मनुष्य का स्वभाव है.. प्रशंसा की तरफ आकर्षित होना, और आलोचकों से दूर भागने का। क्योंकि डांटने वाले शिक्षक को बच्चे कम ही पसन्द करते हैं। उसी प्रकार निष्ठुर अधिकारी का भी लोग सहयोग नहीं करते। जिसका पड़ोसी आलोचक हो…वह सदा अपने को दुखी महसूस करता है। वो इसलिए कि प्रत्येक की मानसिकता है। कि उसकी..प्रशंसा हो। ये “सामान्य जन” का स्वभाव है। जो काफ़ी हद तक सत्य है। मग़र आप देखिए….और हो सके तो इतिहास के पन्नों को उलटिये…तो आप एकदम इसके विपरीत पाएंगे..हिंदी में एक कहावत भी है।….
” निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाये। बिन पानी ,साबुन बिना उजरा करे सुभाय।।” अर्थात यदि आपको दुनियाँ में ख़ास तरीके से परिभाषित होना है।,तो ‘आम-जन ‘ की “लीक ” से हटके तो चलना ही पड़ेगा। सामान्य स्तर से विशेष’ की ओर निहारना होगा। मेरा मतलव एकदम साफ है। ‘महा-मानव’ या ‘महापुरुष ‘ के रूप में स्थापित कोई यूं ही नहीं हो जाता….? इसके लिये एक अच्छी रणनीति की दरकार तो है ही। मेरे अब तक के जीवन का अनुभव भी यही कहता है.. कि ‘आलोचनाए’ मनुष्य के लिए सदैव ” पथ-प्रदर्शक ” होती हैं।..इसलिए मनुष्य सकारात्मकता के साथ-साथ यदि सहनशील भी है। तो फिर उसके अंदर सारी संभावनाएं मौजूद हो सकती हैं।
किसी ने ये भी कहा है.. कि ” निंदा हमारी जो करे मित्र हमारो सो।…” ….
इसीलिए ये कहना अनुचित नहीं होगा ..कि
“साधना के मार्ग पर ‘साधक’ को एक खूबसूरत मूर्ति बनाने वाला “शिल्पी ” वास्तव में “आलोचक” ही होता हैं। न कि “प्रशंसक”….(इस पर चिंतन करियेगा तो ही ज़हन में ठीक से बैठा पाओगे)
आख़िर में मेरा सभी से यही आग्रह है।कि
“आलोचक” के अंदर छिपे “शिक्षक” को पहचानने के लिए हमें अपने दृष्टिकोण को नेगेटिव से पॉजिटिव करना होगा।.. जो “सुधारात्मक सुझाव” हमें आलोचना लगते हैं। दरअसल वही हमारे लिए हितकारी होते हैं। इस बात को अपनी मानसिकता में बिठाना ही होगा।
यदि सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें,तो जहां तक मैं देख पा रहा हूँ। कि …..
क़ायदे का आलोचक सच्चे अर्थों में एक ” नैतिक चिकित्सक” होता है। जिस प्रकार कोई मरीज चिकित्सक के पास जांच के लिए जाता है। तो वह मरीज के शरीर के अंदर जो-जो बीमारी पाता है। उन्हें वह बड़े अच्छे से बता देता है। वैसे ही तो एक सही आलोचक आपकी “नैतिक” कमजोरियों की ओर संकेत करके आपके “चरित्र का उत्थान “करता है। क्योंकि यदि.. “नैतिकता” का पतन हुआ तो मनुष्य की एक तरह से सामाजिक मृत्यु ही हो जाती है।उसके बाद तो वह सिर्फ जीता ही है। समालोचक रूपी शिक्षक हमारे अंदर छिपी हुई बुराई की तरफ ध्यान आकर्षित कर.. हमें जागरूक बनाता है। जीवन के ऐसे “पथ प्रदर्शक ” को सिर्फ एक निंदक समझना, मेरे ख्याल से तो लोगों की एक बहुत बड़ी ‘ना समझ’ ही है। वास्तव में तो वह एक… नैतिक चिकित्सक /Moral Doctor होता है।
इस विषय को कोई भी हल्के में न लें…इस संदर्भ में समूचे समाज को एक गहन चिंतन की आवश्यकता है।…..
लेखक;-योगेन्द्र सिंह पचहरा (नीमगाँव वाले)
निवासी;- 88A वसुंधरापुरम,हाथरस ।
उत्तर प्रदेश, भारत।
Contact No. 8006943731
Very very good Chacha G
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Thanks..
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