7 Dec., 1941 वो सामान्य सुबह थी। अमेरिका के पर्ल हार्बर के नौसेनिक अड्डे पर हर अमेरिका वासी की सोच थी कि, यूरोप और एशिया से दूर होने की वजह से अमेरिका दुश्मन के सीधे हमले से सुरक्षित है…… पर हमला हुआ, भयानक हमला….. जापान के कामकाज़ी पायलटों ने अमेरिका के “पर्ल” नामक बन्दरगाह को तहस नहस कर दिया चारों तरफ सिर्फ मौत ही मौत दिख रही थी…… पूरा अमेरिका उस हमले से बेहद दुखी था,उस वक़्त हर अमेरिकी भीतर से धधक रहा था…
ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति के द्वारा तत्काल एक उच्च स्तरीय मीटिंग बुलाई गई बड़े सैन्य अधिकारी, कैबिनेट के लोग सब मौजूद थे….. जबकि राष्ट्रपति पिछले 20 साल से व्हीलचेयर पर थे, 1921 के बाद वो अपने पैरों से पक्षाघात की वजह से लाचार थे….. मीटिंग शुरु हुई और सभी जब राष्ट्रपति के मुंह से कुछ सुनने को उनकी तरफ एक टक देख ही रहे थे, तभी अचानक उन्होंने मज़बूती से सामने की टेबल को पकड़ा और लडखडाते हुए अपनी व्हीलचेयर से खड़े हो गए… उनका निजी सहायक उनकी तरफ सहारा देने चला उन्होंने उसे इसारे से रोक दिया….. राष्ट्रपति के अचानक यूँ उठ खड़े होने से सब अवाक थे ….. राष्ट्रपति ने अपने दोनों हाथ आगे किये और बोले…. “हम लाचार नहीं है.. हम उन्हें ये बतायेंगे, उन्हें इसकी कीमत चुकानी ही होगी” …… आगे जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है, अर्थात हमारे सामने है। अमेरिका ने दूसरा युद्ध जीता, और जापान से भयंकर तरीके से बदला भी लिया……
अमेरिका के महानतम राष्ट्रपतियों में से एक प्रखर और “राष्ट्रवादी” Franklin Delano Roosevelt. इन्हीं खूबियों के कारण वे चार बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए…. 1933 में जब उनका देश भयावह आर्थिक हालात का सामना कर रहा था..तब ही उन्होंने ये पद संभाला था। और देश की अर्थ व्यवस्था को पुनः खड़ा किया,उन्होंने “धन सृजन”पर बल दिया।अर्थात हर स्तर पर प्रोडक्टिविटी को निखारा ताकि उन्हें पड़ौसी देशों के मार्केट में जगह मिल सके तभी तो विदेशी मुद्रा को अपनी ओर खींचा जा सकेगा। दरअसल देश की असल कमाई तो वही होती है। और दूसरे महायुद्ध में जब अमेरिका को न चाहते हुए भी उतरना ही पड़ा, तो उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व किया….
“रूज़वेल्ट” वो जननायक बने जो दुश्मन को मिट्टी में मिलाने की ज़िद और जज्बा दोनों रखते थे, तो अपनी नर्स के बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेलते भी थे….! ये उनका स्वभाव था कि, वे आगे आकर हर हालत में अपने लोगों के साथ खड़े होते, सफलता पर पीठ ठोंकते तो असफलता पर हौसला भी बढ़ाते….। इसी का नतीजा था कि थोड़े ही समय में अमेरिका ने उनके आदेश पर परमाणु बम तक तैयार कर लिया था….. हर अमेरिकी उनके लिए अपनी जान की बाज़ी तक लगाने को तैयार था, हर अमेरिकी अपनी सफलता को अमेरिका की सफलता समझता था…..राष्ट्रपति ने ऐसा जज़्बा पैदा किया था जनता में। इसीलिए वहां के जन-जन से रूज़वेल्ट का अटूट-रिश्ता ताउम्र रहा। अर्थात ये रिश्ता 12 अप्रैल 1945 को उनकी मृत्यु तक बरकरार कायम रहा…..! बाद में तो वे हम सभी के लिए भी देवतुल्य हो गए..हैं।
राष्ट्रपति रूज़वेल्ट दिल जीतने में माहिर थे, वामपंथी जब भी “राष्ट्रवाद” की बात करते हैं सदैव हिटलर, मुसोलिनी का ही उदाहरण देते है एक भी नकारात्मक नरेटिव तैयार करने को…. कभी “रूज़वेल्ट” का नाम उनके मुंह से नहीं निकलता….! क्योंकि रूज़वेल्ट, महामानव थे, ऐसे व्यक्तित्व ख़ुद के लिए कुछ नहीं होते हैं, वे पूर्णरूप से देश को समर्पित रहते हैं।
अगर अमेरिकियों के उनके प्रति और उनके अमेरिका के प्रति समर्पण को देखें तो 20वीं सदी में रूज़वेल्ट से बड़ा कोई नायक नहीं दिखता…..वाक़ई वे सच्चे जन नायक थे!!
