सफल,
समर्थ
एवं
महान
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मैं किसी भी एंगल से ” सफल ” शब्द को उस रूप में “सम्भाव्य” नहीं समझता। जिस रूप में आज दुनियाँभर में ये प्रचलित है।
मग़र इसका मतलव ये भी मत लगा लीजियेगा कि मैं इन शब्दों के प्रति नकारात्मक हूँ।
मेरी मान्यताओं की परिधि में व्यक्ति के..अलग-थलग पड़ने से बेहतर है कि वह अपने सकारात्मक विचारों के साथ परिवार,समाज एवं देश-दुनियाँ के किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहे..
क्योंकि विचारकों व शिक्षकों का स्थान-निर्धारण या उनके सफल-असफल होने का मूल्यांकन करना इतना आसान नहीं होता है।
इसीलिए मैं, खुद व्यक्तिगत तौर पर सफल, समर्थ और महान जैसे भारी भरकम शब्दों से हमेशा बचने का प्रयास करता हूँ।
हाँ, मैं महत्व देता हूँ। “जनकल्याण “से जुड़े उन कार्यों को…जिससे न केवल खून के रिश्तों में वल्कि समाज के किसी भी वर्ग के लोगों के दिलों में प्रेमपूर्वक, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, लेकिन एक आत्मीय रिश्ता बनता है।
जीवन के उन आदर्श मानव मूल्यों को,मैं सदैव महत्व देता हूँ।
वैसे प्रकृति, ,संस्कार,परम्परा या फिर चमत्कार इत्यादि अपनी जगह ठीक है।
सच में मुझे तो इन अल्फाज़ो से भी बहुत ज्यादा मोह नहीं है।
मेरे लिखने की इच्छा और प्रयुक्त की गई शब्दावली , मेरी ख़ुद चुनी हुई शब्दावली होती है। अपने भाव स्पष्ट करने के लिए..चाहे मुझे कोई शब्द अंग्रेजी या उर्दू भाषा से ही उधार क्यों न लेना पड़े। मैं ले लेता हूं।
यहाँ मेरा ऐसा मानना है कि “विचारक” का भाव यदि उच्च है, और उसकी अभिव्यक्ति में तटस्थता के साथ-साथ शब्दों का बेहतर चयन है।, तो उसकी लेखनी शून्य में भी अपने शरीरी और अशरीरी (रियल & फ़िक्शन) दोनों प्रकार के व्यक्तित्व को लोगों के जहन में स्थापित कर सकती है।
1- प्रत्येक जीव के लिए “एक सुव्यवस्थित जीवन ” तथा..
2-जीवों के मृत्युलोक में बार बार आने से “मुक्ति-प्रयास” के रास्ते तलाशते रहना मेरे लेखन की प्रकृति है।
ध्यान दीजिएगा मेरा “लेखन” भावनाओं का मायाजाल कतई नहीं है। आप गौर करें तो पाएंगे ये लोगों के परिश्रम और उनकी प्रतिभाओं का यथार्थ प्रदर्शन है।
मेरा ऐसा मानना है,कि आज के ‘लेखन की दुनियां में “भावनात्मक-जाल” बुनने वालों के दिन तो अब लद गए..
हमें, एक बात तो माननी पड़ेगी, “परिश्रम एवं प्रतिभा” व्यक्ति को अकेला अवश्य बना देते हैं। जिससे ऐसी ” विवशता ” में उसके पास दूसरों का ‘साथ’ निभाने का वक्त ही कब होता है।
वो तो अपना “हर पल “जो बहुत कीमती है,अपनी ‘प्रतिभा और परिश्रम’ को ही देने की चाह में जी…ता है। अब उसकी ऐसी “विवशता” को यदि कोई व्यक्ति अपने चश्मे से …
स्वार्थी,अहंकारी या ओवर-रिजर्व होने का नाम दें ,तो..जनाव! दोष उनके आंकलन में है। न कि अमुक व्यक्ति की “प्रतिभा और परिश्रम” में।
दूसरे को समझने के संदर्भ में यदि मैं पुनः कहूँ..तो हुज़ूर बात थोड़ी कड़वी जरूर है। मगर एकदम ‘सोलह आना’ सही है।
जिस प्रकार “एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवारों के सदस्य वैचारिक एवं स्वाभाविक दृष्टि से अलग-अलग हो सकते हैं। ठीक उसी प्रकार (अंतरंग मनोभाव की दृष्टि से ) वो आपस में एक दूसरे को निजी
तौर पर उतना नहीं समझ पाते जितना उन्हें बाहर यानि समाज के, लोग जिनका वैचारिक एंगल लगभग एक है।,
(But I know it may be point to point differentiation…)
मैंने Re-search के दौरान जब “गृहस्थ-लोगों” के विचार लेने के लिए कुछ सर्वे किये, (क्योंकि मेरा शोध-कार्य
” Relationship” based था ) तो हमारी सर्वे टीम को गृहस्थ जीवन में एकरूपता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले “पति-पत्नी” के बीच भी बहुत बड़े Understanding-Gap मिले, जो उस वक्त मेरी समझ से परे थे। उतना तो नहीं मगर आज मैं मान सकता हूँ। कि “पति- पत्नी” के बीच का Gap दो शब्दों के बीच इस ‘डेस’ के जैसा है। तब तो ठीक है। मग़र उससे अधिक है तो ग़लत है।….
