6- मोक्ष का मार्ग..

गरुण पुराण की तर्ज पर संक्षिप्त में मानव के लिए “मोक्ष का मार्ग…” तलाशने का एक प्रयास…भर है।

भारतीय समाज में हमारे पूर्वजों द्वारा हमें एक ऐसी स्वस्थ परंपरा दी गई है कि किसी आत्मा के स्थूल-शरीर छोड़ने के बाद अंतिम-संस्कार के वक्त ‘शमशान’ में या त्रियोदशी होने तक ‘शोक-संतृप्त घड़ी के उन बारह/तेरह दिनों में,एकबार को लगता है..कि, वक़्त कुछ ठहर सा गया है।

सामाजिक लोग उस दौरान गमी वाली जगह अपना हर काम छोड़कर जाते हैं… और वहां बैठते हैं, शोकाकुल परिवार को धीरज बंधाने के साथ साथ एक दूसरे की खैर-ख़बर भी हो जाती है। अन्यथा समूची दुनियाँ में इंसान ऐसी दौड़ भर रहे हैं कि, बस.. कुछ पूछो ही नही।

मूलत: मनुष्य होता तो आत्माभिमानी (Soul-Conscious) ही है।

परन्तु वह दुनियादारी में जीवन की असल राह से भटक कर आज देहाभिमानी (Body-Conscious) बनकर ही रह गया है।

आप स्वयं ऑब्जर्व कीजिएगा.. अक्सर वह अपने इष्ट से इतर दुनियां के प्रपंच की बातों में ही लगा मिलेगा।

उसके आचरण से लगता है,मानो ! अपने समाज और देश के प्रति, तो उसका कोई दायित्व बनता नहीं।

यदि मैं, आंकड़ों में जाऊं,तो दुनियां के लगभग अस्सी फीसदी लोग “डिग्रेस मोड” पर बड़े तल्लीन होकर अपनी ‘उचित-अनुचित’ जैसी भी कमाई है ‘गृहस्थ’ नाम की भट्टी में झोंकेते चले जा रहे हैं।

जबकि, आत्मा की प्रोपेंसिटी एंजॉयिंग होती है। परंतु मुझे लगता है कि दुनियां में भौतिकता की “अति” का चकाचौंद आम इंसान को “आनंदित जीवन” की राह से भटकाये हुए रहता है।

क्या आपको नहीं लगता! कि,मनुष्य चेतना के स्थान पर सिर्फ मन और बुद्धि के हाथों की एक कठपुतली बनकर रह गया है..??

गरुण पुराण कहता है कि “मानव योनि” में जिंदगी को व्यवस्थित तरीके से जीने के लिए.. मनुष्य को हमेशा विवेकशील होकर..इन चार मूलभूत आवश्यकताओं को फोकस करना लाज़मी है। वाकी तो जो उससे बन पड़े ठीक है।

ये चार चीजें हैं.. “रोटी, कपड़ा, मकान एवं

“ज्ञान”।

और जो “मनुष्य आत्माएं” किसी गफलत में धन के गठजोड़ को अपने जीवन का पार्ट समझ.., दुनियां में व्याप्त “रेट 🐀 रेसिंग” में शामिल होकर अपने मन का चैन एवं हैप्पीनेस ऑफ द लाइफ” जो जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं उन्हें दांव पर लगाये हुए हैं।

अतः वे भटक कर “मोक्ष के मार्ग” से काफी दूर निकल गए हैं।

मनुष्य की “सोच” को आधार मानकर समूचे जगत को तीन भागों में बांटा गया है..

मन का प्रतीक..

1-भौतिक जगत (80%)

बुद्धि का प्रतीक

2-मानसिक जगत (12%)

चेतना एवं विवेक का प्रतीक

3-आत्मिक जगत (08%)

अच्छा! ये आंकड़े इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि, भौतिक जगत जो 80 प्रतिशत है वह दुनियां की एक बहुत बड़ी आबादी है।

कहना न होगा कि, संसार में सदैव से भटके हुए लोगों का बाहुल्य रहा है।

जो “फेयर & फ़ाउल” धन इकट्ठा करने में लगे होते हैं। ऐसा करके “ये तो.. ये..वे अपना परलोक भी बिगाड़ लेते हैं।”