अब मैं आपका ध्यान एक रिक्शा चालक के मनोभाव को आधार बना कर अपने असल मुद्दे “राष्ट्रवाद” की ओर आकर्षित कराना चाहूँगा।… रांची का एक रिक्शा चालक अखबार में चन्द्रयान-2 के लैंडिंग में व्यवधान की खबर पढ़कर बेहद दुखी होता है….. उसकी ख्वाहिश है “उतर जाता तो मज़ा आता” जबकि हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि इसमें उसका कोई निजी लाभ/हानि नहीं। उसे नहीं पता इसे चाँद पर क्यों भेजा गया…. पर वो इस ख़बर से दुखी है…..क्योंकि वो देश का सच्चा नागरिक है। अपने राष्ट्र के नाम चढ़ने वाली उपलब्धि को समझता है वह अपने राष्ट्र की उपलब्धि पर गर्व करना जानता है। यही वो “भाव” है जिसे “राष्ट्रवाद” कहते है….!
मानो या न मानो आज भारत देश की जनता को अपने “देश की सोच” में एक बड़ा परिवर्तन दिखता है। इतना तो मैं भी देख रहा हूँ कि 2014 के बाद देश के लिए “उत्तरदायित्व” की सोच भी काफ़ी बलवती हुई है….. “निज” पर “राष्ट्र” हावी हुआ है… मानव-मूल्यों,सामाजिक-मूल्यों एवं नैतिक-मूल्यों का स्तर बढ़ा है।
मैं, तमाम ऐसे लोगों को जानता हूँ जो GST, नोट बंदी, आवारा गौवंश की या नौकरी पेशा लोग सरकार की ओर से आये दिन नए-नए फरमानों की बजह से निजी तौर पर बहुत प्रभावित हैं। उनमें व्यापारी है, ठेकेदार हैं, किसान भाई हैं और सरकारी कर्मचारी भी हैं….. मग़र देख लीजिये फिर भी उन्होंने 2019 में मोदी को ही वोट दिया, मोदी के लिए वोट डलवाया…… इसके पीछे वजह.. अगर एक शब्द में कहूँ तो, “राष्ट्रहित” सर्वोपरि है।
जनता की नज़र में देश के नेतृत्व के लिए अभी सबसे सही व्यक्ति मोदी ही हैं। शायद ये बात आमजन के दिल में घर कर गयी है!
अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट की भाँति मोदी को जनता की नब्ज पकड़कर उसके दिल पर राज करने का हुनर अच्छे से आता है.. अपने प्रतिद्वंदियों को साम,दाम,दंड,भेद चारों नीतियों से परास्त करने की महारत तो हासिल है ही। वो जनता को निराशा में उत्साह का संचार करते है, असफलताओं में आगे बढ़कर हौसला भी बढ़ाते हैं, तो सफलता पर तुरन्त पीठ ठोंक उसे उत्सव में बदल देते हैं……
पाकिस्तान को 24 घंटे के भीतर विंग कमांडर अभिनंदन को लौटाने पर मजबूर करना हो। या बड़े भाई की तरह इसरो प्रमुख के सिवन को गले लगाना…… संदेश एकदम साफ है तुम अपना काम इत्मिनान से करते रहो बाकी के लिए मैं हूँ न!! ये “सपोर्टिव थॉट” ही तो “मोदी” को अन्य नेताओं से अलग दर्शाता है।
न जाने क्यों स्वाध्याय के दौरान मुझे इतिहास के पन्नों को उलटने की शायद एक बुरी आदत है। निजी तौर पर अपनी जानकारी के आधार से…तो मुझे भी मोदी में #भारत_के_रूज़वेल्ट दिखते हैं, या मैं जब रूज़वेल्ट पर कुछ पढ़ता हूँ, तो वो मुझे अमेरिका के मोदी……के रूप में दिखते हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।आप स्वयं पढ़कर देख लीजियेगा। आप रूज़वेल्ट को 20वीं सदी का मोदी कह सकते हैं, चाहे मोदी को 21वीं सदी का रूज़वेल्ट….!
हम सरकारी कर्मचारियों को “रविवार”का अवकाश एक दिन अपने दैनिक कार्य से इतर कुछ अलग करने जैसे ; सामाजिक-कार्यों में अपना योगदान देने से, दिमांगी तौर पर तरो-ताज़ा हो कर अगले दिन उतनी ही मुस्तेदी से पुनः अपने दैनिक कार्य में जुट जाना होता है। तो अधिकतर रविवार के दिन अक्सर अपने निर्धारित कार्य के दौरान हमारा समाज के लोगों से जनसम्पर्क तो होता ही है। इस आधार पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि, आज देश के आम जनमानस में ये जाग्रति आ चुकी है कि उन्हें ख़ुद से अधिक अपने राष्ट्र से प्रेम है…. और उनके इस राष्ट्रप्रेम को चरम पर पहुंचाने का श्रेय जिस व्यक्तित्व को जाता है.. वो देश का वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी… है। लोग बड़े धड़ल्ले से कहते हैं कि, “आप शौक से हमें भक्त कहिये….. वो तो हम हैं.. “राष्ट्र” के, और अपने “राष्ट्र-नायक” दोनों के !!!! –जय हिन्द जय भारत।
विचारक; युग, पचहरा, के एल जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस। निवासी; नीमगाँव,राया,मथुरा।