मांफ कीजियेगा शीर्षक को देखकर नाराज ना होइएगा..! मेरा आशय ये है कि, आजकल वो दिल्ली में चल रहे “किसान आंदोलन” के दौरान एक पत्रकार के पूछे जाने पर हमारे एक किसान भाई ने बहुत ही सदी हुई भाषा में अपनी वाकपटुता से एक पत्रकार, के साथ वार्तालाप करते-करते सभी को ये सन्देश दे दिया है कि, ‘तथाकथित अनपढ़ किसान’ सिर्फ कहने को ही है मग़र आज किसान को अनपढ़ समझने की भूल कोई भी न करे.. वक़्त रहते ऐसे लोग अपनी जीर्ण-शीर्ण मानसिकता बदल लें.. मेरा ऐसा मानना है कि, हमारा किसान शुरू से ही न तो शिक्षितों से कभी पीछे था.. ना, ही आज है। मैं अपनी इसी विचारधारा को प्रमाणित करने के लिए कुछ तथ्य आपके समक्ष रखता हूँ..जिनमें से बहुत सी बातों का तो,अपने पिता जी के साथ-साथ मैं खुद भी साक्षी रहा हूँ। जैसे; हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या पिशाब करने की स्थिति में होता था, तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा हो जाया करते थे। ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, ये एक आम चलन था….क्योंकि मैं भी एक किसान पुत्र हूँ। इसलिए यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देखता आ रहा हूं …. जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना हमारे उन महान पुरखों में जन्मजात थी। इसीलिए वे शिक्षित थे, वो “अनपढ़-किसान” किसी भी एंगल से नहीं कहे जा सकते!….. यह सब अभी 30-40 वर्ष पूर्व तक होता रहा है… उस जमाने का “देसी घी’ जिसका यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि 2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है, लेकिन वो भोले-भाले किसान का है, इसलिए उसे वाजिव दाम किसी भी चीज का नहीं मिल सकता..? मग़र उस देसी घी को किसान खेती में मेहनत के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को अवश्य पिलाया करते थे।
टिटहरी नामक पक्षी/चिड़िया अपने अंडे हमेशा खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको वहीं सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टिटहरी चिल्लाती मिलती थी, तो किसान उसका इशारा समझ जाते थे और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ दिया करते थे। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी मग़र किसान को व्यवहारिक-ज्ञान, मानवीय-ज्ञान भरपूर था। सब आस्तिक थे। दोपहर को किसान का जब भोजन करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता। उसके बाद ही खुद भोजन करता था । यह एक सामान्य नियम था । बैल जब बूढ़ा हो जाता था तो उसे कसाइयों को बेचना शर्मनाक एवं सामाजिक-अपराध की श्रेणी में आता था । बूढा बैल कई सालों तक खाली बैठा चारा खाता रहता था, मरने तक उसकी सेवा होती थी । उस जमाने के तथाकथित “वो अनपढ़ किसान” का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक हमने इसकी माँ का दूध पिया है और इसकी कमाई खाई है, तो इसे अब बुढापे में कैसे छोड़ दें , कैसे कसाइयों को दे दें कटवाने के लिए ??? जब बैल मर जाता तो किसान फफक-फफक कर रोता था और उन भरी दुपहरियों को याद करता था जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था । माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बुड्ढे बैल की मौत पर रोने लगते थे । पूरा जीवन काल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है । वह पुराना भारत इतना शिक्षित एवं सम्पन्न था कि, अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन के सारे रस खोज लिया करता था ।दरअसल वही करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला “वैभवशाली-भारत” था। वाक़ई वह..अतुल्य..भारत..था !
आजकल हर इंसान दुःखी और तनाव ग्रस्त है क्योंकि वो अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर कहीं जीवन तलाशने का प्रयास कर रहा है,जो निहायत ही गलत है और सभी आवश्यक मानकों को भूलकर पूर्णतःस्वार्थ में लिप्त होता चला जा रहा है…अफ़सोस..! अपने लिए समस्याओं का पहाड़ खड़ा कर ले रहा है.. जैसे दूध पीने के बाद गाय को छोड़ देना..बेचारे उसके बछड़े व बैल तो मशीन युग आने से बेरोजगार हो ही गए हैं। हम सभी के लिए ये विचारणीय बिंदु हैं👍
युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।