5-“प्रसन्नता”..(Happiness)

“प्रसन्नता” इसे जीवन का मूल उद्देश्य भी कह दिया जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

‘खुशी’ अर्थात ‘प्रसन्नता’ न सिर्फ मानव स्वभाव है,अपितु ये आत्मा की प्रवृत्ति भी है। एक और बात आप अनुभव कीजिएगा हर जीवात्मा में स्वभावत: अपनी जगह से आगे बढ़कर नंबर वन पोजिशन पर आने की चाहत अवश्य होती है ये ईश्वरीय गुण है। क्योंकि..नाम चाहे जितने हों ईश्वर तत्व तो एक ही है न।

सुव्यवस्थित जीवन की प्रसन्नता के पीछे मानव शरीर में चार हारमोंस का होना भी एक साइंटिफिक रीज़न..है।।

यही वज़ह है कि एक छोटा बच्चा ज़िन्दगी के शुरुआती दिनों.. मतलब बचपन में सबसे ज्यादा ख़ुश रहता है। मग़र जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है..परिवार,समाज या मित्र मंडली आदि के विचारों,कभी कभी कुछ वेबजह के दवाबों के वातावरण के कारण उसके दिलो-दिमांग पर जो प्रभाव पड़ते है , उनसे उसकी खुश रहने की मानवीय फ़ितरत जो प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त होती है। कहीं गुम होने लगती है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार भी खुश रहने को अच्छे स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए बेहद जरूरी बताया गया है।

मग़र अब यहां एक सवाल खुद ब खुद उपस्थित होता है कि,

Q क्या “ख़ुश रहना ” आसान है..?

हाँ, मग़र ये “प्रसन्नता ” इतनी ही आसान होती तो दुनियाँ में जितने लोग भौतिक रूप से सुविधाएं या अपार संपत्ति इकट्ठा करने वाली लॉबी या “देश ” यूं..घुट-घुट कर तो नहीं मर रहे होते!! या झूठ-मुठ की खुशी समाज एवं दुनियाँ को नहीं दिखा रहे होते!!

हिंदी में एक बड़ी मशहूर कहावत है कि लोगों के पास “सुविधाएं होती हैं पर सुकून नहीं..होता!!”

दरअसल! ” चैन ” या फिर ‘सुकुन’ अर्थात् वास्तविक प्रसन्नता (Real Happiness) के लिए विद्वानों ने कुछ मानक निर्धारित किए हैं।

प्रमुख रूप से ये छह (6)हैं।

यदि मनुष्य या फिर कोई देश उन मानकों के दायरे में स्वयं को रख पाता है,तो…ही “HAPPINESS” की कृपा उस पर बरसती है।

इतिहास साक्षी है जीवन में “सच्ची प्रसन्नता” कोई अमीरजादा अपनी “अपार संपत्ति” लुटाकर भी नहीं खरीद पाया है।

अब आप स्वयं ही देख लीजिएगा कि, जिंदगी में खुश रहने के मायने कितने अलग होते हैं।

कि कोई तो अपनी छोटी-छोटी खुशियों में जी..लेता है। और किसी के लिए अपार धन,दौलत भी खुशी जुटा नहीं पाती!!

बताइए ! ये कैसी विडंबना है…?

इसीलिए लोग अक्सर बोल देते हैं कि “खुशी” को मापने के सभी ने अपने-अपने पैरामीटर्स बनाए हुए हैं। हैं।

मगर मेरा व्यक्तिगत मानना ये कि, खुशी के पैरामीटर्स अलग अलग नहीं हो सकते ये सार्वभौम होते हैं। अर्थात समूचे ब्रह्मांड में खुशी के मानक सबके लिए एक होते हैं।

अब ये तो उस अमुक व्यक्ति पर ही निर्भर करता है कि “वह” खुशी किस चीज़ में ढूंढ़ता है..??

