“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया भी नहीं है।” ये एक लाचार माँ के शब्द हैं अपने बेटे को समझाने के लिये।
अधिक लाड-प्यार में भटका हुआ बेटा, “देख मम्मी! मैंने अपनी दसवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद छुट्टियों में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने वचन भी दिया था। कल मेरा आख़िरी पेपर भी हो गया। आज श्री ओपी वर्मा सर की “अनौखी-परीक्षा” है। मैने दीदी को कह दिया है कि जैसे ही मैं परीक्षा-भवन से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खड़ी मिलना। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर कभी नहीं आऊंगा।” कैसी विडम्बना है।
एक गरीब घर में ‘बेटे की जिद्द’ और एक ‘माँ की लाचारी’ आमने-सामने टकरा रही थी। (मेरा ये फ़िक्शन जरूर है मग़र आज के दौर में ऐसी कहानी अधिकतर घरों में बन रहीं है।) “बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए उनके एक्सिडेंट की वजह से.. मम्मी कुछ बोले उसके पहले कुलदीप बोला “मैं कुछ नहीं जानता.. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!” ऐसा बोलकर घर का “लाडला-कुलदीप” अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया..? बोर्ड की परीक्षा के बाद हमारे विद्यालय के एक ‘सर’ श्री ओपी वर्मा अपने कॉलेज के छात्रों की “काउन्सिलिंग” के ध्येय से प्रतिवर्ष एक “अनोखी-परीक्षा” का आयोजन किया करते हैं प्रति वर्ष बोर्ड के सभी विद्यार्थी परीक्षा समाप्ति पर “विविधता लिए हुए इस अनौखी-परीक्षा” को अवश्य देते हैं। श्री वर्मा जी स्वयं ही विषय निर्धारित करते हैं।
इस साल “अनौखी-परीक्षा” का विषय था.. ” परिवार में मेरी भूमिका..?” “My role in the family..?” मग़र आज कुलदीप के दिमांग में तो, बाइक लेने की धुन सवार थी… उसने अपने मन में गांठ बांध ली थी कि, यदि मुझे परिवार वाले बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा। श्री वर्मा, सर ने परीक्षा भवन में सभी को पेपर वितरित करा दिया.. पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय निर्धारित था। कुलदीप ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।
प्रश्न नंबर 1 :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, भाई-बहन और आप कितने घंटे काम करते हो..? विस्तार से बताइये..? कुलदीप ने इत्मिनान से पूर्ण ईमानदारी के साथ जवाब लिखना शुरू किया..
जवाबः पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ई-रिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। लगभग पंद्रह घंटे। मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे। दीदी सुबह कॉलेज जाती हैं, शाम को “चार से आठ” पार्ट टाइम जॉब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। वो भी लगभग बारह से तेरह घंटे काम करती हैं। मैं, सुबह आराम से छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक थोड़ा बहुत पढ लेता हूँ। मै केवल अपना व्यक्तिगत काम ही कर पाता हूँ। (इससे कुलदीप को मन ही मन लगा, कि उसका परिवार के कामकाज में, तो कोई योगदान है ही नहीं..? थोड़ा बहुत है भी तो, वो उसका व्यक्तिगत काम है।) पहले सवाल के जवाब के बाद कुलदीप ने दूसरा प्रश्न पढा ..
प्रश्न नंबर 2 :- आपके परिवार की कुल मासिक आमदनी कितनी है..? जवाबः पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी की मिलाकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार होती है।
प्रश्न नंबर 3 :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपके मनपसंद हीरो-हीरोइन के नाम, उनकी पसंद..और अभी हाल ही में रिलीज हुई फिल्मों के नाम बताइये..? सभी प्रश्नों के जवाब उसकी पसंद एवं आसान होने से उसने फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..
प्रश्न नंबर 4 :- एक किलो आलू, टमाटर एवं भिन्डी इन तीन सब्जियों की अभी हाल की कीमत क्या है..? एक किलो गेहूं, चावल और तेल इन खाद्यानों की कीमत के साथ-साथ जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाता है। उस आटा चक्की की लोकेशन बताइये। मिस्टर कुलदीप, को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी जानकारी नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी। तो मैं अक्सर मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी एवं स्टार्स का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। जितना कि अपने घर के दैनिक कामकाज का.. इसमें जवाबदेही..तो मेरी ही बनती है..?
प्रश्न नंबर 5 :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो. ? जवाबः हां, मुझे आलू, के सिवा कोई अन्य सब्जी विल्कुल भी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ। (इतना लिखते ही कुलदीप को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, इसलिए अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। हाँ, एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा.. ली, तो वो इतनी कड़वी लगी कि, मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो..? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी नहीं है कि हम एक साथ दो सब्जी बनाकर खा सकें.. तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?) कुलदीप ने अपनी यादों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा..
