
—- पचहरा सर ————————————–
शिक्षक के दो बड़े दायित्व होते है।
एक ओर तो शिक्षक के लिए आज की जो आवश्यक शिक्षा है। जिसके लिए वह दृढ़ संकल्पित है उस ओर तो अपने शिक्षार्थियों को आगे ले जाना ही है।
लेकिन इसके साथ-साथ वह अपने विद्यार्थी के मन के अंदर…झांककर उसमें कोई परिवर्तन ला सके, असली ज्ञान का संयोग तो वो है।
जैसे;–
उसके हृदय की गहराइयों…. को बढ़ाने का।,
उसके जीवन के अंदर कुछ वेशकीमती मूल्यों की स्थापना… करने का।, यदि शिक्षा के साथ-साथ शिक्षक अपने शिक्षार्थी की संवेदनाओं को जगाने का कार्य कर पाया। तो जरूर कहा जा सकेगा… कि शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक ने अपने समूचे दायित्व को बख़ूबी निभाया है।
मांफ कीजियेगा …सभी सरकारी कर्मचारियों की वर्तमान समय में चल रही दैनिक कार्य-शैली के सम्बंध में अगर “नीर-क्षीर विवेकी” दृष्टिकोण से मैं यदि अपना पक्ष रखूँ , तो अन्य की तो बात शायद कुछ इतर हो भी सकती है। मग़र शिक्षक तीन प्रकार के होते हैं।आंकड़ों में जाऊं तो स्थिति ये है। ;-
1- एक तो वे जो शिक्षा एवं अपने शिक्षार्थियों के लिए सदैव पूर्ण समर्पित रहते हैं। ये वो शिक्षक हैं जिन्होंने “By- Choice” शिक्षा के क्षेत्र को चुना हैं।और कड़ी मेहनत एवं लम्बी तपस्या के बाद शिक्षक बने हैं।..20%
2-दूसरे वो जो आकर्षक सैलरी-स्केल, अवकाश आदि की सुविधायें देखकर ..वो भी किसी अप्प्रोच के माध्यम से नियोक्ताओं की आव-भगत करके.. “By-Chance” शिक्षा-विभाग में घुस-पैठिओं की तरह बैकडोर रास्ता बना कर घुसे हैं। वे शिक्षण में रुचि तो तब लें जब उनके बूते की बात हो।…30%
3- तीसरे वो जो ज्यादातर मौक़ा-परस्ती में माहिर हैं। मग़र अपने विषय में कमजोर न होने के वाबजूद भी अपने नियमित शिक्षण-कार्य में रुचि नहीं लेते। व्यवस्थापकों की व्यवस्थाओं की केवल चौकसी करते रहने में व्यस्त और मस्त रहते हैं। लेकिन अपनी सेवाओं को बचाने में निपुण हैं।…50%
अब सवाल फिर वही दूसरे विभागों की तो क्या कहूँ..मग़र अपने देश मे शिक्षा विभाग में तो दिन-प्रतिदिन जिम्मेदार लोगों का नैतिक-पतन इतनी तेजी से हो रहा है। जो विल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।जिससे आये दिन नित नई विडम्बनाये पनपती ही जा रहीं हैं। क्योंकि देखा गया है। कि अधिकतर जिम्मेदार पदों पर आरूढ़ पदा-अधिकारी खुद अपने पद के प्रति भी दृढ़-संकल्पित एवं ईमानदार नहीं हैं। भृष्टाचारियों में खुले-आम एक लूट सी मच रही है। जैसे वेतन तो उन्हें मिलता ही नहीं.. इस गन्दे पैसे से ही उनके घर चलेंगे।एक कहावत के आधार से कहूँ तो विल्कुल पिछले कई वर्षों से “अंधेर नगरी चौपट राजा… ” वाली ही हालत हो गयी है।
लेकिन चाहे कोई कुछ भी करे अंत मे मेरा तो फिर भी यही मानना है।कि अगर हम देश के सच्चे और जिम्मेदार नागरिक हैं।और अपने माता-पिता की “सुपात्र-सन्तान” हैं।, तो देश एवं अपना ख़ुद का प्रारब्ध सही बनाने.. के नज़रिए से.. कम से कम शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों को सदैव मर्यादा में रहना ही होगा। ; मैं एक विचारक के रूप में इस “विचार पर”ख़ुद भी अमल करते हुए..इस बात को गम्भीरता से लेने वाले सभी पाठकों का आभार प्रकट करता हूँ। धन्यवाद
जय हिंद ! जय भारत !