61″वैचारिक-छवि”

What do You think .. about a “Thoughtful-Image”?

As; “Man is mortal while thought is immortal”

मेरा ऐसा मानना है कि,

मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूंजी उसके अपने “विवेकपूर्ण-विचार” ही होते हैं, जिनकी उम्र.. मनुष्य से कहीं अधिक होती है। इतिहास में झांककर देख लीजियेगा.. एकदिन मनुष्य शरीर से देश-दुनियाँ में नहीं होता है। मग़र परिवार, समाज, और दुनियाँ में.. जिस स्तर की उसकी “वैचारिक-छवि” रही होती है। वैसी उसकी चर्चा समय-समय पर गाहे-वगाहे कहीं न कहीं लोगों द्वारा हो ही जाती है। अर्थात वह अपनी “वैचारिक-आभा” के रूप में लोगों के बीच सदैव मौजूद रहता है।

जैसे ;- स्वामी विवेकानंद, एडिशन ,जॉन मिल्टन आदि महामानव…..

अतः इस संदर्भ में,

मैं अक्सर ख़ुद को भी यही परामर्श करता हूँ..कि, मनुष्य के सामने “स्थिति-परिस्थिति” चाहे जितनी भी विपरीत क्यों न हों अगर वो चाहे तो, नैतिक, मानवीय व सामाजिक-मूल्यों से समझौता किये बिना भी एक “सरल जीवन” जी सकता है। अर्थात खुद को इंसानियत की परिधि में रख कर चल सकता है।

इतिहास साक्षी है कि ‘धन और बल’ की अधिकता ने वैचारिक रूप से कमजोर लोगों को सदैव ‘भटकाया’ ही है।

इसीलिए यदि आपका ‘वैचारिक धरातल’ मजबूत है, तो ही आप अच्छे कार्यो के प्रति अग्रसर रह सकेंगे !!

अन्यथा,अवरोधकों की कहीं कोई कमी नहीं है।

दुनियाँ के दस्तूर में मनुष्य को ईश्वर से प्राप्त “मुक्त-इच्छा”(Free-will) की सुविधा के तहत भटकाव के हाथों मज़बूर होने पर ख़ुद के द्वारा किये गए “विकर्मों” (दुष्कर्मों) के परिणाम स्वरूप ‘अर्श से फर्श’ पर आने में बहुत ज्यादा देर नहीं लगती!

विशेषकर इसीलिये

मनुष्य के “वैचारिक-प्रबंधन” का सिस्टेमेटिक होने के साथ-साथ मर्यादित होना भी नितांत आवश्यक है। वरना आप भी जानते हैं और इतिहास तो साक्षी है ही। चाहे व्यक्ति, परिवार,समाज, संस्थान व देश जो वक़्त रहते नहीं सम्भलते हैं, वे लोगों के लिए महज़ एक दास्तान बनके रह जाते हैं।

अतः “जब आँख खुलीं.. तभी सबेरा” वाले सिद्धांत से भी मनुष्य अपने आपको तत्काल रूपांतरित (Transform) करले तो भी मेरे ख़्याल से कुछ ग़लत नहीं है।

धन्यवाद युग पचहरा

नीमगाँव,राया, मथुरा।

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