जैसे किसी को दूसरों की मदद करके (जन सेवा में) आत्मिक सुख मिलता है। तो किसी को जीवन भर सब कुछ अपने “गृहस्थ की भट्टी ” में झोंकते रहने..में मज़ा आता है। चाहे परिवारी जन तवज्जो दें या नहीं।

ये तो सही है। और ऐसा होना भी चाहिए वरना सब एक जैसा । सोचने लगे.., तो फिर ये दुनियाँ रंग-बिरंगी कैसे होती।

इसी “मन की प्रसन्नता ” के विचार पर.. अब हम व्यक्तियों…से आगे बढ़ कर ” देश और दुनियाँ ” की प्रसन्नता की बात करते हैं…

हां तो ये मंजर उस दौर का है जब 1972 में पहली बार किसी देश ने दुनियाँ में हो रही “भटकाव की रेट-रेसिंग” से अपने आप को अलग करते हुए जीवन के मूल उद्देश्य को न केवल समझने वल्कि उसे सही तवज्जो दे कर एक सार्थक पहल की थी।

जबकि भौगोलिक स्थिति में वह एक छोटा सा देश है जिसे हम “भूटान” के नाम से जानते हैं। मग़र यहाँ एक बात हम सबको अवश्य समझ लेनी चाहिए, कि किसी व्यक्ति या देश के पास आर्थिक या भौतिक संपन्नता एक बार को न भी हो लेकिन उसे छोटा समझने की भूल कभी न करें। क्योंकि किसी व्यक्ति या देश का कद बड़ा होता है उसकी ” सकारात्मक सोच, सही रणनीति एवं वक्त को समझते हुए लिए गए “सही फैसलों से।”

मैं ऐसा मानता हूँ किसी देश या व्यक्ति का आकार यहां कोई मायने नहीं रखता।

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है। जो सदैव अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपने सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करती है। “प्रसन्नता” के मानकों का निर्धारण करने के लिए UNO के समक्ष जब भूटान देश ने आग्रह किया तो काफ़ी विचार-विमर्श एवं योजना के बाद पहली बार 1972 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक” की अवधारणा बनी।

इसके बाद से समय रहते जो देश इन मानकों की कसौटी पर अपने आपको कस सके वही देश प्रति वर्ष ” World Happiness Index ” (W.H.I.) में अपने आपको टॉप TEN में ला पाए हैं और कुछ लगातार अभी भी प्रयासरत हैं।

किसी व्यक्ति या फिर देश अपनी “प्रति व्यक्ति-आय” “जीओ और जीने दो” जो जीवन की “प्रसन्नता” के लिए मूलभूत आवश्यकता होती है। उसके प्रति कोई जितना सजग होता है,उतना ही वह परिवार या देश का प्रबन्धन अच्छा कर लेता है।

इसके लिए हमें स्वयं इसे जानने के साथ- साथ अपने समाज या फिर देश के सभी नागरिकों को जागरूक करना होगा। उन्हें बताना होगा कि किसी भी परिवार ,समाज या देश की भौतिक समृद्दि ,आर्थिक सुरक्षा और व्यक्ति की खुशी जिनका कि आपस में बहुत नज़दीकी सम्बन्ध होता है। अगर ये चीजें सुव्यवस्थित हैं तो वह व्यक्ति या देश निश्चित ही “प्रसन्नता” के काफ़ी नज़दीक होगा।

पिछले वर्ष 2018 -19 तक UNO में विश्व भर के लगभग 156 सदस्य देश हैं..जब प्रतिवर्ष “विश्व प्रसन्नता सूचकांक” की रिपोर्ट तैयार होती है, तो सभी देशों को उल्लिखित 6 मानको की दृष्टि से देखा जाता है।

जो देश इस कसौटी पर खरे पाए जाते हैं उन्हीं को टॉप Ten में जगह मिलती है।

अगर इस बीच अपने देश “भारत” की बात करूँ तो कुछ बीते दशकों में जनसंख्या भार और बढ़ा है।जिससे देश के नागरिकों की खुशी व आत्मसंतोष में लगातार गिरावट आती जा रही है,जो चिंता का विषय है।

W.H.I.,2018 में भारत 156 में 140 वें पायदान पर रहा।, जो काफी पीछे है। हमको लोगों के मन में “प्रसन्नता “लाने के लिए बहुत परिश्रम करना होगा।
अगर बुद्धिजीवी लोग इसे अतिशयोक्ति से न देखें तो मेरा अपना ख्याल ये है कि

