68-“धरती-पुत्र”

मां भारती के लाल कर्मशील “धरती पुत्र / किसान” के साथ योजनाबद्ध तरीके से किए जा रहे दोहरे रवैए के लिए देश को संचालित करने वाली पवित्र पुस्तक “संविधान” के अक्सर विपरीत चलने वाली सरकारों से मै, ये पूछना चाहता हूँ.. आख़िर सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा सदैव दोहरे-मापदंड ही क्यों अपनाए जाते रहे हैं..?

आज हम चाहे जहाँ बैठे हों, मग़र मूलरूप से हम सब हैं किसानों के ही बेटे।

..इसलिए मेरा ऐसा मानना है कि,हम सभी भारतीय नागरिकों को अधिक नहीं,तो अपने देश के “इकोनॉमिक-डिजाइन” को अनिवार्य रूप से समझना होगा।तभी हम किसी भी चुनाव से पूर्व अपने, सांसद,विधायक या फिर ग्रामीण स्तर पर प्रधान आदि से जन-कल्याण से सम्बंधित वाजिब सवाल पूछने के साथ-साथ किसान-मजदूर जो देश की रीढ़ हैं। उनके आर्थिक व शैक्षिक पिछड़ेपन के मूल कारण को समझकर कोई उचित समाधान तलाश पाएंगे।

हम सब सदैव यही सुनते आये हैं कि, किसान, धरतीपुत्र..समूचे विश्व का अन्नदाता है। मैंने गाँव में बड़े बुजुर्गों को अक्सर कहते सुना है कि, “सरकार की सब नीतियाँ इस किसान के ही सिर पर चलाई जाती हैं।” लेकिन आप इतिहास के पन्ने उलट कर देख लीजिएगा.. सरकार की “कृषि नीति” किसान के साथ हमेशा दुराज वाली ही रही है।

आज इस रहस्य को जानने का एक प्रयास करेंगे।

चलो! पहले किसानों के ‘इकनोमिक-डिजाइन’ को जान लेते हैं। वो आप चाहे अमेरिका, यूरोप का देख लें या फिर भारत का जिस पर पिछले कई दशकों से हमारे देश की सरकारें निरंतर काम कर रही हैं,वो डिज़ाइन कहता है कि, धीरे-धीरे किसान को उसके “एग्रीकल्चर-फील्ड” से हताश करके शहर की ओर ले जाने को बाध्य करने का षड्यंत्र बरकरार चल रहा है।

वहां दिहाड़ी मजदूरों की बहुत जरूरत है। क्योंकि नेताओं या कॉरपोरेट जगत के लोगों को शहर में चल रहे.. कारोबार, कंपनीज आदि के लिए सस्ते में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर जो चाहिए।

दरअसल, इस सबके लिए उन्हें देश के ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ को कम करना ही है।

आप आंकड़े उठा के देख लीजिएगा आज अमेरिका में किसान लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। वहाँ ‘किसान पॉपुलेशन’ मुश्किल से 2% बची है। यही हाल यूरोप के देशों का भी है..हर एक मिनट में कोई एक किसान खेती छोड़ने को मजबूर है। भारत,चीन या फिर अन्य डिवलपिंग कन्ट्रीज में सारा ज़ोर नया स्वरूप तैयार करने पर ही है।

आपको याद ही होगा रघुराजन ने बहुत पहले ये कह दिया था कि,भारत में बड़ा रिफॉर्म तब होगा जब हम किसानों को खेती से निकाल कर शहर की ओर जाने को मजबूर कर पायेंगे।

देश में किसानों से सम्बन्धित “एकोनिमिक-पॉलिसीज” का डिजाइन कुछ ऐसा ही है।

अगर आप पर वक़्त की मेहरबानी हो तो ,आप द डिजाइन ऑफ़ “नेशनल-स्किल-पॉलिसीज” को एकबार अवश्य पढ़ लीजिएगा, तो आप पाएंगे कि सरकार के नीति-नियंताओं ने देश में “एग्रीकल्चर-पॉपुलेशन” को मात्र 18% पर लाने का पक्का मन बना रखा है।

