69-“अनौखी-परीक्षा”

“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया भी नहीं है।” ये एक लाचार माँ के शब्द हैं अपने बेटे को समझाने के लिये।

अधिक लाड-प्यार में भटका हुआ बेटा, “देख मम्मी! मैंने अपनी दसवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद छुट्टियों में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने वचन भी दिया था। कल मेरा आख़िरी पेपर भी हो गया। आज श्री ओपी वर्मा सर की “अनौखी-परीक्षा” है। मैने दीदी को कह दिया है कि जैसे ही मैं परीक्षा-भवन से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खड़ी मिलना। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर कभी नहीं आऊंगा।” कैसी विडम्बना है।

एक गरीब घर में ‘बेटे की जिद्द’ और एक ‘माँ की लाचारी’ आमने-सामने टकरा रही थी। (मेरा ये फ़िक्शन जरूर है मग़र आज के दौर में ऐसी कहानी अधिकतर घरों में बन रहीं है।) “बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए उनके एक्सिडेंट की वजह से.. मम्मी कुछ बोले उसके पहले कुलदीप बोला “मैं कुछ नहीं जानता.. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!” ऐसा बोलकर घर का “लाडला-कुलदीप” अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया..? बोर्ड की परीक्षा के बाद हमारे विद्यालय के एक ‘सर’ श्री ओपी वर्मा अपने कॉलेज के छात्रों की “काउन्सिलिंग” के ध्येय से प्रतिवर्ष एक “अनोखी-परीक्षा” का आयोजन किया करते हैं प्रति वर्ष बोर्ड के सभी विद्यार्थी परीक्षा समाप्ति पर “विविधता लिए हुए इस अनौखी-परीक्षा” को अवश्य देते हैं। श्री वर्मा जी स्वयं ही विषय निर्धारित करते हैं।

इस साल “अनौखी-परीक्षा” का विषय था.. ” परिवार में मेरी भूमिका..?” “My role in the family..?” मग़र आज कुलदीप के दिमांग में तो, बाइक लेने की धुन सवार थी… उसने अपने मन में गांठ बांध ली थी कि, यदि मुझे परिवार वाले बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा। श्री वर्मा, सर ने परीक्षा भवन में सभी को पेपर वितरित करा दिया.. पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय निर्धारित था। कुलदीप ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

प्रश्न नंबर 1 :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, भाई-बहन और आप कितने घंटे काम करते हो..? विस्तार से बताइये..? कुलदीप ने इत्मिनान से पूर्ण ईमानदारी के साथ जवाब लिखना शुरू किया..

जवाबः पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ई-रिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। लगभग पंद्रह घंटे। मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे। दीदी सुबह कॉलेज जाती हैं, शाम को “चार से आठ” पार्ट टाइम जॉब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। वो भी लगभग बारह से तेरह घंटे काम करती हैं। मैं, सुबह आराम से छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक थोड़ा बहुत पढ लेता हूँ। मै केवल अपना व्यक्तिगत काम ही कर पाता हूँ। (इससे कुलदीप को मन ही मन लगा, कि उसका परिवार के कामकाज में, तो कोई योगदान है ही नहीं..? थोड़ा बहुत है भी तो, वो उसका व्यक्तिगत काम है।) पहले सवाल के जवाब के बाद कुलदीप ने दूसरा प्रश्न पढा ..

प्रश्न नंबर 2 :- आपके परिवार की कुल मासिक आमदनी कितनी है..? जवाबः पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी की मिलाकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार होती है।

प्रश्न नंबर 3 :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपके मनपसंद हीरो-हीरोइन के नाम, उनकी पसंद..और अभी हाल ही में रिलीज हुई फिल्मों के नाम बताइये..? सभी प्रश्नों के जवाब उसकी पसंद एवं आसान होने से उसने फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..

प्रश्न नंबर 4 :- एक किलो आलू, टमाटर एवं भिन्डी इन तीन सब्जियों की अभी हाल की कीमत क्या है..? एक किलो गेहूं, चावल और तेल इन खाद्यानों की कीमत के साथ-साथ जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाता है। उस आटा चक्की की लोकेशन बताइये। मिस्टर कुलदीप, को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी जानकारी नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी। तो मैं अक्सर मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी एवं स्टार्स का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। जितना कि अपने घर के दैनिक कामकाज का.. इसमें जवाबदेही..तो मेरी ही बनती है..?

प्रश्न नंबर 5 :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो. ? जवाबः हां, मुझे आलू, के सिवा कोई अन्य सब्जी विल्कुल भी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ। (इतना लिखते ही कुलदीप को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, इसलिए अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। हाँ, एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा.. ली, तो वो इतनी कड़वी लगी कि, मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो..? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी नहीं है कि हम एक साथ दो सब्जी बनाकर खा सकें.. तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?) कुलदीप ने अपनी यादों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा..

प्रश्न नंबर 6 :- आपने अपने परिवार में आखिरी बार क्या जिद की थी..उसके बारे में लिखिये .. कुलदीप ने जवाब लिखना शुरू किया। मैंने अपनी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन यानि आज बाइक के लिये जिद्द की हुई है..? पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना-वाना भी छोड़ दिया है। उन्हें बोल दिया है..जब तक बाइक के लिए रुपये नहीं दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं कभी भी घर न आने की आख़िरी धमकी भी देकर निकला हूँ। अपनी जिद का प्रामाणिकता से कुलदीप ने जवाब लिखा।

प्रश्न नंबर 7 :- आपको अपने घर से मिल रही पॉकेट मनी का आप क्या करते हो..? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं..? जवाब: हर महीने पापा मुझे दो सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ। मेरी दीदी को भी पापा दो सौ रुपये ही देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से परिवार में आर्थिक मदद करती हैं। हां, पापा द्वारा उसको दिये गये पॉकेटमनी के रुपयों को वो सदैव गुल्लक में डालकर बचत करती हैं। वह कोई शौख-मौज नहीं करती है, क्योंकि वो मितव्ययी हैं।

प्रश्न नंबर 8 :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो..? प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी कुलदीप ने जवाब लिखा। परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये। यह लिखते लिखते ही “अंतरात्मा” से आवाज आयी कि अरे कुलदीप! क्या तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को सही रूप से निभा रहे हो..? और अंतरात्मा से जवाब आया कि “ना.. जी बिल्कुल नहीं ..!!”

प्रश्न नंबर 9:- आपके परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं..? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं..? आपको डांटते रहते हैं..? (इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए अब तो कुलदीप की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका को ठीक से समझ चुका था।) लिखने की शुरुआत की .. वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं। फिर भी उनकी ओर से हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता है।

प्रश्न नंबर 10 :- “पारिवारिक जीवन” में “प्रभावी-भूमिका” निभाने के लिये इस “समर-वेकेशन” में आप परिवार को कैसे मदद करेंगे..?

जवाब में कुलदीप की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के नीचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। दसवां प्रश्न अनुत्तर छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया। स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

बहन बोली,”भैया! ये ले “बारह-हजार” रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर चलो।” बहन ने भाई के सामने पैसे रख दिये। भाई बोला, “कहाँ से लायी ये पैसे?” बहन ने बताया “मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी ने भी जहां काम करती हैं वहां से कुछ रुपये उधार उठा लिये, और मेरी पॉकेटमनी की बचत वाली गुल्लक से भी सब रुपये निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो पायी है। कुलदीप की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई। दीदी फिर बोली ” भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर कभी नहीं आऊंगा!

अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूँ। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल पापा रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी तुम्हें पता है। बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है..? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल पड़ी।

उसी समय कुलदीप का दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, बेचने के लिए बड़े अच्छे से चमका कर लाया था। “ले .. कुलदीप आज से ये बाइक तुम्हारी, दूसरे चौदह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये बारह हजार में।” कुलदीप बाइक की ओर टुकुर-टुकुर देखता रहा.. और थोड़ी देर के बाद बोला “दोस्त मैं,तो सिर्फ नाम का ही “कुलदीप” हूँ। सच्चे अर्थों में हमारे परिवार की “कुल-दीपक” तो मेरी दीदी हैं। मग़र अब श्री ओपी वर्मा सर, की इस”अनौखी-परीक्षा” के इन 10 प्रश्नों ने मेरी आँखें खोल दी हैं। अब तुम अपनी बाइक उस चौदह हजार रुपये वाले ग्राहक को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी है। और हाल में होने की संभावना भी नहीं दिख रही है।”

इसके बाद कुलदीप सीधा श्री ओपी वर्मा सर, के पास स्टाफ-रूम में जा पहुँचा। वर्मा जी ने उसे देखते ही पूछा, “अरे ! , कुलदीप! कैसी हुई परीक्षा ..? “सर ..!!, ये वाक़ई “अनौखी” ही परीक्षा है। ये तो मेरे जीवन को वो आकार दे गई जो बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं दे सकतीं।

मैंने आखिरी प्रश्न न.10 का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं मैं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा.. और वो हिर्दय से अपने सभी गुरुजनों के चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।

घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर रहे थे। मम्मी ने पूछा, “बेटा! बाइक कहाँ हैं..?” कुलदीप ने दीदी के हाथ में पैसे थमा दिये और कहा, कि सॉरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा, अब मेरी समर-वैकेशन शुरू हो गयीं हैं आप मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़ा आराम करें ताकि आपके पैर जल्दी सही हो जाय, और मम्मी आज से मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे। कुलदीप के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर उसकी मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और सुनते ही वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।” कुलदीप ने कहा, “नहीं मम्मी! अब मै समझ गया हूँ कि हमारे घर-परिवार में मेरी अर्थात एक “बेटे की भूमिका” क्या है..? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आख़िरी 10 वें सवाल का जवाब नहीं लिखा हैं, वह मुझे प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो” और उसी समय कॉलेज में सबके प्रिय एवं सर्वजनहिताय स्वभाव के श्री ओपी वर्मा जी ने कुलदीप के घर में प्रवेश किया। और बोले “वाह! कुलदीप जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर दोगे..बहुत ख़ूब 👌सुनकर बहुत अच्छा लगा.. हम सभी शिक्षकों का भी आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है।

मेरा अपने सभी सम्माननीय पाठकों /अभिभावकों से आग्रह है कि इस लेख को आप भी जरूर पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़वाईयेगा या स्वयं पढ़कर सुना दीजियेगा.. धन्यवाद,

विचारक; युग पचहरा, जन्मभूमि; श्री साहब सिंह,मुखिया जी, सदन, नीमगाँव,राया,मथुरा।

68-“धरती-पुत्र”

मां भारती के लाल कर्मशील “धरती पुत्र / किसान” के साथ योजनाबद्ध तरीके से किए जा रहे दोहरे रवैए के लिए देश को संचालित करने वाली पवित्र पुस्तक “संविधान” के अक्सर विपरीत चलने वाली सरकारों से मै, ये पूछना चाहता हूँ.. आख़िर सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा सदैव दोहरे-मापदंड ही क्यों अपनाए जाते रहे हैं..?

आज हम चाहे जहाँ बैठे हों, मग़र मूलरूप से हम सब हैं किसानों के ही बेटे।

..इसलिए मेरा ऐसा मानना है कि,हम सभी भारतीय नागरिकों को अधिक नहीं,तो अपने देश के “इकोनॉमिक-डिजाइन” को अनिवार्य रूप से समझना होगा।तभी हम किसी भी चुनाव से पूर्व अपने, सांसद,विधायक या फिर ग्रामीण स्तर पर प्रधान आदि से जन-कल्याण से सम्बंधित वाजिब सवाल पूछने के साथ-साथ किसान-मजदूर जो देश की रीढ़ हैं। उनके आर्थिक व शैक्षिक पिछड़ेपन के मूल कारण को समझकर कोई उचित समाधान तलाश पाएंगे।

हम सब सदैव यही सुनते आये हैं कि, किसान, धरतीपुत्र..समूचे विश्व का अन्नदाता है। मैंने गाँव में बड़े बुजुर्गों को अक्सर कहते सुना है कि, “सरकार की सब नीतियाँ इस किसान के ही सिर पर चलाई जाती हैं।” लेकिन आप इतिहास के पन्ने उलट कर देख लीजिएगा.. सरकार की “कृषि नीति” किसान के साथ हमेशा दुराज वाली ही रही है।

आज इस रहस्य को जानने का एक प्रयास करेंगे।

चलो! पहले किसानों के ‘इकनोमिक-डिजाइन’ को जान लेते हैं। वो आप चाहे अमेरिका, यूरोप का देख लें या फिर भारत का जिस पर पिछले कई दशकों से हमारे देश की सरकारें निरंतर काम कर रही हैं,वो डिज़ाइन कहता है कि, धीरे-धीरे किसान को उसके “एग्रीकल्चर-फील्ड” से हताश करके शहर की ओर ले जाने को बाध्य करने का षड्यंत्र बरकरार चल रहा है।

वहां दिहाड़ी मजदूरों की बहुत जरूरत है। क्योंकि नेताओं या कॉरपोरेट जगत के लोगों को शहर में चल रहे.. कारोबार, कंपनीज आदि के लिए सस्ते में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर जो चाहिए।

दरअसल, इस सबके लिए उन्हें देश के ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ को कम करना ही है।

आप आंकड़े उठा के देख लीजिएगा आज अमेरिका में किसान लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। वहाँ ‘किसान पॉपुलेशन’ मुश्किल से 2% बची है। यही हाल यूरोप के देशों का भी है..हर एक मिनट में कोई एक किसान खेती छोड़ने को मजबूर है। भारत,चीन या फिर अन्य डिवलपिंग कन्ट्रीज में सारा ज़ोर नया स्वरूप तैयार करने पर ही है।

आपको याद ही होगा रघुराजन ने बहुत पहले ये कह दिया था कि,भारत में बड़ा रिफॉर्म तब होगा जब हम किसानों को खेती से निकाल कर शहर की ओर जाने को मजबूर कर पायेंगे।

देश में किसानों से सम्बन्धित “एकोनिमिक-पॉलिसीज” का डिजाइन कुछ ऐसा ही है।

अगर आप पर वक़्त की मेहरबानी हो तो ,आप द डिजाइन ऑफ़ “नेशनल-स्किल-पॉलिसीज” को एकबार अवश्य पढ़ लीजिएगा, तो आप पाएंगे कि सरकार के नीति-नियंताओं ने देश में “एग्रीकल्चर-पॉपुलेशन” को मात्र 18% पर लाने का पक्का मन बना रखा है।

मग़र सौभाग्य से हमारे देश में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हैं जो एक “संतुलित सोच” के साथ-साथ खुद को कर्रेंट-अफेयर्स से अपडेट रखते हैं।

उनकी सलाह के कारण सरकार उसे एकदम न गिराते हुए अभी 57% पर रखा गया है। लेकिन इनकी “नेशनल स्किल नीतियों” में स्प्ष्ट लिखा हुआ है कि,एग्रीकल्चर-पॉपुलेशन को बहुत जल्द 2022 तक 38% पर ले आया जाएगा। यानी सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा है ये। यदि आप इनके क्रिया-कलापों पर गौर करें,तो धीरे-धीरे इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना किसानों की खेती को सिकोड़ते जाना और उन्हें शहर की ओर डाइवर्ट करना, हर एक सरकार का एजेंडा रहा है।

हालांकि मैं भी एक “सैलरी-पेड” बंदा हूँ। मग़र सही बात को मैं न केवल हिर्दय से स्वीकारता हूँ वल्कि सदैव फ्रैंकली, किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर दावे के साथ बोलता भी रहा हूँ।

आप कभी भी देख लीजियेगा.. मैंने तो जब से होश संभाला है, चाहे घर परिवार, समाज में या देश-दुनियाँ के किसी भी स्तर पर मैं सदैव “सही नीयत व नीतियों” का ही पक्षधर हूँ..और रहूंगा।शायद इसीलिए किसी नेता या पार्टी का अंधभक्त बनने से अब तक बचा हुआ हूँ।

अब एक उदाहरण के माध्यम से मैं, किसानों के साथ सरकार की “दुराज नीतियों” पर थोड़ा प्रकाश डालने की हिमांकत कर रहा हूँ..