इतिहास साक्षी है “ऐसे लोग जिंदगी के झमेलों में उलझकर एक दिन प्रायश्चित की दहलीज पर अपना दम तोड़ देते हैं।”

जबकि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष। ये चार दरवाजे हैं ,जिनसे प्रत्येक मनुष्य को गुजरना होता है।

जीवन में किये गए कर्मो से निर्मित संस्कारो के आधार पर न केवल मनुष्य को वल्कि प्रत्येक “जीव” को कभी अच्छे तो कभी बुरे हालातों… में जाना होता है। और ये तब तक होता है।,जब तक “जीवात्मा” ब्रहम्म में विलीन नहीं हो जाती।

कटु सत्य;

कर्मयोग में श्री कृष्ण कहते हैं कि, कोई भी “जीव” अपने द्वारा किये गए कर्म के भोग को ‘भोग’ नहीं लेता.. तब तक उसे इस मृत्युलोक से जाने की अनुमति मुश्किल से ही मिल पाती है।

ये एक अहम सवाल है कि, प्राणी अपने आप को इस जन्म-मरण के चक्कर से बचा कर “मोक्ष के मार्ग” की ओर मुखातिब करे..भी, तो कैसे =?

इसके लिए मेरा अध्ययन कहता है कि मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन “अनासक्त” भाव (Detachment) से जीए, तो संभावनाएं अवश्य बन सकती हैं।

मग़र इसे शब्दों में कहना जितना आसान है, जिंदगी को त्यागपूर्ण भाव में “जीना” उतना ही दुर्लभ भी है।

आध्यात्म में गोते लगाते लगाते ..ये भी नोट करलें कि, मोक्ष के लिए व्यक्ति में “स्थित-प्रज्ञता” का होना भी नितांत आवश्यक बताया गया है। जिससे वह अध्यात्म को अपनाकर न केवल “ब्रह्मज्ञान” प्राप्त कर सकेगा, वल्कि इसे आत्म-सात करके अपने हर कर्म को त्यागपूर्ण भाव से..अर्थात किसी से कोई भी अपेक्षा न रखते हुये ‘जीवन’ को सही राह पर ला सकता है।

Infact, it may be..

“the way to SALVATION”

अगर दुनियाँ की किसी वस्तु या व्यक्ति में आपकी आशक्ति (Attachment ) शेष है। तो फिर ये भी जान लो ..जैसे ही नया कर्म बनना शुरू होता है, ठीक उसी ममता रूपी कर्म-बीज से ‘भाग्य ‘बनना भी शुरू हो जाता है। और फिर वही सब नए कर्म का नया चक्कर.. अर्थात संचित कर्म, “प्रारब्ध” जो आत्मा में निहित “जीव” के कर्मों का एक स्थाई खाता होता है।

ध्यान रखिएगा! ये प्रारब्ध नाम का “स्थाई खाता” जन्म-जन्मांतर तक ‘चेतना’ की तरह सदैव “आत्मा” के साथ रहता है। यही वो कारण भी है जो लोगों को ग़लतफ़हमी में रखता है।

आपने सुना भी होगा.. अक्सर लोग हैरानी से कहते पाए जाते हैं कि “भई इंसान तो बड़ा नेक दिल था न जाने उसके साथ ऐसा कैसे…? हो गया।”

या फिर इसके विपरीत “वो व्यक्ति बड़ा नीयत का बुरा है,जालसाज है,स्वार्थी है, दुराचारी है..असामाजिक है वग़ैरह वग़ैरह। पर न जाने क्यों.. ? उसके दुष्कर्म अभी सामने नहीं आ रहे..?”

यहां कर्म-योग प्रत्येक जीव को सचेत करते हुए कहता है… कि,” कोई कभी भी किसी खुशफ़हमी में न रहें.. कर्म का लेखा जोखा

अवश्य ही आगे आता है ..क्योंकि हमारे बड़े बुजुर्ग कहते आए हैं कि, “दुनियाँ में देरी जरूर है मग़र अंधेरी, तो बेटा! कतई नहीं है।”

इस वृत्तांत से अगर एक भी व्यक्ति के कर्म की चाल में बदलाव आ जाए.. और वह कर्म/अकर्म एवं विकर्म का गणित.. समझ जाए, …तो मेरा मक़सद भी सार्थक हो जाएगा।..

