64-“विकार”

दरअसल, असीमित मनोवृत्ति ही “विकार” है। भारतीय धर्म ग्रंथों में  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पाने के लिए.. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार-इन पांच विकारों के त्याग पर बहुत बल दिया गया है। लेकिन विचार कीजियेगा यहाँ कई एक सवालों को जगह मिल रही है..  क्या ये पांच ही विकार की श्रेणी में आते  हैं.? अगर आते हैं, तो किस हद तक.? त्याज्य हैं, तो क्या ये पूरी तरह त्याज्य हैं.?  क्या मानव सचमुच इन विकारों का पूरी तरह से त्याग करने में सक्षम है.? ध्यान से सोचें तो,  काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार-“पूरी तरह से” विकार की श्रेणी में ही नहीं आते..? ये.. क्या कोई भी कितनी भी अच्छी चीज़ जब अपनी सीमा का उल्लंघन करती है या यों कहें कि किसी भी स्तर पर “अति” होती है, तब वो अति वाली “वृत्ति” ही “विकार का रूप” ले लेती है। अन्यथा जब तक हद में है तब तक तो सब ठीक ही होता है। हां, यदि आप इनका व्यवहारिक-पक्ष देखें, तो बिना इनके मानव अपना सांसारिक जीवन बखूबी नहीं चला पाता। ‘अति’ तो भोजन की भी दु:खदाई होती है। फिर इन पाँच को ही क्यों पहले से विकार की श्रेणी में मान लिया गया है.? जैसे; काम या शक्ति के अभाव में पितृ ऋण से मुक्ति संभव नहीं है।क्रोध वह शक्ति है जो आवश्यकता पड़ने पर मानव को सुरक्षा प्रदान करता है। घर या किसी व्यवस्था में एक नियम-अनुशासन स्थापित करता है। लोभ एक आवश्यकता है, जिसके बिना पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह कठिन है। ठीक वैसे ही मोह मानव को पितृत्व व मातृत्व के साथ-साथ अन्य रिश्तों के दायित्व को निभाने की प्रेरणा देता है। मनुष्य की जिस वृत्ति को हम अहंकार कहते हैं, उसके लिए ‘अहंकार’ शब्द का प्रयोग तब किया जाता है, जब ये “वृत्ति”अपनी सीमा का उल्लंघन करती है।,अन्यथा इससे पूर्व तो वह “स्वाभिमान” ही होता है, जिसका प्रत्येक मानव में होना आवश्यक है। स्वाभिमान के बिना “जीवन”कोई जीवन नहीं रह जाता.. 🙏🏻धन्यवाद। 

विचारक/शिक्षक   ; युग पचहरा, हाथरस

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