ध्यान दीजिएगा.. सन 1970 में गेंहूँ का दाम 76 रुपये कुन्तल था। जिसका (MSP) यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020 में 1975 निर्धारित किया गया था। (हालांकि ये MSP ज्यादातर सरकार की दिखावे वाली नीतियों का हिस्सा ही बनके रह गया है। बेचारे किसान को, तो इसबार मात्र 1600 रु प्रति कुन्तल का रेट ही मिल पाया है।)

अगर हम इस प्रकरण की “कम्पेरेटिव-स्टडी” में जाएं, तो पिछले पचास वर्षों में देश के अन्य लोगों की इनकम में वृद्धि के लिहाज़ से..

1- नेता,

2-ब्यूरोक्रेट्स एवं

3-सामान्य से सरकारी मुलाज़िमो की इनकम में लगभग 120 से 300 गुना तक की बढ़ोत्तरी हुई है।

औऱ यदि किसान की इनकम को गेंहूँ या धान की फसल की कीमतों से आंका जाय,तो मात्र 26 गुना ही वृद्धि हुई है। जो “न” के बराबर है। चलो ज्यादा गहराई में न जाते हुए..एक मोटे तौर ..पर,

मानलो आंकड़ों के मुताबिक पिछले 50 वर्ष में नेता, नौकरशाह व एक आम सरकारी कर्मचारियों की बढ़ोत्तरी जो 120 से 300 गुना तक हुई है। उसे देखते हुए.. भारतीय किसान को उसकी मेहनत का अगर केवल 100 गुना मूल्य भी दे दिया गया होता, तो आज उसके गेँहू के दाम कम से कम 7600/- रु कुन्तल के होते। तो आप ही बताइएगा फिर हमारे “धरती-पुत्र” क्यों ऐसी हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता..? नहीं ना!!

जबकि ऐसा करने पर सरकार की ओर से हम किसानों पर कोई एहसान नहीं होता। वो हम किसानों का हक है। जो हमें मिलना ही चाहिए।

मग़र सरकारों की “दुराज-नीति” ने देश की जनता को जाति,धर्मों में इस कदर बांट रखा है कि कुछ कहते नहीं बनता। हमारे किसान भाई सच्चे मन से एक प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर अपना दर्द भी बयान नहीं कर पाते हैं।

अभी भी वक़्त है देश के समस्त किसानों को अपनी “जन्म-जातियों” से निकल कर “कर्म-जाति” को तरजीह देकर संगठित होने के लिए। क्योंकि “संघे शक्ते कलै युगे” वर्तमान युग में सफलता का मूल मंत्र..भी है।

मुझे सन 1986 का वो मंज़र याद आ रहा है। जब मैं, 11th में पढ़ता था। मैंने किसानों के मसीहा श्री महेन्द्रसिंह जी टिकैत, को सासनी के “जैन इंटर कॉलेज, जिसमें सौभाग्यवश आज मैं एक शिक्षक के रूप में भी तैनात हूँ, पहली बार मैंने उन्हें बड़ी तल्लीनता के साथ सुना था। भले ही वो महान-आत्मा आज शरीर से हमारे बीच नहीं हैं। मग़र उनके बताए गए निर्देश हमारे अधिकतर किसान भाइयों को वक्त वक्त पर कई पीढ़ियों तक ऊर्जावान करते रहेंगे।

देश व प्रदेशों की सरकारों द्वारा किसान के प्रति बढ़ते अन्यायों को देखते हुए आज “महात्मा-टिकैत” जैसे व्यक्तित्व की कमी खलती है। काश! समूचे देश का किसान उस वक़्त सरकार की गलत नीतियों के ख़िलाफ़ एक साथ लामबंद हो गया होता! तो अन्य लोगों की तरह आज भारतीय-किसानों का भी अपना एक रजिस्टर्ड “संगठन” होता। देश के किसानों के पास सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के लिए एक स्वच्छ छवि की लीडरशिप होती, जो सरकारों की मनमानी को रोकने के लिए हमारे साथ खड़ी होती।

विडम्बना तो इस बात की है।जब भारतीय किसान यूनियन के वर्तमान अध्यक्ष श्री राकेश जी टिकैत कुछ प्रबुद्ध किसानों को एकत्रित कर सरकार से अपनी फसल का वाजिब दाम या किसी समस्या पर बात करते हैं, तो अक्सर कहा जाता है इतना पैसा कहाँ से आएगा..?

लेकिन कभी किसी ने पूछा है कि जब कॉरपोरेट को पैसा दिया जाता है, तब पैसा कहाँ से आता है..? या नेताओं व सरकारी तंत्र की पेंशन व भत्ते बढ़ाये जाते हैं तब पैसा कहाँ से आता है..?

हालांकि ये असम्भव सी बात है..लेकिन

हम लोगों में स्वार्थ-परता की स्थिति यहां तक है कि,

. मानलो सरकार भी यदि किसी तरह वर्ष में मात्र दो लाख करोड़ रुपये का पैकेज भी किसानों के लिए घोषित कर दे, तो देश में हा हा कार मच जायेगा..जबकि पिछले सातवें वेतन आयोग को लागू होने से सरकारी ख़ज़ाने पर चार लाख अस्सी हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा था।

उसके विरोध में हमारे किसान व मजदूर भाइयों ने तो कभी कुछ नहीं कहा!! हम सैलरी पेड को शर्म आनी चाहिए.. पूरा देश इसी ‘धरती-पुत्र की कमाई खाता है। सही बात नहीं कह सकते तो कम से कम किसानों से रिलेटेड मामलों में अपना मुंह बंद ही रखा करें।

मग़र ये भी अपनी जगह एकदम “कटु-सत्य” है कि, बेचारे किसान के सब दुश्मन हैं। जब देखो तब..सब इसी को काटते हैं। क्या सरकार क्या वकील क्या डॉक्टर.. न जाने क्यों..?? इतिहास गवाह है सभी की चाहत हमेशा किसान को गरीब ही देखने की रही है..?

देश में किसान व मजदूर वर्ग के ख़िलाफ़ सभी की जो मानसिकता है आज उसे बदलने की आवश्यकता है। अभी भी वक़्त है,किसान व मजदूर समय रहते संगठित हो जाएं।

चिंताजनक; मौजूदा रवैये से अभी कुछ ऐसा लग नहीं रहा..कि, देश में कृषि का भविष्य बहुत उज्जवल है।

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा

( नीमगांव से एक किसान-पुत्र)

67-“जीवन-यात्रा”..