अकर्म= परोपकार.. (उच्च स्तर)

कर्म=सुकर्म…(मध्य स्तर)

विकर्म = दुष्कर्म ( निम्न स्तर)

समय मेहरवान हो, तो इतिहास में झांककर अवश्य देखिएगा..जिन्होंने इन बातों को अपने जीवन में उतारा है। केवल वही इस “भव-सागर” से ससम्मान पार हो सके हैं।
उदाहरण के तौर पर मीराबाई और सुदामा जी दोनों ही “स्थित-प्रज्ञ” योगी थे। जो न केवल इस भव सागर से पार हो गए, वल्कि आने वाली अनेकों संततियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर एक नई राह दिखा गए।

दुनियाँ में दिन प्रतिदिन बढ़ता हुआ जनसंख्या घनत्व भी इसी ओर इशारा कर रहा है। मुक्ति न होने के कारण अधिकतर ‘जीव’ बार बार संसार में लौटकर इस भवसागर में हिचकोले खाने को मजबूर हैं।

अक्सर ये भी देखा जाता है कि कुछ आत्माएं (मनुष्य) संसार में आकर अपने पैदा होने का मूल कारण भूल कर, कर्तव्यों से विमुख, अपना बहुमूल्य मानव-जीवन स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अधिकारों की जिद्दो-जहद में और ख़ुद की बनाई हुई मनगढंत धारणाओं के “इच्छा भंवर “में फंसकर जिंदगी को ऐसा उलझा लेते हैं कि उन्हें सिर्फ अपनी ही बात ठीक लगती है। उनमें दूसरों की सुनने की,तो सामर्थ्य ही…नहीं होती। ये स्थिति ही विध्वंसक होती है।

मगर ऐसे लोगों को हमें केवल एक उदाहरण बतौर ही लेना चाहिए.. उनके “नामों” में,तो कभी भी नहीं जाना चाहिए। अन्यथा! लोगों की नजर में उनके चेहरे खराब हो जायेंगे।

समाज में दुर्भाग्य से ऐसे ही कुछ मंज़र मैंने कई एक बार साक्षात देखे हुए हैं। शायद ऐसी ही कुछ विडम्बनाओं ने मेरी अन्तरात्मा को इस विषय पर अपना मनतव्य ज़ाहिर करने को बाध्य कर दिया होगा। तभी मैं ये सब कह गया.. वरना! लोगों को “मोक्ष का मार्ग” दिखाने की मेरी क्या.. विसात है..!!

दूसरे मानव शरीर की “क्षण-भंगुरता” एवं “मृत्यु अंतिम सत्य है।” ये कॉमन सी बात कौन नहीं जानता..??

मेरा अध्ययन और मेरे अनुभव कहते हैं कि, व्यक्ति के संचित कर्मों के आधार पर सब कुछ “पूर्व निर्धारित” “नियति-नटी” के खेल जैसा है। लेकिन “मन की चंचलता” से यदि बचे रहेंगे, तो समझो जीते-जी भी मनुष्य के “मोह का क्षय” हो सकता है, जो “मोक्ष का सच्चा मार्ग” बताया गया है।

इसी संदर्भ में हिंदी के एक महाकवि श्री भूधरदास जी की इन पंक्तियों के साथ मैं,अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगा..

“राजा ,राणा,छत्रपति।
हाथिन के असवार।।
जाना (मरना) सबको एक दिन।
अपनी-अपनी बार।।”

ॐ शांति.. ॐ शांति..ॐ शांति..

एक ‘मानव-मन’ की संवेदनाओं के माध्यम से जीवन के असल पहलू को छूने का एक प्रयास..

विचारक ;- योगेन्द्र सिंह पचहरा पुत्र श्री जयन्ती प्रसाद, पौत्र श्री साहब सिंह मुखिया जी।,नीमगांव। cont. No.(7830743731)

कार्यरत; जैन इंटर,कॉलेज,सासनी।

5 thoughts on “6- मोक्ष का मार्ग..”

  1. Really it’s very important thoughts and examples that’s can changed the life everyone parson. Thank you very much sir. Am Regardewale you and your thoughts

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  2. धर्म अर्थ काम मोक्ष & रोटी कपड़ा मकान और ज्ञान की
    Best theory चाचा जी।
    एक ज्ञान (जो रिले रेस का बेटन है) ही है जो अमर है और सदैव बढ़ते रहने वाला है और नहीं तो और सभी वस्तुएं नाशवान हैं ।

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