मग़र सौभाग्य से हमारे देश में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हैं जो एक “संतुलित सोच” के साथ-साथ खुद को कर्रेंट-अफेयर्स से अपडेट रखते हैं।

उनकी सलाह के कारण सरकार उसे एकदम न गिराते हुए अभी 57% पर रखा गया है। लेकिन इनकी “नेशनल स्किल नीतियों” में स्प्ष्ट लिखा हुआ है कि,एग्रीकल्चर-पॉपुलेशन को बहुत जल्द 2022 तक 38% पर ले आया जाएगा। यानी सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा है ये। यदि आप इनके क्रिया-कलापों पर गौर करें,तो धीरे-धीरे इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना किसानों की खेती को सिकोड़ते जाना और उन्हें शहर की ओर डाइवर्ट करना, हर एक सरकार का एजेंडा रहा है।

हालांकि मैं भी एक “सैलरी-पेड” बंदा हूँ। मग़र सही बात को मैं न केवल हिर्दय से स्वीकारता हूँ वल्कि सदैव फ्रैंकली, किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर दावे के साथ बोलता भी रहा हूँ।

आप कभी भी देख लीजियेगा.. मैंने तो जब से होश संभाला है, चाहे घर परिवार, समाज में या देश-दुनियाँ के किसी भी स्तर पर मैं सदैव “सही नीयत व नीतियों” का ही पक्षधर हूँ..और रहूंगा।शायद इसीलिए किसी नेता या पार्टी का अंधभक्त बनने से अब तक बचा हुआ हूँ।

अब एक उदाहरण के माध्यम से मैं, किसानों के साथ सरकार की “दुराज नीतियों” पर थोड़ा प्रकाश डालने की हिमांकत कर रहा हूँ..

ध्यान दीजिएगा.. सन 1970 में गेंहूँ का दाम 76 रुपये कुन्तल था। जिसका (MSP) यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020 में 1975 निर्धारित किया गया था। (हालांकि ये MSP ज्यादातर सरकार की दिखावे वाली नीतियों का हिस्सा ही बनके रह गया है। बेचारे किसान को, तो इसबार मात्र 1600 रु प्रति कुन्तल का रेट ही मिल पाया है।)

अगर हम इस प्रकरण की “कम्पेरेटिव-स्टडी” में जाएं, तो पिछले पचास वर्षों में देश के अन्य लोगों की इनकम में वृद्धि के लिहाज़ से..

1- नेता,

2-ब्यूरोक्रेट्स एवं

3-सामान्य से सरकारी मुलाज़िमो की इनकम में लगभग 120 से 300 गुना तक की बढ़ोत्तरी हुई है।

औऱ यदि किसान की इनकम को गेंहूँ या धान की फसल की कीमतों से आंका जाय,तो मात्र 26 गुना ही वृद्धि हुई है। जो “न” के बराबर है। चलो ज्यादा गहराई में न जाते हुए..एक मोटे तौर ..पर,

मानलो आंकड़ों के मुताबिक पिछले 50 वर्ष में नेता, नौकरशाह व एक आम सरकारी कर्मचारियों की बढ़ोत्तरी जो 120 से 300 गुना तक हुई है। उसे देखते हुए.. भारतीय किसान को उसकी मेहनत का अगर केवल 100 गुना मूल्य भी दे दिया गया होता, तो आज उसके गेँहू के दाम कम से कम 7600/- रु कुन्तल के होते। तो आप ही बताइएगा फिर हमारे “धरती-पुत्र” क्यों ऐसी हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता..? नहीं ना!!