“क्यों न भारत सरकार के मंत्रालयों में एक मिनिस्ट्री ‘ Happiness ‘ के नाम से नव सृजित कर ली जाय।आखिर सरकार का उद्देश्य भी तो पहले अपने नागरिको के साथ साथ देश की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना ही है।


जो लोग दुनियाँ में घटित होने वाली छोटी से छोटी हलचल पर भी अपनी पैनी नज़र बनाये रखते हैं।अर्थात current affairs..के शौक़ीन हैं। उन्हें तो ये जानकारी अवश्य होगी ही,कि अभी दो वर्ष पूर्व यानि सन 2016 में संयुक्त अरब अमीरात में ” हैप्पीनेस मिनिस्ट्री” वास्तव में बनाई भी गयी है।
जिसके द्वारा वहाँ के सम्राट ने अपने देश के सभी वाशिंदों को खुशी देने का जिम्मा इसी मंत्रालय के मंत्री को सौंपा है। क्योंकि World Happiness Index,2016 में ये देश काफी पिछड़ रहा था।मग़र बहुत ज्यादा भी नहीं 156 देशों में ये 28 वें स्थान पर था।
लेकिन आप इस देश के प्रधानमंत्री की will power एवं सकारात्मक संकल्प शक्ति भी तो देखिए कि 2021 तक वह अपने देश को 28 वें स्थान से top five में देखना चाहता है।

अब यहाँ जो एक सवाल उभरता है। वो ये है कि हमारे देश की सरकारों की दोहरी एवं सिर्फ दिखावे वाली उनकी कायरतापूर्ण नीतियों से पर्दा उठाने के लिए विचारकों को लिखने को मजबूर करता है। एक एक शब्द पर जिम्मेदार लोग न केवल गौर करें वल्कि शीघ्र अति शीघ्र इन आवश्यक मानकों को अपने जीवन में क्रियान्वित भी करे, तो “हैप्पीनेस ” देश से पूर्व हर व्यक्ति के जीवन में आना पहले आवश्यक है……

आम लोगों की खुशी के लिए सबसे पहले तो उनके पेट का भरा होना बेहद जरूरी है। और इसी समुचित व्यवस्था के लिए सरकारों का गठन किया जाता है।यही वो सवाल है,जिसके प्रति हमारे देश व प्रदेशों की सरकारें उदासीन है। वे केवल व्यक्ति को हर समय एक वोट समझकर ही बात करते हैं। सच कहूं,तो सरकारें उल्टे बेरोजगारों से पैसे कमाती रहीं हैं पिछले लगभग दो दशकों से तो सारी हदें ही पार हो गयीं हैं।

जबकि आम जनता की प्रसन्नता के लिए सरकार को सर्वप्रथम बिना किसी “आंकड़े बाजी” के “रोजगार उपलब्ध” कराना नितांत आवश्यक है।

हाँ अगर देश के विभागों में किसी भी स्तर पर अनियमितताएं हैं.. तो कड़े निर्णय लेकर उन्हें दुरुस्त करें न कि जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर कायरता पूर्ण तरीके से संस्थानों को बेच दें।

सरकार “सरकारी टैक्स” को देश के होनहारों को क़ायदे से योग्य बनाने पर या देश की व्यवस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त करने पर खर्च करे न कि नेताओं या ऑफिसर्स के एसो-आराम या किसी अन्य आडम्बर पर।

भारत देश में ऐसी तमाम योजनाएं हैं जो गरीबों के नाम पर नेताओं और अधिकारियों एवं थोड़ा बहुत दलाल टाइप बिचौलियों की जेब ही भर रहीं हैं।

जनता विद्रोह के लिए मजबूर हो.. उससे पहले PM/CM/DM आदि सभी को पद की मदहोशी को त्याग कर शुध्द ह्रदय से अपने-अपने क्षेत्र में व्यवस्थाओं को समय रहते ही दुरुस्त करना होगा…

