7- “गीता विज्ञान से आगे..”

बेशक ऐसा लगता जरूर है कि विज्ञान ने आज बहुत तरक्की कर ली है।हमारे वैज्ञानिक दिन प्रतिदिन कुछ नया ही खोज रहे है। हम देख भी रहे हैं। आये दिन अनेको नई तकनीक स्तेमाल भी हो रहीं हैं।जिससे आज के नव युवक बोलते भी हैं कि हमारा जमाना हर क्षेत्र में काफी उन्नत है।लेकिन अगर आप वास्तव में देखें..तो आज नए अविष्कार कम.. पुराने Develop अधिक हो रहे हैं जैसे.. एडिसन ने “बल्व” का अविष्कार किया था।जिसमें बिजली की ख़पत को बचाने के लिए आज के वैज्ञानिकों ने उसे develop करके ट्यूब लाइट,और एलईडी बल्व तैयार कर दिए। हालांकि ये भी बहुत बड़ा काम है। एक बल्व की बिजली की खपत में अब सारे घर के 10 से 15 तक LED बल्व जल जाते हैं।बहुत बड़ा आर्थिक लाभ है। मग़र कोई ये कहे कि ट्यूब लाइट्स एवं LED बल्व आज के अविष्कार हैं एकदम ग़लत होगा। “बल्व” का अविष्कार एडिसन के ही नाम रहेगा।
इसे ठीक से समझने के लिए हमें लगभग 5000 वर्ष पूर्व घटित हुई घटनाओं के विश्लेषण में जाना होगा। क्योकि “महाभारत” के समय विज्ञान का जो स्तर था वो अभी भी नहीं है। जबकि आज Science & Technology..की बातें बहुत होती हैं।लेकिन काम भी हो रहे हैं.. इससे भी कोई इन्कार नहीं किया जा सकता। मग़र अभी हम विज्ञान के उस स्तर को नहीं छू पाए हैं।जो उस वक्त था।ये बात भी अपनी जगह सही है।
जिस प्रकार Science & Technology आज भौतिकवाद का पर्याय है। ठीक उसी प्रकार हमारे धार्मिक ग्रंथ..जैसे;–रामायण,भगवतगीता,कुरान,बाइबिल एवं ईसाइयों का ‘Sermon on the Mount’ ये अध्यात्म का पर्याय कहे जा सकते हैं।
अब मूल विषय के अनुसार धार्मिक ग्रन्थ जैसे; “गीता ” एवं “विज्ञान” में आज कौन आगे है…=?
इस पर काफ़ी विश्लेषण करने के बाद मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। ,कि गीता – विज्ञान से अभी भी बहुत आगे है।क्योंकि शोध के दौरान हमने पाया। कि गीता व्यक्ति के सभी संशयों का निराकरण करती है।
ये भी गीता का ही ज्ञान था। जिससे अर्जुन का मोह दूर हुआ। आज के विज्ञान पर आत्ममुग्ध इंसान ने जब कहीं थाह पाने की सोची, तो उसे भी आख़िर में इसी ग्रंथ “गीता’ से ही दिशा मिली।
गीता के अध्ययन,वाचन और चिंतन से हमे अर्थात सम्पूर्ण मानव-जाति को इस बात का बोध होता है। कि इस नश्वर संसार में अविनाशी सुख की प्राप्ति कैसे की जा सकती है=?
गीता , मनुष्य के भ्रम और जिज्ञासाओं का समाधान करती है।ये देशकाल आदि सीमाओं से परे है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।कि आज की सांसारिक समस्याओं का हल भी श्री कृष्ण की अमृतमयी वाणी “गीता” में ही है। कहीं अन्यत्र नहीं है। गीता आकार में बड़ा ग्रंथ तो नहीं है।फिर भी मनुष्य के कल्याण से संबंधित कोई भी प्रश्न ऐसा नहीं है। जिसका उत्तर (समाधान) इसमें न हो। मै देख रहा हूँ। कि आज के समय में “होड़ और विलासिता” लोगों में इस हद तक पहुँच गयी है।कि वे अपने दुःख से दुःखी नहीं हैं। वे दूसरों के “सुख” से…, कहीं अधिक दुखी हैं।क्योंकि आज ये देखने को मिलता है। कि लोगों में “अपनापन” (आत्मीयता) खत्म हो गयी है। मग़र सही सोच रखने वालों के साथ साथ विलासिता से ऊबे हुए व्यक्तियों को भी “शांति” की तलाश.. हो, तो उनके लिए भी गीता में युक्ति, तर्क-संगत-साधन आदि सब निहित है। क्योंकि अध्ययन के दौरान मैने पाया कि ” गीता ” में कहीं युक्ति तो कहीं दृष्टान्त के साथ ..क्यों=? और कैसे=?..