मांफ कीजियेगा अब मैं असल मुद्दे पर आता हूँ।
परिश्रमी और प्रतिभावान व्यक्ति के पास दूसरों के भाव, रुचियों,आराम एवं आलस्य का हिस्सेदार बनने के लिए वक्त नहीं होता।
हाँ ये बात भी गौरतलब है कि अगर कोई व्यक्ति परिश्रमी है। तो उसकी ‘मेहनत’ और लोगों की दुआ, बुजुर्गों का आशीर्बाद उसे भीड़ बनने और प्रतिभा उसे दुनियांदारी की भीड़ में खो जाने की इज़ाज़त नहीं देते। एक न एक दिन वह ख़ुद व खुद एक सितारे की तरह चमक उठता है।
मनुष्य होना तो मेरी नियति थी, एक शिक्षक एवं विचारक मै खुद अपने परिश्रम के आधार पर स्वेच्छा से (By-Choice) हूँ।
आज मैं जो भी हूँ। अगर वक्त की इजाज़त हुई तो आने वाले समय में ख़ुद को जो Prove कर पाऊंगा। वो अपनों की दुआओं,बड़ों के शुभाशीष एवं मेरी ख़ुद के अर्जित संस्कारों के बल पर ही कर पाऊंगा।
अपने अब तक के जीवन-अनुभव के आधार पर मेरा ऐसा मानना है कि यश, प्रतिष्ठा और लेखन का मूल्य..अच्छा लिखने से नहीं,
ये तो यश और मूल्य देने वाले लोगों की इच्छा के अनुरूप लिखने या करने से मिलता है। जो मुझे स्वीकार नहीं या फिर ये समझो कि वो कला मुझे आती ही नहीं।
ऐसी दोहरी (Double standard) ज़िन्दगी की सुविधाओं से कम से कम मुझे तो कोई लगाव नहीं।
क्या बताऊँ कभी-कभी जीवन में ऐसे ‘टर्निंग पॉइंट’ भी आए हैं जहाँ मैंने वैचारिक तौर पर “अपने सिद्धांत” के साथ ख़ुद को अकेला पाया है।। चाहे मामला पारिवारिक हो या सामाजिक मुद्दे का।
मगर मैं अच्छे से जनता हूँ वैचारिक “मत-भेद” किसी मुद्दे पर “बाप-बेटे” के बीच भी हो सकते हैं। ये कोई दोष नहीं।क्योंकि चीज़ो को देखने एवं समझने का और फिर उनको अभिव्यक्त करने का नजरिया Person to Person differ हो सकता है।
(ये 30 सितंबर,2019 को ब्लॉग-राइटिंग के शुरू में पब्लिश किया हुआ पहला ब्लॉग है।)
विचारक ; पचहरा सर
जैन कॉलेज,सासनी वाले

Respected sir, am absolutely agreed with you sir because every person has different things and different opinions about each other.
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Thanks V P singh ji
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Sir, I salute you. your every blogs are important for humanity. and thought full for human beings that they can change our society and thoughts. Today it’s important factors that everyone have not insufficient time in our life. Because the time is running fast. Every person are very busy in mention our life. Lekin bakai aapke bichar sochne par majboor karte hi. Kyo, kiske liye or kese …? Aaj ke time ne vyakti gumrah jada ho raha hi bas dode he ja raha hi duniya ki dod me . Use khud bhi pata nahi hi kyo dod raha hi kiske liye dode ja raha hi kya karna chahta hi khud bhi nahi janta. Or kya hoga isse last me kuchh pata bhi nahi. Really am very thankful you sir.
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Vijay pratap ji your responding is Very high level … Thanks..A ..lot
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