मेरे ख्याल से आप इतने “बॉडी-कॉन्शियस” (देहाभिमानी) तो हो कि..जब कभी भी बाहर जाते हो,तो “समय से सुरक्षित” अपने घर लौटने का आशीर्वाद अपने बुजुर्गों से अवश्य लेते होगे.. ठीक वैसे ही हमें “सोल-कॉन्शियस” (आत्माभिमानी) भी होना चाहिए।जैसे; यदि आपने अपने जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी भी प्रारंभ करें… इससे पहले की देर हो जाये…इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये.. लौटना क्यों है❓ लौटना कहाँ है❓ लौटना कैसे है❓ इसे जानने, समझने एवं लौटने के निर्णय से मेरा आशय क्या है..? वो आइये… मैं आपको टॉलस्टाय की मशहूर कहानी के माध्यम से एकबार समझाने का प्रयास करता हूँ… “लौटना कभी आसान नहीं होता” एक आदमी राजा के पास गया कि वह बहुत गरीब है, उसके पास कुछ भी नहीं है, उसे मदद चाहिए… राजा दयालु था…उसने पूछा कि “क्या मदद चाहिए…?” आदमी ने कहा.. “थोड़ा-सा भूखंड अर्थात उसका मतलव “जमीन” से था।” राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आ जाना…ज़मीन पर दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा ही हो जाएगा। परंतु ध्यान रहे, जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, जितना भूखंड अपने कदमों से नाप दोगे, सब तुम्हारा हो जाएगा। अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा…!” पूर्ण भौतिकवाद में लिप्त अज्ञानी लोगो, याद रहे.. “भूखंड की भूख जीवन से कभी मूल्यवान नही होती।”परन्तु वह आदमी खुश हो गया… सुबह हुई… सूर्योदय होते ही वह आदमी दौड़ने लगा… आदमी दौड़ता रहा…दौड़ता रहा…सूरज सिर पर चढ़ आया था…पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था…वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था…उसने भी वही सोचा होगा जो अमूमन लोग सोचते हैं। थोड़ा और. मेहनत करलें …फिर पूरी ज़िंदगी आराम ही आराम है। यही वो लालसा है जो इस बेशकीमती-जीवन को एक बोझा बनाके रख देती है…शाम होने लगी थी…आदमी को याद आया, लौटना भी है, नहीं तो सारी दौड़ घुन जाएगी। फिर कुछ नहीं मिलेगा… मग़र उसने देखा, वो काफी दूर चला आया था…अब उसे लौटना था…पर कैसे लौटता…? सूरज पश्चिम की ओर मुड़ चुका था…आदमी ने पूरा दम लगाया…उसे लग रहा था वो लौट सकता है…पर समय तेजी से बीत रहा था…थोड़ी ताकत और लगानी होगी…वो पूरी गति से दौड़ने लगा…क्योंकि अधिक जमीन की लालसा में दिन भर दौड़ता ही रह था। अब उस पर दौड़ा ही नहीं जा रहा था…वो पूरी तरह थक चुका था। इसलिए थककर गिर गया…औऱ उसके प्राण वहीं निकल गए..! (जैसे ईश्वर सब कुछ देख रहा होता है वैसे ही..) यहाँ राजा यह सब देख रहा था… अपने सहयोगियों के साथ वो वहां गया, जहां आदमी ज़मीन पर गिरा था… राजा ने उसे गौर से देखा… फिर सिर्फ़ इतना कहा… “इसे सिर्फ दो गज़ ज़मीं की दरकार थी…नाहक ही ये इतना दौड़ रहा था…! ” आदमी को लौटना था…पर लौट नहीं पाया…. जैसे; “जीवात्मा संसार में आने का अपना मूल कारण भूल कर दुनियाँ के भंवर जाल में फंसती चली जाती है।अच्छे लोगों की संगति पाकर अपने धेय की ओर कई बार लौटना भी चाहती है। विल्कुल वैसे ही।” ये व्यक्ति भी लालसा में ऐसा भटक गया.. कि अपने “स्टार्टिंग-पॉइंट” पर लौट ही नहीं सका। उसे मिली मृत्यु.. अर्थात पूर्ण विराम. ! चिर निद्रा !!! देह छूटी..तो सदगति में “आत्मा” परमात्मा में विलीन..हो जाती है या फिर अज्ञानता के वशीभूत जन्म मरण…के भंवर में हिचकोले खाती रहती है।जीवन का अंतिम “सत्य” तो यही है! 👉🏻 शिक्षा;- अब ज़रा उस आदमी की जगह हम अपने आपको रख कर कल्पना करें, कही हम भी तो वही भारी भूल नहीं कर रहे जो उसने की… हमें अपनी चाहतों की सीमा का पता नहीं होता… हमारी ज़रूरतें तो सीमित होती हैं, पर चाहतें अनंत… अपनी चाहतों के मोह में हम लौटने की तैयारी ही नहीं करते…अगर जब कभी करते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। फिर हमारे पास कुछ भी नहीं बचता। सुझाव;- अतः आज अपनी डायरी और पैन उठाये, कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर अनिवार्य रूप से लिखें… मैं जीवन की दौड़ में सम्मलित हुआ था, “आज तक कहाँ पहुँचा.. ? आखिर मुझे जाना कहाँ है..? और कब तक पहुँचना है.. ? इसी तरह दौड़ता रहा तो कहाँ और कब तक पहुँच पाऊंगा.. ? वगैरा वगैरा.. दरअसल हम सभी दौड़ रहे हैं…बिना ये समझे कि सूरज समय पर लौट जाता है… अभिमन्यु भी लौटना नहीं जानता था…हम सब अभिमन्यु ही हैं…हम भी लौटना नहीं जानते..इतिहास से सीखो “चक्रव्यूह में प्रवेश ही पर्याप्त नहीं होता !” सच ये है कि “जो लौटना जानते हैं, वही वास्तव में जीवन “जीना” भी जानते हैं…” पर लौटना इतना भी आसान नहीं होता… काश ! मशहूर विचारक टॉलस्टाय की कहानी का वो पात्र समय से लौट पाता…! कहीं वो पात्र “मैं” ही तो नही था.. ?अपने आप से ऐसा सवाल करें.. हम सदा के लिए नहीं हैं ! हमसे पहले अरबों हुए हैं…, …और आगे भी होगें…! समय अपनी गति से सदैव अनवरत चलता रहेगा.. आखिर हम कितने महान लोगों को जानते है ? कितनो को हम याद रखते हैं ? अगर सदैव हरपल अपने “सकारात्मक-कर्म” करते वक्त हमें सिर्फ एक परमपिता परमात्मा ही याद रहे, पर्याप्त है ! निश्चित रूप से जन्म सफल हो जायेगा। “मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हम सब समय रहते लौट पाए…! लौटने का विवेक, सामर्थ्य एवं निर्णय हम सबको मिले…सबकी “जीवन-यात्रा’ मंगलमय हो..”✍️ धन्यवाद

विचारक: युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा। (शिक्षक; जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस।)

66-“No Breakfast”