का भी जवाब है। इसमें व्यक्ति को कर्तव्य का ज्ञान जिस तरीके से कराया गया है। वह तो वाक़ई अपने आप में बेजोड़ (Unique) है।
प्रबुद्ध लोग तो यहां तक कहते हैं कि इसके नियमित वाचन और श्रवन से “घोर-पापी” का भी रूपांतरण (Transformation) हो.. जाता है। शायद आपने भी सुना या देखा होगा। कि जब व्यक्ति जीवन के आख़िरी पड़ाव पर अपने विकर्मों को पूरा कर रहा होता है। मतलव मृत्यु के निकट होता है।,तो उसे गीता श्रवन कराया जाता है। वो भी शायद इसी प्रकार का सन्देश देता है।कि..
भगवत गीता न केवल भारत.. वल्कि ये तो विश्व शांति का संवाहक है। वैसे तो गीता का एक एक अक्षर मानव सृष्टि के कल्याण के लिए है।मग़र गीता के बारह वें अध्याय में श्री कृष्ण जी की उदारता..तो देखते ही बनती है।
इस में भगवन ‘जीव ‘ के उद्धार के लिए अत्यंत कटिबद्ध और उत्सुक नज़र आते हैं।ध्यान दीजियेगा ..उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा भी है।..हे मानव! अपना “मन” और “बुद्धि” तू मुझे अर्पण कर ,अभ्यास योग का आश्रय ले। या फिर रोज के रोज रात्रि में सोने से पूर्व अपने दिन भर के सारे क्रिया-कलाप मुझे समर्पित करता जा। तो इतने मात्र से ही तेरा रूपांतरण होता चला जाएगा…और इसी से तेरा उद्धार भी हो जाएगा। विडम्बना वही है कि मनुष्य इतना आसान से काम भी नहीं कर पाता।परन्तु दूसरों के दिखावे के चक्कर में मनुष्य धार्मिकता का नकली चोला पहन कर जिस प्रकार अपने मनुष्य साथियों को शुरू से बहकाता चला आया है।… वही काम वह भगवान के साथ भी करने लगा है।आप ही बताओ फिर ऐसे मनुष्यों का भला हो.. कैसे जाएगा।
इसी 12 वें अध्याय में एक प्रश्न के समाधान की तरफ मैं आपका ध्यान-आकर्षित कराना चाहूंगा। कि..
” भक्त का ‘स्वरूप’ एवं भक्त की ‘अवस्था ‘ क्या होनी चाहिए=?
