एक बार ऐसे ही कुछ चर्चा-परिचर्चा.. के दौरान किसी बन्दे ने बड़ी भद्दी टिप्पणी करते हुए कहा कि, सुनने में आया है कि, हिन्दू लोग तो “परिवार-नियोजन” के पक्षधर हैं। लेकिन उन्होंने अपने देवताओं को खुल्ला छोड़ दिया है,क्या..? जिस कारण वे “तेंतीस-करोड़” हो गए हैं !!
ये सुनते ही एक बार को तो मेरा पारा चढ़ा, मग़र कुछ समय पहले तक तो मैंने भी न जाने किस से ऐसा ही कुछ सुन रखा था।.. वो तो अच्छा है, संस्कार बस मुझे सदैव से “बुजुर्गों के बीच बैठने की आदत है। अतः ये प्रसंग लगभग पांच या छह वर्ष पूर्व मैंने “तीर्थधाम-मंगलायतन” में एक “धार्मिक-परिचर्चा”में शामिल होने के दौरान जान लिया था। इसलिए बड़े इत्मिनान से मैंने उस बन्दे के साथ-साथ वहां पर मौजूद सभी महानुभावों को,किसी अनुवादक द्वारा हमारे वेदों को दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय जो “गलती से मिस्टेक” कभी पूर्व में हुई है। उस दिन इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करने का सौभाग्य समझकर … मैंने सभी को विनम्रता से कहा,
भाइयो! दरअसल बात कुछ इस प्रकार से है कि, हमारे वेदों का अनुवाद दूसरी भाषा में करते समय एक अनुवादक महोदय ने शायद भ्रमित-अवस्था में “तेंतीस कोटि देवता” का अनुवाद गलती से “तेंतीस करोड़ देवता” समझ लिया। जिससे अधिकतर लोग आज तक भ्रमित हैं। “करोड़” वाली “कोटि” में एवं “उच्चकोटि”वाली “कोटि” में वैसा ही फर्क है जैसे मात्रा और समूह में है, सीमित और असीमित में है।
इसलिये इस अंतर को ज़रा गम्भीरता पूर्वक समझियेगा क्योंकि “तेंतीस कोटि देवता” का अर्थ है…”तेंतीस उच्चकोटि के भगवान” आपको यदि यकीन न हो तो, इसका उल्लेख ऋग्वेद,यजुर्वेद एवं दूसरे उपनिषदों में भी है। आप स्वयं देख सकते हैं। और यदि आप स्वाध्याय में रुचि रखते हो, तो एक बात और बता दूँ, यही प्रश्न वृहिदारण्य उपनिषद में याज्ञवल्कय प्रश्नावली में भी पूछा गया है..? प्रमुख वेदों में बताया गया है कि… आठ ; वसु, बारह ; आदित्य, ग्यारह ; रुद्र एवं दो …अश्वनी कुमारों को मिलाकर कुल “तेंतीस उच्चतम देवता” होते हैं वेदों की भाषा में जिन्हें “तेंतीस कोटि देवता” कहा गया है।
अगर मैं और विस्तार में जाऊँ, तो आठ- “वसु” ;— पृथ्वी के विभिन्न भागों… जैसे ;1- अनिल-वायु,
2-अपस-जल, 3-दयोस-अन्तरिक्ष,
4-धरा-पृथ्वी,
5-ध्रुव जिसे हम ध्रुव तारे के नाम से भी जानते हैं।,
6-अनल-अग्नि,
7-प्रभास-अरुणोदय जिसे आप सूर्योदय के नाम से भी जानते हैं।
और अंतिम है…
8-सोम अर्थात चन्द्रमाँ।
अब बारह “आदित्य” ;–
ये बारह “आदित्य” हमें सामाजिक-जीवन के बारह भागों एवं वर्ष के बारह महीनों के बारे में बताते हैं।
प्रथम है शक अर्थात नेतृत्व,
दूसरा है अंश अर्थात हिस्सा,
तीसरा है आर्यमान अर्थात श्रेष्ठता,
चौथा है भार अर्थात धरोहर,
पांचवां है धात्री अर्थात अनुष्ठान कौशल, छटा है वस्त्र अर्थात शिल्प कौशल, सातवां है मित्र अर्थात मित्रता,
आठवां है रवि अर्थात कुशल जो समृद्धि का प्रतीक है।,
नौवां है सवित्र या परिजन्य जिसका अर्थ है शब्दों में छिपी शक्ति।,
दसवां है सूर्य या विवसवान अर्थात सामाजिक कानून,
ग्यारहवां है वरुण जो भाग्य का प्रतीक है। और अंतिम..
बारहवां है वामन अर्थात ब्रह्माण्डीय-कानून। अब हैं ग्यारह रुद्र;- जो हमारी ग्यारह इन्दियों के स्वामी है। जिनमें प्रथम पांच हैं;– 1-आनन्द,खुशी या प्रसन्नता।, 2-विज्ञान-ज्ञान, 3-मनस-विचार, 4-प्राण-प्राणशक्ति, 5-वाक-व्याख्यान,
शेष छः में से पांच महाशिव के रूपों के नाम हैं। जैसे ;– 6-प्रथमंशान अर्थात शशक।, 7-तत्पुरुष अर्थात व्यक्ति।, 8-अघोरा अर्थात अघोरी साधु।, 9-वामदेव अर्थात प्रत्यक्ष ब्राह्मण।, 10-सद्योजात अर्थात जो भी उत्पन्न हुआ..वो। और अंतिम… 11- “आत्मा” जो हर जीव में विद्यमान अजर-अमर “आत्मा”है..वो। और शेष दो हुए अश्वनी कुमार। इसप्रकार कुल देवता होते हैं … 8+12+11+2=”33 उच्च कोटि” देवता।
विशेष;- कुछ वेदों में दो अश्वनी कुमारों के स्थान पर इन्द्र और प्रजापति का भी उल्लेख किया गया है।
धन्यवाद युग पचहरा नीमगाँव, राया, मथुरा।
जय हो गुरु देव 🙏
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Thanks अर्जुन जी
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बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति के लिये धन्यवाद ।
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दिल की गहराइयों से धन्यवाद
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