समस्त रोगों की जड़ है रात्रि भोजन.. किसी पक्षी को डायबिटीज है क्या ऐसा कभी आपने सुना है..? या किसी बन्दर को ‘हार्ट-अटैक’ आया हो.. नहीं, ना। कोई भी जानवर न तो आयोडीन नमक खाता है और न ब्रश करता है, फिर भी किसी को थायराइड नहीं होता और न दांत खराब होते हैं। बन्दर “शारीरिक-संरचना” में मनुष्य के सबसे नजदीक है, बस बंदर और आप में यही फर्क है कि बंदर के पूँछ है आप के नहीं है, बाकी सब कुछ समान है। तो फिर बंदर को कभी भी हार्ट-अटैक, डायबिटीज , high BP , क्यों नहीं होता..? एक पुरानी कहावत है कि, “बंदर कभी बीमार नहीं होता” और यदि बीमार हुआ भी तो जिंदा नहीं बचता,मर जाता है! आख़िर, बंदर बीमार क्यों नहीं होता..?इसके जवाब में… मेरे एक मित्र बताते हैं कि एक बहुत बड़े, प्रोफेसर हैं, जो मेडिकल कॉलेज में काम करते हैं । उन्होंने एक बड़ा “गहरा-रिसर्च” किया कि, बंदर को बीमार बनाओ। तो उन्होने तरह-तरह के virus और वैक्टीरिया बंदर के शरीर में डालना शुरू किया, कभी इंजेक्शन के माध्यम से तो कभी किसी और माध्यम से.. वो कहते है, मैं ये करने में 15 साल असफल होता रहा, लेकिन बंदर को कुछ नहीं हुआ। मित्र ने प्रोफेसर से कहा कि आप यह कैसे कह सकते है कि बंदर को कुछ नहीं हो सकता ? तब उन्होंने एक दिन जो रहस्य की बात बताई वही इस लेख का आधार बनी.. लेख के माध्यम से मैं आपको भी शेयर कर देता हूँ…… कि, बंदर का जो “RH” factor है वह सबसे आदर्श है। कोई डॉक्टर जब आपका RH-factor नापता है, तो वह बंदर के ही “RH Factor’ से Compare करता है, वह डॉक्टर आपको बताता नहीं ये अलग बात है। यही वो कारण है कि, उसे कोई बीमारी आ ही नहीं सकती। उसके ब्लड में कभी कॉलेस्टेरॉल नहीं बढ़ता, कभी ट्रायग्लेसराइड नहीं बढ़ती, न ही उसे कभी डायबिटीज होती है । शुगर को कितनी भी बाहर से उसके शरीर में इंट्रोडयूस करो, वो टिकती नहीं । तो वह प्रोफेसर साहब कहते हैं कि यही चक्कर है, “बंदर सबेरे-सबेरे ही भरपेट खा लेता है। मग़र आदमी इतना स्टाइलिश है कि वह सुबह भरपेट नहीं खा पाता। इसीलिए उसको इतनी सारी बीमारियां होती है। सूर्य निकलते ही सारे पक्षी व अधिकतर जानवर अपना खाना खा लेते हैं। जब से मनुष्य इस ब्रेकफास्ट,लंच , डिनर के चक्कर में फंसा है। तब से ही मनुष्य ने इन बीमारियों को निमंत्रण दिया हुआ है। और अस्वस्थ रहने लगा है। प्रोफेसर “रवींद्रनाथ शानवाग” ने अपने सभी मरींजों से कहा कि “सुबह-सुबह” भरपेट खाओ। तो उनके मरीज बताते हैं कि, जबसे उन्होंने सुबह भरपेट खाना शुरू किया है तबसे उन्हें डायबिटीज (शुगर) कम हो गयी, किसी का कॉलेस्टेरॉल कम हो गया, किसी के घुटनों का दर्द कम हो गया , किसी का कमर का दर्द जाता रहा। गैस बनाना बंद हो गई, पेट मे जलन होना बंद हो गया ,नींद अच्छी आने लगी ….. वगैरह ..वगैरह । और यह बात “बाणभट्ट जी” ने 3500 साल पहले कह दी थी कि, “सुबह पूर्ण भोजन ले लेना स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा रहता है।” इसका वैज्ञानिक कारण है कि, “सुबह सूरज निकलने से ढाई घंटे तक यानि 9.30 बजे तक, ज्यादा से ज्यादा 10 बजे तक आपका पेट भर जाना चाहिए” यानि भोजन ले लेना चाहिए और ये तभी सम्भव होगा जब आप “नाश्ता-बंद” करेंगे। ध्यान रखिये ये नाश्ता का प्रचलन हिंदुस्तानी नहीं है , यह भी अंग्रेजो की ही देन है,और दूसरा-भोजन यानि “रात्रि का भोजन” सूर्य अस्त होने से आधा घंटा पहले कर लेंना चाहिए। तो ही आप बीमारियों से बचेंगे। क्योंकि सुबह “सूर्य निकलने से ढाई घंटे तक” हमारी जठराग्नि बहुत तीव्र होती है । ध्यान रहे इस जठराग्नि का सम्बन्ध सूर्य से है। इस बात का अनुभव सबको है कि नहाने के बाद तुरन्त भूख लगती है वो इसलिए कि हमारी “जठराग्नि” सबसे अधिक तीव्र स्नान के बाद ही होती है । स्नान के बाद पित्त बढ़ता है , इसलिए सुबह स्नान करते ही भोजन कर लें । तथा एक स्वस्थ-व्यक्ति “एक-भोजन” से “दूसरे-भोजन” के मध्य कम से कम 4 और अधिक से अधिक 8 घंटे का अंतराल अवश्य रखें। अर्थात इस बीच कुछ न खाएं, और दिन डूबने (सूर्यास्त) के बाद तो बिल्कुल भी न खायें। चूंकि ये तो कई दृष्टिकोणों से आपके लिए हितकर नहीं है। “स्वस्थ रहे, मस्त रहें” जीवन में योग, प्राकृतिक-चिकित्सा एवं आयुर्वेद अपनाए ताकि “निरोगी-जीवन” का आनंद उठा सकें। धन्यवाद

निवेदक/विचारक : YUG.पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

65- “भटकाव से बचें”

दुनियादारी में भटकाव बहुत है मग़र शिक्षित वही जो “भटकें नहीं” ।

जी हाँ, अक्सर देखा जाता है कि “व्यक्ति होश सम्भालते ही अतिभौतिकवादी वातावरण में परवरिश होने से “अध्यात्मवाद” जो पूर्ण प्राकृतिक है उससे काफ़ी दूर होता चला जाता है।

अगर “भटकाव से बचें ” के सन्दर्भ में कुछ बयां किया जाय, तो भारतीय समाज में कई एक अवधारणाओं के लोग हैं। जो शायद स्थिर भी नहीं हैं, आज किसी पाले में, तो कल किसी और पाले में ये स्तर है जो बहुत निम्न है।

एक तो, वे हैं जो सामाजिक स्तर पर जीवन से जुड़ी हुई रोज-मर्रा की बातों में अच्छे जानकार है। वे अपने अनुभव से आने वाली परिस्थिति को पूर्व में ही भांप लेने की दूरदृष्टि रखने के साथ-साथ अपने साथियों को भी सदैव नेक सलाह देकर जीवन को आनंद के साथ जिंदा-दिली से जीते हैं।

दूसरे वे होते हैं,जो आपने देखा होगा कि, धार्मिक-स्थलों की दीवारों पर एक “खूबसूरत-सच” अक्सर लिखा मिल जाता है.. “यदि व्रत व उपवास रखने से ईश्वर खुश होता…, तो कई-कई दिन फाके..( भूखे) ही सो जाने वाले भिखारी से वह न केवल बहुत खुश होता, अपितु भिखारी ही आज दुनियाँ का सबसे सुखी इंसान होता।”

इस विषय पर मेरा ऐसा मानना है कि जिस दिन उपवास में हों, उस दिन आप किसी भूखे “जीव” (जैसे; जानवर, पक्षी, या किसी असहाय इंसान) को कम से कम एक वक्त का भोजन करा सकें। तब तो निश्चय ही खाने के व्रत का कोई अर्थ होता है।

ऐसा करने से सप्ताह में एक दिन का उपवास आपकी बढ़ती हुई अतिरिक्त चर्बी आदि को सन्तुलित करने के साथ-साथ “आत्मिक-स्तर” पर मानवता की ओर बढ़ने वाला आपका एक सार्थक कदम साबित होगा। जो आपको पूरी तरह आत्मशक्ति से भर देगा।

अन्यथा मेरा एक और सुझाव है, यदि आप अपने जीवन में उपवास, व्रत या किसी भी तरह का संकल्प लेना ही चाहते हैं, तो सामाजिक-प्रदूषण से बचते हुए “विचारों की शुद्धता” का लें… क्योंकि पारम्परिक व्रत “सिर्फ एक वक़्त का भोजन छोड़ देने का है। अगले दिन फिर व्यक्ति वही “जस का तस” मेरा मतलव वह वैचारिक व व्यवहारिक स्तर पर वैसे का वैसा ही रह जाता है। उसमें कोई रूपांतरण नहीं दिखता। तो फिर क्या..मतलव ?

