस भी है। क्योंकि इस संचार व्यवस्था ने दुनियाँ की प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, देश अर्थात कायनात में मौजूद हर उस चीज़ को, जिसकी आपको आवश्यकता हो सकती है। सब आपके पास लाकर रख दिया हैं। अर्थात दुरियाँ तो लगभग मिटा ही दीं हैं। वो भी बहुत ऊँचे दामों में नहीं, विल्कुल आपकी सामर्थ्य में। ” आप मानते हो ये है न प्रकृति का एक नायाब तौफा!”

जब, आप रात्रि में पढ़ने बैठते हैं, तो सिम्पली “स्विच-ओन” कर देते हो और लाइट जल जाती है। ठीक वैसे ही चलकर लाइब्रेरी जाने के बजाय “इंटरनेट-ऑन’ करके लाइब्रेरी या किसी विचारक, लेखक, कवि,आदि किसी भी व्यक्ति विशेष की “वेबसाइट” पर जाकर बड़े इत्मिनान से “स्वाध्याय” का आनंद ले लेते हो। मग़र कभी पूरी दुनियाँ को ये सब प्रोवाइड करने वाले सच्चे कर्मयोगियों के लिए आपके अन्तर्मन से शुभाशीष या दुआएं निकली, या कभी मन में उन महनुभावों को धन्यवाद ही देने का विचार आया हो…?

शायद “नहीं” क्योंकि अधिकतर की आदत में ही नहीं है, होनी चाहिए ऐसा आपका मन कह रहा है। तो फिर ठीक है, आदत बना लीजियेगा।

इसी से रिलेटेड कुछ अच्छे विचारक, लेखक, वैज्ञानिक एवं नामचीन कविवर! आदि की ऑन-लाइन उपलब्धता हमारे अकेलेपन को भी भरने में बहुत कारगर सिद्ध हुई है। ख़ास कर इस लॉकडाउन के दौरान। गूगल के पास अथाह-ज्ञान का भंडार है ,इससे जानकारियाँ लेना भी काफ़ी सुलभ हैं।

मग़र दूसरा पहलू ये भी कहीं तक देखने में आ रहा है, कि आजकल लोगों में न जाने क्यों..? दिन प्रतिदिन संस्कार हीनता घर करती जा रही है। जो चिन्ता का विषय है। एक विचारणीय प्रश्न है..? देश और दुनियाँ के स्तर पर अपनी लोकप्रियता का परचम लहराने वाले अनेकों ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों व महापुरुषों को समझने के लिए मैने कई बायोग्राफी का गहन-अध्ययन किया हुआ है। अतएव मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, कि वे न केवल स्वाध्याय के लिए ही दृढ़-संकल्पित थे , अपितु जानने के बाद “थोता” को उड़ाने में और “सार-सार” को अपने आचरण में ग्रहण करने में भी पूर्ण ईमानदार थे। और यही वो बात है,आज के व्यक्ति पर सवालिया निशान (?) लगाती है।

आजकल लोगों में किसी भी तरह के साहित्य या फिर कुछ भी पढ़ने-लिखने एवं चिंतन…आदि के प्रति रुचि कम हीं दिखती। मेरे ख्याल से इसलिए “स्वाध्याय” को एक संकल्प के रूप में लेने की आज महती आवश्यकता महसूस की जा रही है।..

लोगों के आस-पास के वातावरण की बात करूं तो, किसी भी समाज से मेरा आशय शहरी व ग्रामीण अंचल से है,

मैं देखता हूँ ,आज लोगों में तीन प्रकार की “सोच” व्याप्त है। अर्थात आप ग़ौर करें,तो आप अपने इर्द-गिर्द तीन तरह के ही लोग पाएंगे….
प्रथम/1- “सामान्य-सोच” वाले व्यक्ति जो सिर्फ “लोगों” की ही बात करने तक सीमित रहते हैं।
दूसरे/2- “औसत-सोच” वाले व्यक्ति देश-दुनियाँ में हो रही “घटनाओं” की बात कर लेते हैं
जबकि…
तीसरे/3- “महान-सोच” का स्तर सदैव देश-दुनियाँ के वैज्ञानिकों,विद्वानों व महापुरुषों की “उच्च-सोच” व उनके “सिद्धान्तों/विचारों” को आधार मानते हुए हमेशां “न्याय-संगत” बात करने में विश्वास रखते हैं। चाहे लोगों को उनकी बात अटपटी ही क्यों न लगे। क्योंकि आज लोगों में बढ़ती हुई “स्वार्थ-परता” और वैचारिक स्तर के लगातार गिरने से… भले ही ऐसी बातों को आज कहने और सुनने का माहौल नहीं रहा….. इसीलिए कई बार ऐसे व्यक्ति अपनी सोच के स्तर पर परिवार, समाज और विभाग आदि में अकेले ही खड़े नज़र आते हैं। मग़र वे सैद्धान्तिक हैं, इस बात को भली-भांति जानने के कारण उन पर इस तरह “अकेले होने” का कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जिसे लोग अक्सर एक “मीचुअल- अंडरस्टैंडिंग-गैप” के रूप में जरूर देखते होंगें। मग़र उनका आंकलन ठीक नहीं है।
पिछले वर्ष 30 सितम्बर, 2019 से “https;//infopac.data.blog/” के नाम से मैंने भी अपनी एक वेबसाइट बना रखी है। अर्थात ऐसा समझो कि..