विज्ञान भले ही यह कहता हो कि इंसान का स्वभाव “संघर्ष और हिंसा” से जुड़ा है। लेकिन इसी के साथ-साथ विज्ञान ने ये भी साबित किया है कि करीबी पारिवारिक व सामाजिक नाते-रिश्तों के अभाव में व्यक्ति उपलब्धि हासिल कर लेने के बावजूद भी खुश नहीं रह सकता।

“प्रसन्नता”..के इस मुद्दे पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा..है,कि
“हम कभी-कभी जीवन में असमानताओं को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, उस वक्त हम भूल जाते हैं कि हमारे पास क्या है=? केवल हमारा ध्यान होता है कि हमारे पास क्या नहीं है=? अधिक की आशा रखना ठीक है, परन्तु हमें उन चीज़ो पर अवश्य खुश होना चाहिए जो इस समय हमारे पास हैं” ; अमिताभ बच्चन

विज्ञान तो यह पहले ही बता चुका है कि हर इंसान के अन्दर खुशी देने वाले हार्मोन्स होते हैं वो बात अलग है वे कितने सक्रिय हैं।

एक और हैरानी की बात ये है कि..
World Happiness Index,2018-19 की रिपोर्ट ये कहती है कि टॉप ten की वरिष्ठता सूची में एशिया महाद्वीप का एक भी देश अपने आप को प्रसन्नता सूची में शामिल नहीं कर सका।

आखिर लोग किन झमेलों में फँसे हैं=? न केवल हम ‘भारतीय’ वल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे आर्थिक सम्पन्न देशों के जीवन में भी ‘प्रसन्नता” नहीं है।

मैं देखता रहता हूं ..ठीक वैसे ही हमारे आस-पास धन से सम्पन्न होने का दम भरने वाले लोग “प्रसन्नता” से पूरी तरह “विपन्न” हैं।

इसीलिये ये मैं ऊपर पहले ही दावे के साथ उल्लेख कर चुका हूँ।कि “प्रसन्नता “के लिए “आर्थिक सम्पन्नता” का कोई ताल्लुक नहीं है।

फिर भी अमेरिका और ब्रिटेन 18वें व 19वें स्थान पर रहकर भारत से तो काफ़ी अधिक प्रसन्न हैं। असली Question Mark (?) तो हम भारतीयों पर है इसीलिए ये बिंदु विचारणीय है।……

विचारक ; पचहरा सर के. एल.

जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस

2 thoughts on “5-“प्रसन्नता”..(Happiness)”

  1. सही बात है चाचा जी। प्रसन्नता का अनुभव छोटे बच्चों से मिलता है जो जिद्दी तो होते हैं परन्तु असंतोष, निराशा, विलाप उनके लिए क्षणिक या अस्थाई होते हैं
    इसके उलट वयस्क उन्हें दिल से लगा के रखते हैं और छोटे छोटे नकारात्मक परिणामों को हृदय से लगा कर चलते हैं और इसे ही मैच्योरिटी भी बोल देते हैं कभी कभी तो ।
    हालांकि समय और भावनाओं के संतुलन से उत्पन्न कर्मों में ही प्रसन्नता की कुंजी छुपी है ।
    विपरीत परिस्थितियां , सैद्धांतिक रूप से तो अपने द्वारा पैदा किए गए कार्मिक असंतुलन का परिणाम ही होती हैं परन्तु कभी कभी आगंतुक अतिथि की तरह भी आ जाती हैं , इसके लिए स्वयं को उन से कैसें लचीला स्वभाव निर्माण करके निपटाना अथवा बाईपास होने की कला से प्रसन्नता का शॉर्ट कट मिलता है जो बच्चे सिखा सकते हैं,
    उनकी भी महंगे खिलौनों में ,खाने में ,और कभी कभी तो असम्भव वस्तुओं में भी आसक्ति स्वाभाविक ही प्रबल होती है परन्तु ना मिलने पर भी उन में उस नकारात्मक समय अथवा परिस्थिति को भूल कर कुछ क्षण बाद प्रसन्न हो कर खेल में लग जाने का गुण होता है। लड़ाई झगड़ा भूल जाना,चोट को भी भूल कर खेलने लगना।
    कई विद्वानों का तो ये भी मत है कि हर मनुष्य में sportsmanship होनी चाहिए।

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