प्रश्न नंबर 6 :- आपने अपने परिवार में आखिरी बार क्या जिद की थी..उसके बारे में लिखिये .. कुलदीप ने जवाब लिखना शुरू किया। मैंने अपनी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन यानि आज बाइक के लिये जिद्द की हुई है..? पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना-वाना भी छोड़ दिया है। उन्हें बोल दिया है..जब तक बाइक के लिए रुपये नहीं दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं कभी भी घर न आने की आख़िरी धमकी भी देकर निकला हूँ। अपनी जिद का प्रामाणिकता से कुलदीप ने जवाब लिखा।
प्रश्न नंबर 7 :- आपको अपने घर से मिल रही पॉकेट मनी का आप क्या करते हो..? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं..? जवाब: हर महीने पापा मुझे दो सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ। मेरी दीदी को भी पापा दो सौ रुपये ही देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से परिवार में आर्थिक मदद करती हैं। हां, पापा द्वारा उसको दिये गये पॉकेटमनी के रुपयों को वो सदैव गुल्लक में डालकर बचत करती हैं। वह कोई शौख-मौज नहीं करती है, क्योंकि वो मितव्ययी हैं।
प्रश्न नंबर 8 :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो..? प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी कुलदीप ने जवाब लिखा। परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये। यह लिखते लिखते ही “अंतरात्मा” से आवाज आयी कि अरे कुलदीप! क्या तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को सही रूप से निभा रहे हो..? और अंतरात्मा से जवाब आया कि “ना.. जी बिल्कुल नहीं ..!!”
प्रश्न नंबर 9:- आपके परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं..? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं..? आपको डांटते रहते हैं..? (इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए अब तो कुलदीप की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका को ठीक से समझ चुका था।) लिखने की शुरुआत की .. वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं। फिर भी उनकी ओर से हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता है।
प्रश्न नंबर 10 :- “पारिवारिक जीवन” में “प्रभावी-भूमिका” निभाने के लिये इस “समर-वेकेशन” में आप परिवार को कैसे मदद करेंगे..?
जवाब में कुलदीप की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के नीचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। दसवां प्रश्न अनुत्तर छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया। स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।
बहन बोली,”भैया! ये ले “बारह-हजार” रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर चलो।” बहन ने भाई के सामने पैसे रख दिये। भाई बोला, “कहाँ से लायी ये पैसे?” बहन ने बताया “मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी ने भी जहां काम करती हैं वहां से कुछ रुपये उधार उठा लिये, और मेरी पॉकेटमनी की बचत वाली गुल्लक से भी सब रुपये निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो पायी है। कुलदीप की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई। दीदी फिर बोली ” भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर कभी नहीं आऊंगा!
अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूँ। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल पापा रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी तुम्हें पता है। बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है..? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल पड़ी।
उसी समय कुलदीप का दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, बेचने के लिए बड़े अच्छे से चमका कर लाया था। “ले .. कुलदीप आज से ये बाइक तुम्हारी, दूसरे चौदह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये बारह हजार में।” कुलदीप बाइक की ओर टुकुर-टुकुर देखता रहा.. और थोड़ी देर के बाद बोला “दोस्त मैं,तो सिर्फ नाम का ही “कुलदीप” हूँ। सच्चे अर्थों में हमारे परिवार की “कुल-दीपक” तो मेरी दीदी हैं। मग़र अब श्री ओपी वर्मा सर, की इस”अनौखी-परीक्षा” के इन 10 प्रश्नों ने मेरी आँखें खोल दी हैं। अब तुम अपनी बाइक उस चौदह हजार रुपये वाले ग्राहक को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी है। और हाल में होने की संभावना भी नहीं दिख रही है।”
इसके बाद कुलदीप सीधा श्री ओपी वर्मा सर, के पास स्टाफ-रूम में जा पहुँचा। वर्मा जी ने उसे देखते ही पूछा, “अरे ! , कुलदीप! कैसी हुई परीक्षा ..? “सर ..!!, ये वाक़ई “अनौखी” ही परीक्षा है। ये तो मेरे जीवन को वो आकार दे गई जो बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं दे सकतीं।
मैंने आखिरी प्रश्न न.10 का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं मैं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा.. और वो हिर्दय से अपने सभी गुरुजनों के चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।
घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर रहे थे। मम्मी ने पूछा, “बेटा! बाइक कहाँ हैं..?” कुलदीप ने दीदी के हाथ में पैसे थमा दिये और कहा, कि सॉरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा, अब मेरी समर-वैकेशन शुरू हो गयीं हैं आप मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़ा आराम करें ताकि आपके पैर जल्दी सही हो जाय, और मम्मी आज से मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे। कुलदीप के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर उसकी मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और सुनते ही वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।” कुलदीप ने कहा, “नहीं मम्मी! अब मै समझ गया हूँ कि हमारे घर-परिवार में मेरी अर्थात एक “बेटे की भूमिका” क्या है..? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आख़िरी 10 वें सवाल का जवाब नहीं लिखा हैं, वह मुझे प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो” और उसी समय कॉलेज में सबके प्रिय एवं सर्वजनहिताय स्वभाव के श्री ओपी वर्मा जी ने कुलदीप के घर में प्रवेश किया। और बोले “वाह! कुलदीप जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर दोगे..बहुत ख़ूब 👌सुनकर बहुत अच्छा लगा.. हम सभी शिक्षकों का भी आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है।
मेरा अपने सभी सम्माननीय पाठकों /अभिभावकों से आग्रह है कि इस लेख को आप भी जरूर पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़वाईयेगा या स्वयं पढ़कर सुना दीजियेगा.. धन्यवाद,
विचारक; युग पचहरा, जन्मभूमि; श्री साहब सिंह,मुखिया जी, सदन, नीमगाँव,राया,मथुरा।