श्रीमद्भागवत “गीता” के इस अध्याय में इसका तो बहुत ही सुन्दर एवं मधुर वर्णन दिया गया है। जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अनुकरणीय है। भक्त के लक्षण इस चैप्टर में वर्णित है। वही वास्तव में मानव जीवन की दिव्यता है।इसके अध्ययन के दौरान मुझे ऐसा लगा…कि सम्पूर्ण सृस्टि के प्रत्येक जीव को भगवत गीता के ज्ञान की महती आवश्यकता है।
वर्तमान काल आज मनुष्य की खुद की ना समझियों की बजह से ही “परिस्थितियों का काल” बन गया है। इसलिए अब तो और भी “गीता” की उपादेयता बढ़ गयी है।
वेशक विज्ञान ने हमे काफ़ी चमत्कारिक संस्थान दिए हैं। लेकिन मानसिक तनाव, अशांति ,भय ,रोग,दुर्भावनाएं आदि दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यहाँ तक है कि हम इतने असुरक्षित हो गए हैं। कि जैसे.. “बारूद के ढेर पर बैठे” हों। अब तो मानव इन परिस्थितियों में ऐसा फँस गया है।कि उसे अब इसका समाधान विज्ञान के पास तो नज़र नहीं आत। इसलिए भगवतगीता सम्पूर्ण विश्व के लिए न केवल शाश्वत शांति का अमोघ साधन है।वल्कि इसका अग्रदूत भी है।गीता में जिस “त्याग” की बात कही गयी है।दरअसल आज के दौर में राष्ट्रीय स्तर पर उसकी बहुत आवश्यकता महसूस की जा रही है। क्योंकि न केवल “त्याग ” के उपदेश से वल्कि इसे जिम्मेदारों के आचरण में लाने से शासन परंपराओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम और प्रजा हित की भावनाएं पैदा की जा सकती हैं।
भगवान श्री कृष्ण इस महा ग्रंथ के उपादेष्टा हैं। ध्यान दीजियेगा..तभी तो ग्वाल-वालों के संग “प्रीतिभोज” और निर्धन साथी सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठा कर स्वंय उसके चरणों में बैठकर भगवान श्री कृष्ण की “सबको समान” देखने की भावना की एकदम स्पष्ट अभिव्यक्ति है।जो सबके लिए एक संदेश है।
यदि हम किसी को भी अपना इष्ट मानते हैं .. तो गीता के संदेश को एवं श्री कृष्ण के जीवन को अपने आचरण में उतारने की आवश्यकता है। धार्मिक ग्रंथों के मात्र अक्षरों को प्रतिदिन पढ़ने से हम धर्मिक नहीं हो जाते..जब तक उनके “भाव” हमारे मन-मस्तिष्क में रच-बस नहीं जाते, और हमारे दैनिक आचरण में प्रतिबिम्बित नहीं होते। तब तक वो वाचन या पठन-पठान आदि सब मिथ्या है।व्यर्थ है।हमारे बहुमूल्य समय की बर्वादी है। अपने इष्ट/ईश्वर के चरित्र एवं आदर्श की ‘पूजा-अर्चना’ का वास्तविक अर्थ है। अपने जीवन में उनके गुणों एवं आदर्शों को आत्मसात करना।..जीव मात्र के प्रति सेवा-भाव रखना है। सबको समान दृष्टि से देखना है। हमें ईश्वर के न केवल “चित्र” का वल्कि “चरित्र” का भी पुजारी होना चाहिए।
अब एक तुलनात्मक अध्ययन पर नज़र डालिये;…

दरअसल सदैव से ये दुनियाँ भर में एक स्कूली ” सिद्धांत “के रूप में प्रतिपादित है…
√【Psycho-state always is person to person differentiate..】

अब आप विद्यार्थी की भांति स्रोता की “मनःस्थिति” का फ़र्क देखिए. जैसे:- क्लास में लेक्चरर का Pattern of Teaching सभी विद्यार्थियों के लिए वही होता है।परन्तु उनकी मनः स्थिति एक जैसी न होने की बजह से Securing of marks different होते हैं विल्कुल वही आप यहां पाएंगे..कि
“गीता” में श्री कृष्ण वक्ता हैं ..अर्जुन, संजय, और धृतराष्ट्र ये तीन स्रोता हैं।
अर्जुन ने गीता का उपदेश सुनकर ये स्वीकार किया कि “वस्तु या व्यक्तियों ” की आसक्ति (लगाव) निरर्थक है। इसलिए उसकी आसक्ति नष्ट हो गयी। गीता का ज्ञान अर्जुन के लिए आंख खोलने(Eye Opener) वाला सिद्ध हुआ। जिससे उसे कर्तव्य बोध हो गया।
संजय को आनंद और दिव्य दृष्टि मिली। जबकि गीता का उपदेश तो धृतराष्ट्र ने भी सुना था। परन्तु अपने ” हठ औऱ अहम ” की आसक्ति के पिंजड़े में बन्द रहने के कारण
वह “गीता की पवित्रता” की अनुभूति तक नहीं कर सका।
यहाँ एक प्रश्न का उदय होता है कि..