आपने देखा ही होगा कि, चिड़िया जब जीवित होती है, तो कीड़े-मकोड़े खाती है। और जब चिड़िया मर जाती है,तो कीड़े-मकोड़े उसे खा जाते हैं।

इसलिए एक बात सदैव ध्यान रखें, “समय” और “स्थिति” के अनुरूप आपके द्वारा किया हुआ “कर्म” कभी भी निष्प्रभावी नहीं हो सकता। उसका प्रभाव कर्म करने वाले पर निःसन्देह पड़ता है।

इसलिए बड़े-बुजुर्ग बार-बार कहते हैं..कि, “बेटा ! ठंड रख..दुनियाँ विच, देरी जरूर है, मग़र अंधेरी विल्कुल ना है।”

प्रयास करो कि कभी आपके द्वारा किसी सज्जन का अपमान न हो, किसी क्षेत्र में तुम शक्तिशाली या सामर्थ्यवान हो सकते हो परन्तु ध्यान रखो “समय” सर्व शक्तिमान है।

जैसे; एक पेड़ से माचिस की लाखों तीलियाँ बनायी जाती हैं और सिर्फ एक तीली से लाखों पेड़ जलाए भी जा सकते हैं।

ईश्वर ने रूप दिया मोर को, तो “इच्छा” छीन ली।

ईश्वर ने “इच्छा” दी इंसान को, तो “संतोष” छीन लिया।

और “संतोष” दिया सन्त को, तो “संसार” छीन लिया।

अपने “आप” में मगुरूर न रहें बड़ों की भी सुनें। इस “जीवन-चक्र”को न भूलें सदैव याद रहे..कि,

“ईश्वर, दुनियाँ… में हर दिन ‘तेरे और मेरे’ जैसे लाखों को एक खिलोने की तरह मिट्टी से बनाकर और फिर वक्त पूरा होने पर पुनः उसी मिट्टी में मिला देता है।”

तो फिर गुरूर… किस बात का…?

जीवन में सदमार्ग पर चलते रहने के लिए “व्यवहारिक एवं वैचारिक” दोनों स्तर पर पवित्रता जरूरी है।

आंकड़े कहते हैं कि दुनियाँ की अस्सी फ़ीसदी मानव-आबादी अपना बहुमूल्य “जीवन” न केवल आधारहीन वल्कि, पूरी तरह भौतिक वातावरण में इन तीन बातों में ही गवां दे रही है।

न.01- मेरा नाम सबसे ऊंचा हो,

न.02- मेरा लिवास सबसे अच्छा हो। और

न.03-मेरा निवास (मकान) भी बहुत ख़ूब सूरत हो।

लेकिन “विधी का विधान” भी बड़ा निराला है। वह इंसान के शरीर छोड़ते ही उसकी इन तीनों चीजों को जो उसने बड़े चाव से बनाई थी, एक क्षण में बदल के रख देता है…

01-नाम : स्वर्गीय हो जाता है, 02-लिवास : क़फ़न हो जाता है 03-निवास : श्मशान हो जाता है।

मांफ कीजियेगा.. मेरा किसी को डराने का कोई इरादा नहीं है। मग़र “सच्चाई” यही है।

इसलिए सभी के साथ-साथ मेरा खुद से भी कहना है…कि, “भटकाव से बचें ” आंकड़ों के अनुसार ..

1- दुनियाँ की एक बहुत बड़ी आबादी जिसे विद्वानों ने “भौतिक-जगत” के नाम से पुकारा है। वे 80% लोगों की भीड़ है।

2- 12% लोग “मानसिक-जगत” में है। और

शेष 08% लोग 3-“आत्मिक-जगत” के हैं।

प्रबुद्ध वर्ग के अनुरूप ये दुनियाँ की सम्पूर्ण आबादी की कैलकुलेशन है।

अब आप कहाँ स्टैंड करते हैं ये व्यक्तिगत “आत्मावलोकन” का मामला है। जो सदैव पर्सन टू पर्सन डिफ्रेंसियेट होता है।

धन्यवाद👍 विचारक ; युग पचहरा, के.एल.जैन इ.कॉलेज,सासनी, हाथरस।

64-“विकार”

दरअसल, असीमित मनोवृत्ति ही “विकार” है। भारतीय धर्म ग्रंथों में  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पाने के लिए.. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार-इन पांच विकारों के त्याग पर बहुत बल दिया गया है। लेकिन विचार कीजियेगा यहाँ कई एक सवालों को जगह मिल रही है..  क्या ये पांच ही विकार की श्रेणी में आते  हैं.? अगर आते हैं, तो किस हद तक.? त्याज्य हैं, तो क्या ये पूरी तरह त्याज्य हैं.?  क्या मानव सचमुच इन विकारों का पूरी तरह से त्याग करने में सक्षम है.? ध्यान से सोचें तो,  काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार-“पूरी तरह से” विकार की श्रेणी में ही नहीं आते..? ये.. क्या कोई भी कितनी भी अच्छी चीज़ जब अपनी सीमा का उल्लंघन करती है या यों कहें कि किसी भी स्तर पर “अति” होती है, तब वो अति वाली “वृत्ति” ही “विकार का रूप” ले लेती है। अन्यथा जब तक हद में है तब तक तो सब ठीक ही होता है। हां, यदि आप इनका व्यवहारिक-पक्ष देखें, तो बिना इनके मानव अपना सांसारिक जीवन बखूबी नहीं चला पाता। ‘अति’ तो भोजन की भी दु:खदाई होती है। फिर इन पाँच को ही क्यों पहले से विकार की श्रेणी में मान लिया गया है.? जैसे; काम या शक्ति के अभाव में पितृ ऋण से मुक्ति संभव नहीं है।क्रोध वह शक्ति है जो आवश्यकता पड़ने पर मानव को सुरक्षा प्रदान करता है। घर या किसी व्यवस्था में एक नियम-अनुशासन स्थापित करता है। लोभ एक आवश्यकता है, जिसके बिना पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह कठिन है। ठीक वैसे ही मोह मानव को पितृत्व व मातृत्व के साथ-साथ अन्य रिश्तों के दायित्व को निभाने की प्रेरणा देता है। मनुष्य की जिस वृत्ति को हम अहंकार कहते हैं, उसके लिए ‘अहंकार’ शब्द का प्रयोग तब किया जाता है, जब ये “वृत्ति”अपनी सीमा का उल्लंघन करती है।,अन्यथा इससे पूर्व तो वह “स्वाभिमान” ही होता है, जिसका प्रत्येक मानव में होना आवश्यक है। स्वाभिमान के बिना “जीवन”कोई जीवन नहीं रह जाता.. 🙏🏻धन्यवाद। 

विचारक/शिक्षक   ; युग पचहरा, हाथरस

63- “प्रकृति-सन्देश”

सम्पूर्ण मानव जाति को नैतिक सन्देश करते हुए “प्रकृति” देवी ने पूरी दुनियाँ में दो प्रकार के पेड़-पौधे उपजाए हैं।

प्रथम : वे जो पक जाने पर अपना फल स्वयं, सहर्ष भाव से सांसारिक जीवों को खाने के लिए दे देते हैं, जैसे – आम, अमरुद, केला इत्यादि ।

द्वितीय : दूसरे वे जो अपना फल मिट्टी में छिपाकर पैदा करते हैं, जैसे – आलू, अदरक, प्याज इत्यादि। जिन्हें कंद कहा गया है।

प्रथम: प्रकार वाले जो पूरे मैच्योर पेड़ होते हैं वे अपना फल पक जाने पर स्वाभाविक रूप से अपने आप परमार्थ हेतु दूसरे जीवों को सौंप देते हैं, उन वृक्षों को सभी मनुष्य खाद-पानी देकर सुरक्षित भी रखते हैं, और ऐसे वृक्ष फिर से खुशी-खुशी फल देने के लिए पुनःतैयार हो जाते हैं। ये प्रक्रिया अनवरत वर्षों पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है…

किन्तु दूसरे जिनकी प्रकृति अपना फल छिपाकर रखने की होती है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं, और ऐसे पौधों या बेल के नष्ट हो जाने की परवाह किए बिना उनके फलों को ले लिया जाता है।

ठीक इसी प्रकार… प्रथम: प्रकार के पौधों की तरह.. जो व्यक्ति अपनी विद्या, धन, शक्ति आदि को परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद अतिरिक्त को स्वेच्छा से जरूरत मंद जीवों के उत्थान हेतु परमार्थ में लगा देते हैं, उनके मान-सम्मान का न केवल सभी लोग ध्यान रखते हैं। वल्कि उन पर प्रकृति रूपी देवी की कृपा वर्षा सदैव बनी रहती हैं।

दूसरी ओर…जो इंसान अपनी विद्या, धन, शक्ति आदि को अति स्वार्थवश छिपाकर रखते हैं,अपनी सामर्थ्य के अनुरूप कभी किसी के काम नहीं आते हैं सदैव ऐसे मंजरों से मुख मोड़े रखते है “वे एक दिन खुद व खुद अपने कर्मों से जड़ सहित न सिर्फ उखड़ जाते है, अपितु उनके जीते जी उनका परिवार, समाज व देश- दुनियाँ ऐसे संकीर्ण मन वाले लोगों को न केवल भुला देते हैं बल्कि अपने व्यावहारिक चलन से ऐसे निकाल देते हैं जैसे “दूध में से मक्खी” इसी अवस्था को विद्वान लॉबी पारिवारिक एवं सामाजिक मौत का नाम देती है।

आप ही विचार कीजिए क्या ऐसे लोग जीते जी मुर्दे के समान नहीं हो जाते..??

