70-“SUNDAY..?”

Know the real story after “SUNDAY”…कुछ लोग सोच रहे होंगे,कि आख़िर रविवार की छुट्टी के पीछे उस महान व्यक्ति का क्या मक़सद रहा होगा..?

तो मैं बता दूँ, देश-दुनियाँ के किसी भी सार्वजनिक कार्य के पीछे ‘ऊँची सोच’ रखने वाले लोगों का मक़सद व्यक्तिगत कभी नहीं सदैव ‘लोक कल्याणकारी’ ही होता है।।

… इसका इतिहास जानने के लिए ध्यानपूर्वक पढियेगा… जिस व्यक्ति की वजह से हमें ये छुट्टी हासिल हुई, उस महापुरुष का नाम है, “नारायण मेघाजी लोखंडे”।

जो ‘ज्योतिराव फुले’ के .. “सत्यशोधक-आन्दोलन” के न केवल एक सच्चे कार्यकर्ता थे वल्कि एक कामगार नेता भी थे।

अंग्रेजी-शासन में पूरे सप्ताह मजदूरों को काम करना पड़ता था। लेकिन “नारायण मेघाजी” लोखंडे का ये मानना था कि, हम सभी लोग सप्ताह के सातों दिन अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए काम करते है।

भारतीय समाज ने शिक्षित लोगों को नौकरी-पेशा द्वारा सुव्यवस्थित तरीके से जीवन जीने का अवसर दिया है।

इसीलिए उनका समाज के लिए भी कुछ करने का दायित्व बनता है। अपने “निर्धारित-कार्यों” के अतिरिक्त अपने ख़ुद के दिमांग की तरो-ताज़गी के साथ-साथ कार्य-कुशलता बढ़ाने हेतु सप्ताह में एक दिन की छुट्टी जरूर होनी चाहिए। ऐसा सोचकर.. मेघा जी ने अंग्रेजो के सामने पहली बार सन 1881 में ‘एक सवाल’ के साथ ये महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा।

लेकिन अंग्रेज इस प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं हुऐ। तब आख़िरकार ‘नारायण मेघाजी लोखंडे ‘ को Sunday की छुट्टी के लिए 1881 में एक आन्दोलन भी करना पड़ा। ये आन्दोलन दिन-व-दिन बढ़ता गया। लगभग आठ साल तक लगातार ये आन्दोलन चला..

तब कहीं जाकर 1889 में अंग्रेजो ने हार मानकर Sunday की छुट्टी का ऐलान कर ही दिया.. अर्थात उन्हें करना ही पड़ा। ये था Sunday की छुट्टी का इतिहास।

Did You know before it..? कम पढ़े-लिखे लोग तो दूर… ज्यादातर पढ़े-लिखे लोगों को भी शायद ही इस तथ्य की गहराई पता होगी। और यदि जानकारी होती, तो Sunday के दिन “Personal-Enjoy” में वक़्त जाया न करके वे “जनकल्याण की राह पर चलकर…” समाज के पिछड़े हुए कार्यों में नुक्स न निकालकर.. हाथ बटा रहे होते….और यदि हम सबने समाज का काम ईमानदारी से किया होता.., तो आज समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी आदि मौजूदा समस्याये नहीं होती..?

मेरे ख्याल से अब एकदम स्प्ष्ट हो गया है कि, इस Sunday की छुट्टी पर हमारा कोई व्यक्तिगत हक़ नहीं है, कायदे से इस पर “समाज” का हक़ है।

चलो कोई बात नहीं, “जब आँख खुलीं तभी सबेरा..” वाले नज़रिए से हमें Sunday का ये दिन कम से कम आज से “सामाजिक-कार्यों” के लिए समर्पित कर देना चाहिए !!

धन्यवाद जय हिंद जय भारत।

विचारक / शिक्षक ; युग पचहरा, जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।,

(मूल निवासी; नीमगाँव,राया मथुरा)

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