71-Two Cup Tea

71-“Two Cup-Tea.”. “दो कप-चाय” एक दिन एक प्रोफ़ेसर ने कक्षा में अपने छात्रों से कहा कि मैं आज तुम्हें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाना चाहता हूँ क्या आप तैयार हैं..? सभी छात्रों ने एक स्वर में कहा Yes Sir. प्रोफेसर अपने साथ एक काँच का बड़ा जार लेकर आये थे। वो उन्होंने टेबल पर रखा और उसमें “टेबल टेनिस की गेंदें” डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची … उन्होंने छात्रों से पूछा – क्या जार पूरा भर गया.. ? आवाज आई … “हाँ” फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे – छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे – धीरे जार को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, अच्छे से समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब जार पूरा भर गया है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ … कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस जार में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह जार पूरा भर गया ना ? हाँ .. अब तो पूरा भर गया है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से “चाय के दो- कप” निकालकर उनकी की चाय जार में उड़ेल दी, चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी सी जगह में समा गयी। प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया बच्चो थोड़ी देर के लिए इस काँच के “जार” को तुम लोग अपना जीवन समझो …. “टेबल टेनिस की गेंदें” सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और आपके निजी शौक हैं। “छोटे कंकर” मतलब तुम्हारी नौकरी , कार,मकान आदि हैं, और “रेत” से यहाँ छोटी-छोटी बे मतलब की बेकार सी बातें, आपसी-मनमुटाव और झगड़े हैं। अब यदि तुमने काँच के ज़ार में सबसे पहले “रेत” भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या “कंकर” भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी … ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है … यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा … मन के सुख के लिये क्या जरूरी है क्या नहीं। ये तुम्हें ही तय करना है। अपने बच्चों के साथ खेलो , पिकनिक पर जाओ पौधों आदि में पानी डालो , सुबह-शाम पत्नी व बच्चों के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, वक़्त वक्त पर अपना मेडिकल चेक-अप करवाते रहो … “टेबल टेनिस गेंदों” की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है … पहले तय करो कि क्या जरूरी है … बाकी सब तो रेत है .. ये सारा वृतांत छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..

अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि यहाँ “चाय के दो-कप” क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, और बोले .. मैं भी यही सोच रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं उठाया..? हाँ बेटे ! इसका उत्तर ये है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगने लगे, परन्तु अपने खास लोगों के साथ सिला रहमी अर्थात “दो-कप चाय” (Two Cup-Tea) पीने की जगह सदैव रखनी चाहिये। अगर दुनियां में ख़ुद के होने का तनिक भी भान है, तो जीव मात्र से निस्वार्थ भाव से न केवल प्रेम करें वल्कि व्यस्ततम समय में से वक़्त निकाल कर उनकी खैर खबर भी लेते रहा करें।

धन्यवाद ; युग पचहरा, 88-A वसुंधरा, निकट बाई-पास, हाथरस।

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