उन्हें कोई कहीं भी नहीं पूछता..??

बताइए!! सभी जीवों में श्रेष्ठ एवं दुर्लभ कहे जाने वाली ये “मानव देह” क्या अपना सब कुछ ..केवल इस पारिवारिक भट्टी में ही झोंकने के लिए मिली है..??

जी, नहीं हर इंसान को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक अपने आस पास या संपर्क में आए.. असहाय जीवों,पेड़-पौधों एवं जरूरतमंदों की.. “मदद करना” हम मनुष्यों का नैतिक व मानवीय दायित्व है।

इसीलिए दायरे में रहते हुए..ये जीवन उन पर अपनी करुणा दिखाने के लिए मिला है।”

शिक्षा : “प्रकृति” हमे कितना महत्वपूर्ण संदेश देती है, इस संदेश को समझने के बाद बस अपने जीवन में उतारने की महती आवश्यकता है।”

इस लेख को गंभीरता पूर्वक न सिर्फ पढ़ने अपितु अनुकरण करने के लिए मेरा आपको ह्रदय तल से धन्यवाद है। 👍

; योगेंद्र सिंह पचहरा,पौत्र श्री साहब सिंह ‘मुखिया जी’ नीमगाँव,राया,मथुरा

62 “नींव की ईंट”..

एक सच ऐसा.. जो हमसे इतिहास ने भी छुपाया 👇

“किसी भी सन्दर्भ में ‘नींव की ईंट’ का महत्व न भूलें क्योंकि सदैव के लिए आधार उसी पर टिका रहना है। “कंगूरे की ईंटो का क्या..! वक्त के थपेड़े उन्हें कब कहाँ ले जा के पटक दें।”

45 साल के महात्मा गाँधी, लगभग 20 वर्ष से भी ज्यादा समय दक्षिण अफ्रीका में बिता कर 1915 में भारत आते हैं। जबकि..
इनसे भी 4 वर्ष पहले 28 वर्ष का एक युवक भारत देश को आज़ादी दिलाने के संघर्ष में अंडमान की एक कालकोठरी में बन्द होता है। अंग्रेज उसे दिन भर कोल्हू में बैल की जगह हाँकते हुए तेल पिरवाते हैं, रस्सी बटवाते हैं और छिलके कूटवाते हैं। वो फिर भी वहाँ उन विकट परिस्थितियों में तमाम कैदियों को शिक्षित कर रहा होता है, उनमें राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ जगा कर उसे प्रगाढ़ कर रहा होता है। और साथ ही दीवालों कर कील, काँटों और नाखून से साहित्य की रचना भी कर रहा होता है।
भारत के ऐसे महान सपूत का नाम था- “विनायक दामोदर सावरकर”।
जो बाद में “वीर सावरकर” के नाम से जाने गए।

उन्हें उस गंदे वातावरण में आत्महत्या के ख्याल भी आते थे। कभी कभी उस खिड़की की ओर एकटक देखते रहते.., जहाँ से अन्य कैदियों ने छलांग लगा कर आत्महत्याएँ की थी। पीड़ा असह्य हो रही थी। यातनाओं की सीमा पार हो रही थी। अंधेरा उन कोठरियों में ही नहीं, दिलोदिमाग पर भी छाया हुआ था। दिन भर बैल की जगह जुतो.., और रात को करवट बदलते रहो। उनके 11 वर्ष ऐसे ही बीते। परन्तु व्यवहार ही है जो सर्वत्र काम आता है। वहां कैदी उनकी इतनी इज्जत करते थे कि, मना करने पर भी उनके बर्तन, कपड़े वगैरह स्वतः धो दिया करते थे, उनके सभी कामो में मदद करते थे। इसीलिए अँग्रेज बाकी कैदियों को सावरकर से दूर रखने की फ़िराक में रहते थे। अंत में ‘बुद्धि’ की विजय हुई, तो उन्होंने अन्य कैदियों को भी आत्महत्या करने से बचाया।

लेकिन अपने ही देश में ही परजीवियों की तरह पल रहे..महा गँवारों का कहना है कि सावरकर ने मर्सी पिटीशन लिखा, सॉरी कहा, माफ़ी माँगी..
ब्ला-ब्ला-ब्ला।

है! मूर्खों, काकोरी कांड में फँसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने भी माफ़ी माँगी थी, तो..? उन्हें भी क्या ‘डरपोक’ करार दोगे..? बताओ!

उन्होंने भी माफ़ी ही माँगी थी अंग्रेजों से…
मेरे भाई, तुम बावले हो! इस तरह के कदम ‘मांफी’ के दायरे में नहीं आते..

कई बार ऐसा कुछ.. रणनीति के तहत भी किया जाता है। इतिहास उठाकर देखो, महान व्यक्तित्व देशहित में ऐसे “स्ट्रेटेजी-स्टेप्स” सदैव से लेते आये हैं,और आगे भी लेने पड़ सकते हैं। इसलिए कभी भी इस कसौटी पर क्रांतिकारियों को तौलने की भूल मत करियेगा। आपको पता होना चाहिए..

“शेर जब बड़ी छलाँग लगाता है तो उसे भी कुछ कदम पीछे लेने ही होते हैं।”
ये वो ही स्थिति थी।
उस समय उनके मन में क्या था, आगे की क्या रणनीति थी..?
ये लोग घर में बैठे-बैठे गाल बजाने वाले क्या जानें..?
कौन ऐसा स्वतंत्रता सेनानी है जिसे 11 साल कालापानी की सज़ा मिली हो..?
नेहरू..? गाँधी..? क्या इनमें से कोई था ..?

ये तथ्य भी जान लीजिए ..
नानासाहब पेशवा, महारानी लक्ष्मीबाई और वीर कुँवर सिंह जैसे कितने ही “अनाम” वीर इतिहास में दबे हुए हैं। जबकि कायदे से आज़ादी दिलाने में वही पूज्यनीय “नींव की ईंट” हैं।

मालूम है,1857 को सिर्फ सिपाही विद्रोह बता दिया गया था।
तब इसके पर्दाफाश के लिए 20-22 साल का एक युवक लंदन की एक लाइब्रेरी का किसी तरह एक्सेस लेकर और दिन-रात एक कर अँग्रेजों के सारे छुपे हुए दस्तावेजों को पढ़ कर “जो सच्चाई भारतीयों से छुपाई गयी थी” उसकी तह तक गया, उसने साबित कर दिया कि ये सैनिक विद्रोह नहीं, वल्कि ये प्रथम “स्वतंत्रता संग्राम” था। उसके सभी अमर बलिदानियों की गाथा उसने जन-जन तक पहुँचाई। भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारियों ने मिल कर उसे पढ़ा, अनुवाद किया।

