65- “भटकाव से बचें”

दुनियादारी में भटकाव बहुत है मग़र शिक्षित वही जो “भटकें नहीं” ।

जी हाँ, अक्सर देखा जाता है कि “व्यक्ति होश सम्भालते ही अतिभौतिकवादी वातावरण में परवरिश होने से “अध्यात्मवाद” जो पूर्ण प्राकृतिक है उससे काफ़ी दूर होता चला जाता है।

अगर “भटकाव से बचें ” के सन्दर्भ में कुछ बयां किया जाय, तो भारतीय समाज में कई एक अवधारणाओं के लोग हैं। जो शायद स्थिर भी नहीं हैं, आज किसी पाले में, तो कल किसी और पाले में ये स्तर है जो बहुत निम्न है।

एक तो, वे हैं जो सामाजिक स्तर पर जीवन से जुड़ी हुई रोज-मर्रा की बातों में अच्छे जानकार है। वे अपने अनुभव से आने वाली परिस्थिति को पूर्व में ही भांप लेने की दूरदृष्टि रखने के साथ-साथ अपने साथियों को भी सदैव नेक सलाह देकर जीवन को आनंद के साथ जिंदा-दिली से जीते हैं।

दूसरे वे होते हैं,जो आपने देखा होगा कि, धार्मिक-स्थलों की दीवारों पर एक “खूबसूरत-सच” अक्सर लिखा मिल जाता है.. “यदि व्रत व उपवास रखने से ईश्वर खुश होता…, तो कई-कई दिन फाके..( भूखे) ही सो जाने वाले भिखारी से वह न केवल बहुत खुश होता, अपितु भिखारी ही आज दुनियाँ का सबसे सुखी इंसान होता।”

इस विषय पर मेरा ऐसा मानना है कि जिस दिन उपवास में हों, उस दिन आप किसी भूखे “जीव” (जैसे; जानवर, पक्षी, या किसी असहाय इंसान) को कम से कम एक वक्त का भोजन करा सकें। तब तो निश्चय ही खाने के व्रत का कोई अर्थ होता है।

ऐसा करने से सप्ताह में एक दिन का उपवास आपकी बढ़ती हुई अतिरिक्त चर्बी आदि को सन्तुलित करने के साथ-साथ “आत्मिक-स्तर” पर मानवता की ओर बढ़ने वाला आपका एक सार्थक कदम साबित होगा। जो आपको पूरी तरह आत्मशक्ति से भर देगा।

अन्यथा मेरा एक और सुझाव है, यदि आप अपने जीवन में उपवास, व्रत या किसी भी तरह का संकल्प लेना ही चाहते हैं, तो सामाजिक-प्रदूषण से बचते हुए “विचारों की शुद्धता” का लें… क्योंकि पारम्परिक व्रत “सिर्फ एक वक़्त का भोजन छोड़ देने का है। अगले दिन फिर व्यक्ति वही “जस का तस” मेरा मतलव वह वैचारिक व व्यवहारिक स्तर पर वैसे का वैसा ही रह जाता है। उसमें कोई रूपांतरण नहीं दिखता। तो फिर क्या..मतलव ?

आपने देखा ही होगा कि, चिड़िया जब जीवित होती है, तो कीड़े-मकोड़े खाती है। और जब चिड़िया मर जाती है,तो कीड़े-मकोड़े उसे खा जाते हैं।

इसलिए एक बात सदैव ध्यान रखें, “समय” और “स्थिति” के अनुरूप आपके द्वारा किया हुआ “कर्म” कभी भी निष्प्रभावी नहीं हो सकता। उसका प्रभाव कर्म करने वाले पर निःसन्देह पड़ता है।

इसलिए बड़े-बुजुर्ग बार-बार कहते हैं..कि, “बेटा ! ठंड रख..दुनियाँ विच, देरी जरूर है, मग़र अंधेरी विल्कुल ना है।”

प्रयास करो कि कभी आपके द्वारा किसी सज्जन का अपमान न हो, किसी क्षेत्र में तुम शक्तिशाली या सामर्थ्यवान हो सकते हो परन्तु ध्यान रखो “समय” सर्व शक्तिमान है।

जैसे; एक पेड़ से माचिस की लाखों तीलियाँ बनायी जाती हैं और सिर्फ एक तीली से लाखों पेड़ जलाए भी जा सकते हैं।

ईश्वर ने रूप दिया मोर को, तो “इच्छा” छीन ली।

ईश्वर ने “इच्छा” दी इंसान को, तो “संतोष” छीन लिया।

और “संतोष” दिया सन्त को, तो “संसार” छीन लिया।

अपने “आप” में मगुरूर न रहें बड़ों की भी सुनें। इस “जीवन-चक्र”को न भूलें सदैव याद रहे..कि,

“ईश्वर, दुनियाँ… में हर दिन ‘तेरे और मेरे’ जैसे लाखों को एक खिलोने की तरह मिट्टी से बनाकर और फिर वक्त पूरा होने पर पुनः उसी मिट्टी में मिला देता है।”

तो फिर गुरूर… किस बात का…?

जीवन में सदमार्ग पर चलते रहने के लिए “व्यवहारिक एवं वैचारिक” दोनों स्तर पर पवित्रता जरूरी है।

आंकड़े कहते हैं कि दुनियाँ की अस्सी फ़ीसदी मानव-आबादी अपना बहुमूल्य “जीवन” न केवल आधारहीन वल्कि, पूरी तरह भौतिक वातावरण में इन तीन बातों में ही गवां दे रही है।

न.01- मेरा नाम सबसे ऊंचा हो,

न.02- मेरा लिवास सबसे अच्छा हो। और

न.03-मेरा निवास (मकान) भी बहुत ख़ूब सूरत हो।

लेकिन “विधी का विधान” भी बड़ा निराला है। वह इंसान के शरीर छोड़ते ही उसकी इन तीनों चीजों को जो उसने बड़े चाव से बनाई थी, एक क्षण में बदल के रख देता है…

01-नाम : स्वर्गीय हो जाता है, 02-लिवास : क़फ़न हो जाता है 03-निवास : श्मशान हो जाता है।

मांफ कीजियेगा.. मेरा किसी को डराने का कोई इरादा नहीं है। मग़र “सच्चाई” यही है।

इसलिए सभी के साथ-साथ मेरा खुद से भी कहना है…कि, “भटकाव से बचें ” आंकड़ों के अनुसार ..

1- दुनियाँ की एक बहुत बड़ी आबादी जिसे विद्वानों ने “भौतिक-जगत” के नाम से पुकारा है। वे 80% लोगों की भीड़ है।

2- 12% लोग “मानसिक-जगत” में है। और

शेष 08% लोग 3-“आत्मिक-जगत” के हैं।

प्रबुद्ध वर्ग के अनुरूप ये दुनियाँ की सम्पूर्ण आबादी की कैलकुलेशन है।

अब आप कहाँ स्टैंड करते हैं ये व्यक्तिगत “आत्मावलोकन” का मामला है। जो सदैव पर्सन टू पर्सन डिफ्रेंसियेट होता है।

धन्यवाद👍 विचारक ; युग पचहरा, के.एल.जैन इ.कॉलेज,सासनी, हाथरस।

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