समाज में आज कितने लोग हैं जो रोजाना नियमित मन्दिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारों में जा कर आरती, शबद, कीर्तन,अज़ान आदि में सम्मलित होते हैं। मग़र उनके व्यक्तिगत जीवन-शैली को देखा जाय, तो क्या वो जिस किसी “इष्ट देव” को मानते हैं उसके चरित्र का एक भी गुण उनके आचरण से झलकता है।
क्योंकि ऐसे लोग सिर्फ “ईश्वर को मानते हैं” परंतु “ईश्वर की.. नहीं मानते।”
मग़र ज़मीनी हक़ीक़त एकदम अलग है।यानि बहुत कम लोग हैं जिनकी “करनी-कथनी” समान होती है। हर समाज में पाखंडियों की जमात ( भीड़ ) है।
गीता में संभाव्य की बात यही संकेत करती है। कि सभी “जीवों” में परमात्मा का अंश होता है।और परमात्मा में सभी हैं।तो फिर Q..हम समाज में छोटे-बड़े , ऊँच- नीच का ज़हर क्यों घोलते रहते हैं=? आप विचार करियेगा..
यहाँ मेरा सभी से ये सवाल है कि हम मनुष्य “कर्तव्यपरायणता” से विमुख होकर “आत्मज्ञान” कैसे प्राप्त करेंगे..?
एक और बात गीता ” कर्म ” (कर्तव्य) की बात करती है। “अधिकारों ” की नहीं । लेकिन हम कैसे भगवत प्रेमी हैं..?★जो “कर्तव्य” को भूल कर “अधिकारों” के लिए लड़ने-मरने में जीवन गुज़ार देते हैं।★
जबकि श्री कृष्ण ने बार बार कहा है कि
“कर्तव्य ही तेरा अधिकार है।”
वास्तव में कर्तव्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण भाव किसी “पुरुस्कार” से कम नहीं है। गीता को सम्पूर्ण विश्व के लिए “शांति” का सबसे बड़ा सफल मंत्र माना गया है।
गीता में युवाओं के लिए विशेष रूप से कहा गया है। कि “वे अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहें। गीता कहती है..कि कर्तव्य के प्रति निष्क्रियता, आलस्य, प्रमाद आदि अपने अंदर न पनपने दें।क्योंकि फल की इच्छा के लिए किया गया कार्य.. आपकी आंतरिक ऊर्जा को नष्ट करता है।
अगर कार्य (जॉब) किसी ने स्वेच्छा से ( by choice) चुना है।, तो उसे वो पूरे मनोयोग से करता है। वह ऐसा सोचता है। कि उसे सौभाग्य से लाखों-करोड़ों लोगों में से ख़ुद ईश्वर ने चुना है। इस सकारात्मक विचार से उस व्यक्ति की कार्य-क्षमता में वृद्धि होती है। जिससे कभी भी नीरसता नहीं आती। लेकिन इसके दूसरी तरफ .. अधिकतर लोग परिस्थिति बस या किसी एप्रोच से By chance जो कार्य (जॉब) पा जाते हैं। अगर उनके ऊपर सही पर्यवेक्षक न हो तो वे ‘खाना-पूर्ति ‘ ही करते है।
एक और बात, गीता पर जितनी टीकाएँ लिखी गई हैं। उतनी किसी भी धर्म ग्रंथ पर नहीं लिखी गयी हैं। “गीता का सार ” मानव जीवन को हर परिस्थिति से निकालने में सफल होने का मूल मंत्र देता है।
अब मेरे ख्याल से कई तरह से आँकलन हो चुका है। कि गीता वास्तव में निःसंदेह विज्ञान से बहुत आगे है। तुलनात्मक अध्ययन की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर चुकी है। कि “गीता ही विज्ञान से आगे है।”

Thinker ; Pachahara,Yug
(8006943731)

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