दुनिया में कौन सी ऐसी पुस्तक है जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था..? और क्यों..?
उस मंज़र को समझने का प्रयास कीजिये..अँग्रेज उससे कितने डरे हुए थे..? कि हर वो इंतजाम किया गया, जिससे वो पुस्तक भारत तक न पहुँच सके। मग़र फिर भी किसी न किसी तरह पहुँचा के ही दम लिया और फिर क्या था..जैसे “क्रांति की ज्वाला” में ‘घी’ की आहुति पड़ गई हो।
“कलम और दिमाग”, दोनों के बल पर अँग्रेजों से लड़ने वाले…
“सावरकर” थे।
दलितों के उत्थान के लिए काम करने वाले ‘सावरकर’ थे।
11 साल कालकोठरी में बंद रहने वाले ‘सावरकर’ थे।
हिंदुत्व को पुनर्जीवित कर के राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले ‘सावरकर’ थे। साहित्य की विधा में पारंगत योद्धा भी “वीर-सावरकर” ही थे।
परिणामस्वरूप..
आज़ादी के बाद उन्हें क्या मिला..? “अपमान”
नेहरू व मौलाना जैसों ने तो सत्ता की मलाई चाटी, “सावरकर” को गाँधी हत्या केस में फँसा दिया, गिरफ़्तार किया।, पेंशन तक नहीं बनने दी।, प्रताड़ित किया।,
60 के दशक में उन्हें फिर गिरफ्तार किया, प्रतिबंध लगा दिया।
उन्हें सार्वजनिक सभाओं में जाने से मना कर दिया गया।
ये सब उसी भारत में हुआ, जिसकी स्वतंत्रता के लिए “वीर सावरकर” ने अपना जीवन खपा दिया। विचार कीजिये इस विडम्बना पर “आज़ादी के मतवालों से उन्हीं के अपने देश में ‘आज़ादी’ छीन ली गई..?
जिसे उसने आज़ाद करवाने में योगदान दिया था।
हां बाद में श्री लाल बहादुर शास्त्री जी जब PM बने तो उन्होंने जरूर उनकी पेंशन का जुगाड़ कर दिया था।
दूरद्रष्टा;-
जब सावरकर अंडमान की जेल में थे तो वे कालापानी में अपने साथी कैदियों को समझाते थे कि ..
भाइयों! धीरज रखो, एक दिन आएगा जब ये जगह तीर्थस्थल बन जाएगी। आज भले ही हमारा पूरे विश्व में मजाक बन रहा हो, एक समय ऐसा होगा जब लोग कहेंगे कि देखो,
इन्हीं कालकोठरियों में अंग्रेजों के अन्याय के कारण हिंदुस्तानी देशभक्त कैदी की तरह बन्द रहे थे। सावरकर कहते थे कि तब उन्हीं कैदियों की यहाँ प्रतिमाएँ होंगी। वाक़ई वो दूरद्रष्टा ही थे।आज आप अंडमान जाते हैं, तो सीधा “वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट” पर उतरते हैं। सेल्युलर जेल में उनकी प्रतिमा लगी है। उस कमरे में वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी इस भाव से जाकर “ध्यान-साधना” करके आये हैं। शायद उस “युग-पुरुष” की आत्मा कुछ मार्गदर्शन करे..जिसमें ‘सावरकर’ को रखा गया था।

“हजारो झूले थे फंदे पर, लाखों ने गोली खाई थी
क्यों झूठ बोलते हैं सब, चाचा कहलवाने व चरखे से आजादी आई थी।”
…धन्यवाद
🙏🏻 सादर नमस्कार
;पचहरा,युग

नीमगाँव, राया मथुरा।

61″वैचारिक-छवि”

What do You think .. about a “Thoughtful-Image”?

As; “Man is mortal while thought is immortal”

मेरा ऐसा मानना है कि,

मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूंजी उसके अपने “विवेकपूर्ण-विचार” ही होते हैं, जिनकी उम्र.. मनुष्य से कहीं अधिक होती है। इतिहास में झांककर देख लीजियेगा.. एकदिन मनुष्य शरीर से देश-दुनियाँ में नहीं होता है। मग़र परिवार, समाज, और दुनियाँ में.. जिस स्तर की उसकी “वैचारिक-छवि” रही होती है। वैसी उसकी चर्चा समय-समय पर गाहे-वगाहे कहीं न कहीं लोगों द्वारा हो ही जाती है। अर्थात वह अपनी “वैचारिक-आभा” के रूप में लोगों के बीच सदैव मौजूद रहता है।

जैसे ;- स्वामी विवेकानंद, एडिशन ,जॉन मिल्टन आदि महामानव…..

अतः इस संदर्भ में,

मैं अक्सर ख़ुद को भी यही परामर्श करता हूँ..कि, मनुष्य के सामने “स्थिति-परिस्थिति” चाहे जितनी भी विपरीत क्यों न हों अगर वो चाहे तो, नैतिक, मानवीय व सामाजिक-मूल्यों से समझौता किये बिना भी एक “सरल जीवन” जी सकता है। अर्थात खुद को इंसानियत की परिधि में रख कर चल सकता है।

इतिहास साक्षी है कि ‘धन और बल’ की अधिकता ने वैचारिक रूप से कमजोर लोगों को सदैव ‘भटकाया’ ही है।

इसीलिए यदि आपका ‘वैचारिक धरातल’ मजबूत है, तो ही आप अच्छे कार्यो के प्रति अग्रसर रह सकेंगे !!

अन्यथा,अवरोधकों की कहीं कोई कमी नहीं है।

दुनियाँ के दस्तूर में मनुष्य को ईश्वर से प्राप्त “मुक्त-इच्छा”(Free-will) की सुविधा के तहत भटकाव के हाथों मज़बूर होने पर ख़ुद के द्वारा किये गए “विकर्मों” (दुष्कर्मों) के परिणाम स्वरूप ‘अर्श से फर्श’ पर आने में बहुत ज्यादा देर नहीं लगती!

विशेषकर इसीलिये

मनुष्य के “वैचारिक-प्रबंधन” का सिस्टेमेटिक होने के साथ-साथ मर्यादित होना भी नितांत आवश्यक है। वरना आप भी जानते हैं और इतिहास तो साक्षी है ही। चाहे व्यक्ति, परिवार,समाज, संस्थान व देश जो वक़्त रहते नहीं सम्भलते हैं, वे लोगों के लिए महज़ एक दास्तान बनके रह जाते हैं।

अतः “जब आँख खुलीं.. तभी सबेरा” वाले सिद्धांत से भी मनुष्य अपने आपको तत्काल रूपांतरित (Transform) करले तो भी मेरे ख़्याल से कुछ ग़लत नहीं है।

धन्यवाद युग पचहरा

नीमगाँव,राया, मथुरा।

60- “सरल-होना” कठिन…

Do You Know..? ईश्वर ने सृष्टि की रचना करते समय ये “तीन-रिएक्शन्स” पहले ही फिक्स कर दिए थे…
No.1 अनाज का लम्बे वक्त तक संग्रह किया गया,तो कीड़े पैदा हो जाएंगे,वरना अमीर लोग सोने-चांदी की तरह इस पर भी कब्जा कर लिए होते।
No.2 विल्कुल इसी तरह शरीर से आत्मा के निकलने के कुछ ही देर बाद इसमें दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाएगी, वरना लोग अपने प्रियजनों को सदैव अपने घर में ही संजो के रखते। उनका कभी-भी “अंतिम- संस्कार” होने नहीं देते।
No.3 जीवन में किसी भी प्रकार का संकट या अप्रिय घटना घटने पर भावुक होना (रोना) और फिर कुछ वक्त गुज़र जाने पर सांसारिक क्रिया-कलापों में व्यस्त होकर भूलने या फिर कहो सम्भल जाने का चलन भी स्वाभाविक नहीं होता,तो लोगों के जीवन में निराशा रूपी अंधकार उनके जीने की इच्छा को ही मार डालता।
इस विचार का ये निष्कर्ष निकलता है कि,
जीवन ‘सरल’ है…
प्रेम-करना उससे भी ‘सरल’ है…
और जीवन में हार-जीत तो सबसे ‘सरल’ है…
अब सवाल उठता है जीवन में जब सब कुछ ‘सरल ही सरल’ है तो..भई !
Q- ‘कठिन’ क्या है…?
Ans. जी हाँ जीवन में व्यक्ति का “सरल-होना” ही सबसे कठिन है।

धन्यवाद

विचारक;
युग,पचहरा,
जैन कॉलेज, सासनी,हाथरस।