जबकि ऐसा करने पर सरकार की ओर से हम किसानों पर कोई एहसान नहीं होता। वो हम किसानों का हक है। जो हमें मिलना ही चाहिए।

मग़र सरकारों की “दुराज-नीति” ने देश की जनता को जाति,धर्मों में इस कदर बांट रखा है कि कुछ कहते नहीं बनता। हमारे किसान भाई सच्चे मन से एक प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर अपना दर्द भी बयान नहीं कर पाते हैं।

अभी भी वक़्त है देश के समस्त किसानों को अपनी “जन्म-जातियों” से निकल कर “कर्म-जाति” को तरजीह देकर संगठित होने के लिए। क्योंकि “संघे शक्ते कलै युगे” वर्तमान युग में सफलता का मूल मंत्र..भी है।

मुझे सन 1986 का वो मंज़र याद आ रहा है। जब मैं, 11th में पढ़ता था। मैंने किसानों के मसीहा श्री महेन्द्रसिंह जी टिकैत, को सासनी के “जैन इंटर कॉलेज, जिसमें सौभाग्यवश आज मैं एक शिक्षक के रूप में भी तैनात हूँ, पहली बार मैंने उन्हें बड़ी तल्लीनता के साथ सुना था। भले ही वो महान-आत्मा आज शरीर से हमारे बीच नहीं हैं। मग़र उनके बताए गए निर्देश हमारे अधिकतर किसान भाइयों को वक्त वक्त पर कई पीढ़ियों तक ऊर्जावान करते रहेंगे।

देश व प्रदेशों की सरकारों द्वारा किसान के प्रति बढ़ते अन्यायों को देखते हुए आज “महात्मा-टिकैत” जैसे व्यक्तित्व की कमी खलती है। काश! समूचे देश का किसान उस वक़्त सरकार की गलत नीतियों के ख़िलाफ़ एक साथ लामबंद हो गया होता! तो अन्य लोगों की तरह आज भारतीय-किसानों का भी अपना एक रजिस्टर्ड “संगठन” होता। देश के किसानों के पास सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के लिए एक स्वच्छ छवि की लीडरशिप होती, जो सरकारों की मनमानी को रोकने के लिए हमारे साथ खड़ी होती।

विडम्बना तो इस बात की है।जब भारतीय किसान यूनियन के वर्तमान अध्यक्ष श्री राकेश जी टिकैत कुछ प्रबुद्ध किसानों को एकत्रित कर सरकार से अपनी फसल का वाजिब दाम या किसी समस्या पर बात करते हैं, तो अक्सर कहा जाता है इतना पैसा कहाँ से आएगा..?

लेकिन कभी किसी ने पूछा है कि जब कॉरपोरेट को पैसा दिया जाता है, तब पैसा कहाँ से आता है..? या नेताओं व सरकारी तंत्र की पेंशन व भत्ते बढ़ाये जाते हैं तब पैसा कहाँ से आता है..?

हालांकि ये असम्भव सी बात है..लेकिन

हम लोगों में स्वार्थ-परता की स्थिति यहां तक है कि,

. मानलो सरकार भी यदि किसी तरह वर्ष में मात्र दो लाख करोड़ रुपये का पैकेज भी किसानों के लिए घोषित कर दे, तो देश में हा हा कार मच जायेगा..जबकि पिछले सातवें वेतन आयोग को लागू होने से सरकारी ख़ज़ाने पर चार लाख अस्सी हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा था।

उसके विरोध में हमारे किसान व मजदूर भाइयों ने तो कभी कुछ नहीं कहा!! हम सैलरी पेड को शर्म आनी चाहिए.. पूरा देश इसी ‘धरती-पुत्र की कमाई खाता है। सही बात नहीं कह सकते तो कम से कम किसानों से रिलेटेड मामलों में अपना मुंह बंद ही रखा करें।

मग़र ये भी अपनी जगह एकदम “कटु-सत्य” है कि, बेचारे किसान के सब दुश्मन हैं। जब देखो तब..सब इसी को काटते हैं। क्या सरकार क्या वकील क्या डॉक्टर.. न जाने क्यों..?? इतिहास गवाह है सभी की चाहत हमेशा किसान को गरीब ही देखने की रही है..?

देश में किसान व मजदूर वर्ग के ख़िलाफ़ सभी की जो मानसिकता है आज उसे बदलने की आवश्यकता है। अभी भी वक़्त है,किसान व मजदूर समय रहते संगठित हो जाएं।

चिंताजनक; मौजूदा रवैये से अभी कुछ ऐसा लग नहीं रहा..कि, देश में कृषि का भविष्य बहुत उज्जवल है।

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा

( नीमगांव से एक किसान-पुत्र)

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