सम्पूर्ण मानव जाति को नैतिक सन्देश करते हुए “प्रकृति” देवी ने पूरी दुनियाँ में दो प्रकार के पेड़-पौधे उपजाए हैं।
प्रथम : वे जो पक जाने पर अपना फल स्वयं, सहर्ष भाव से सांसारिक जीवों को खाने के लिए दे देते हैं, जैसे – आम, अमरुद, केला इत्यादि ।
द्वितीय : दूसरे वे जो अपना फल मिट्टी में छिपाकर पैदा करते हैं, जैसे – आलू, अदरक, प्याज इत्यादि। जिन्हें कंद कहा गया है।
प्रथम: प्रकार वाले जो पूरे मैच्योर पेड़ होते हैं वे अपना फल पक जाने पर स्वाभाविक रूप से अपने आप परमार्थ हेतु दूसरे जीवों को सौंप देते हैं, उन वृक्षों को सभी मनुष्य खाद-पानी देकर सुरक्षित भी रखते हैं, और ऐसे वृक्ष फिर से खुशी-खुशी फल देने के लिए पुनःतैयार हो जाते हैं। ये प्रक्रिया अनवरत वर्षों पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है…
किन्तु दूसरे जिनकी प्रकृति अपना फल छिपाकर रखने की होती है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं, और ऐसे पौधों या बेल के नष्ट हो जाने की परवाह किए बिना उनके फलों को ले लिया जाता है।
ठीक इसी प्रकार… प्रथम: प्रकार के पौधों की तरह.. जो व्यक्ति अपनी विद्या, धन, शक्ति आदि को परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद अतिरिक्त को स्वेच्छा से जरूरत मंद जीवों के उत्थान हेतु परमार्थ में लगा देते हैं, उनके मान-सम्मान का न केवल सभी लोग ध्यान रखते हैं। वल्कि उन पर प्रकृति रूपी देवी की कृपा वर्षा सदैव बनी रहती हैं।
दूसरी ओर…जो इंसान अपनी विद्या, धन, शक्ति आदि को अति स्वार्थवश छिपाकर रखते हैं,अपनी सामर्थ्य के अनुरूप कभी किसी के काम नहीं आते हैं सदैव ऐसे मंजरों से मुख मोड़े रखते है “वे एक दिन खुद व खुद अपने कर्मों से जड़ सहित न सिर्फ उखड़ जाते है, अपितु उनके जीते जी उनका परिवार, समाज व देश- दुनियाँ ऐसे संकीर्ण मन वाले लोगों को न केवल भुला देते हैं बल्कि अपने व्यावहारिक चलन से ऐसे निकाल देते हैं जैसे “दूध में से मक्खी” इसी अवस्था को विद्वान लॉबी पारिवारिक एवं सामाजिक मौत का नाम देती है।
आप ही विचार कीजिए क्या ऐसे लोग जीते जी मुर्दे के समान नहीं हो जाते..??
उन्हें कोई कहीं भी नहीं पूछता..??
बताइए!! सभी जीवों में श्रेष्ठ एवं दुर्लभ कहे जाने वाली ये “मानव देह” क्या अपना सब कुछ ..केवल इस पारिवारिक भट्टी में ही झोंकने के लिए मिली है..??
जी, नहीं हर इंसान को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक अपने आस पास या संपर्क में आए.. असहाय जीवों,पेड़-पौधों एवं जरूरतमंदों की.. “मदद करना” हम मनुष्यों का नैतिक व मानवीय दायित्व है।
इसीलिए दायरे में रहते हुए..ये जीवन उन पर अपनी करुणा दिखाने के लिए मिला है।”
शिक्षा : “प्रकृति” हमे कितना महत्वपूर्ण संदेश देती है, इस संदेश को समझने के बाद बस अपने जीवन में उतारने की महती आवश्यकता है।”
इस लेख को गंभीरता पूर्वक न सिर्फ पढ़ने अपितु अनुकरण करने के लिए मेरा आपको ह्रदय तल से धन्यवाद है। 👍
; योगेंद्र सिंह पचहरा,पौत्र श्री साहब सिंह ‘मुखिया जी’ नीमगाँव,राया,मथुरा
Sir bahut aachchha par es blog me ek bat mujhe aachchhi lagi ped podhho ke upar blog likhiye bese to badiya laga
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