मेरे अपने मौलिक-विचारों का जामा पहने हुए “लेखों का एक संग्रह” दुनियाँ के प्लेटफ़ॉर्म पर “स्वाध्याय प्रेमी” अर्थात प्रबुद्ध-वर्ग के लिए उपलब्ध है। अपने ब्लॉग के थ्रू इस तरह का वृतान्त मेरे अन्तर्मन में थोड़ा संकोच जरूर पैदा कर रहा है…मग़र मेरा विश्वास है कि..
आपको ये जानकर ख़ुशी ही होगी, कि अभी लगभग छह महीने की अवधि पूरी करते-करते 15 मार्च,2020 के करीब मेरे “लेखों’ की संख्या जैसे ही 25+ हुई ही होगी…तभी अपने देश व दुनियाँ के अन्य कई देशों में हजारों की संख्या में जो लोग मेरे लेखों को नियमित पढ़ रहे हैं, शायद उन्हें कुछ वैचारिक लाभ मिल रहा होगा, जो भी हो वे जानें। उन्होंने अपने संचार माध्यमों के ज़रिए मेरे लेखों की… “सिल्वर-जुबली” कह कर एक विचारक के रूप में मुझे बेसुमार बधाइयां दीं, वाक़ई वो पल सदैव के लिए मेरी “स्वीट-मैमोरी” में स्वतः स्टोर हो गये हैं। इस सब के लिए मैं अपने सभी प्रबुद्ध पाठकों का “ता-उम्र” दिल की गहराईयों से शुक्र-गुज़ार रहूँगा। जो एक विचारक का हौसला बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। असल में एक क्रिएटिव इंसान के लिए काम की सराहना ही उसकी सच्ची पूँजी होती है।
ईश्वर का दिया हुआ “सन्तोष” मुझ पर है। तो समझो “सब-कुछ” है। माँ शारदे की कृपा एवं आप सब का आशीर्वाद व दुआएँ यूं ही बनी रहैं… और इस छोटी सी ज़िन्दगी में एक विचारक को क्या चाहिये.. ?

इस “शरीर” का क्या ! ये तो क्षणभंगुर है। मेरा ऐसा मानना है कि..यदि आपका “विचार” सच्चे मानक मूल्यों के धरातल पर आधारित हो, तो इतिहास साक्षी है, उस “विचार” की उम्र हमेशा व्यक्ति से अधिक होती है, अर्थात इग्लिश के एक फेमस पोइट मि.जोन-मिल्टन के शब्दों में कहूँ तो, “विचार” सदैव अमर है, “व्यक्ति” कभी नहीं। लोगों को समझाते हुए उन्होंने ये भी कहा था, मैं इस “स्थूल-शरीर” से आपके बीच रहूँ न रहूँ…मग़र मेरा “विचार-प्रभाव” जिसे आध्यात्म में ‘तीसरा-शरीर’ कहा गया है वो आपके बीच सदैव रहेंगा। ये बात आज हम समझ भी रहे हैं…
पुनः आप सभी से मेरा यही आग्रह है, कि जब वक़्त मिले और जिन-जिन चीजों में आपकी रुचि हो… लेख, कविताएं, कहानियां आदि जो भी चीज आपको पसंद हों उसी से रिलेटेड website पर जाइये..मग़र स्वाध्याय आवश्य करिएगा…ये संकल्प ही आपको उन बुलंदियों पर ले जायेगा जिसके लिए आप बने हैं… धन्यवाद 🙏

विचारक ;युग पचहरा, 88A, वसुन्धरापुरम, हाथरस।
Contact No.8006943731

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