130- “नज़रिया”

शायद ये कहना गलत है कि,

“जिंदगी सिर्फ एक बार मिलती है।”

वास्तव में यदि मेरे ‘नज़रिए’ से देखा जाय, तो ये मौत है जो सिर्फ एक बार मिलती है। जिसके लिए हरपल तैयार रहना चाहिए

क्योंकि आपका दृष्टिकोण अगर आशावादी है, तो मेरा अनुभव कहता है,

‘जिंदगी’ ही है, जो हर रोज मिलती है।

बस हमको ‘जीने की कला’ आनी चाहिए।

धन्यवाद👍 YUG,पचहरा, नीमगाँव 🙏🌹 राधे गोविंद 🌹🙏

129- “सच्चा-सुख”

आपने कभी विचार किया है कि, जीवन का ‘सच्चा-सुख’ किस में है..? ये बहुत ही विचारणीय सवाल है।

“जिस प्रकार ‘पछतावा’ करते रहने से हमारा अतीत नहीं बदल सकता,

ठीक वैसे ही केवल ‘चिंता’ भी किसी का भविष्य नहीं संवार सकती।”

अगर ‘सच्चे-सुख’ की चाह रखते हो, तो “जब आँख खुली तभी सवेरा..” वाले सिद्धान्त से अपने विचारों और दैनिक क्रिया-कलापों में कमी जब-जब कमी पकड़ में आये तब-तब स्वतः सुधार करते रहो….

और जितना सम्भव हो सके, अपने आपको वर्तमान में ही रखो, अपने वर्तमान के हर पल को आनंद लेते हुए जीओ..

चाहे परिस्थिति विपरीत ही क्यों न हों…. क्योंकि मन सही तो सब सही।

किसी विद्वान ने बड़ा उचित लिखा है कि,”भविष्य भी उन्हीं का उज्ज्वल होता है जिनका वर्तमान साफ-सुथरा होता है।”

मेरे ख़्याल से जीवन का “सच्चा-सुख” भी शायद इसी गुत्थी में कहीं न कहीं उलझा हुआ है।

फ़ैसला आपके हाथ है कि, आप जीवन की गुत्थी को सुलझा कर ख़ुद पर लागू किस तरह कर पाते हैं..?

धन्यवाद👍

युग,पचहरा,नीमगाँव

🙏🌹 राधे गोविंद 🌹🙏

128-परीक्षा,प्रतीक्षा एवं समीक्षा..

वास्तव में ‘मानव-जीवन’ को शांतिपूर्ण तरीके से जीने के लिए हम सबका इन तीन शब्दों के साथ न्यायोचित व्यवहार लाजमी है।

1- ‘परीक्षा’ सांसारिक लोगों के व्यवहार की होनी चाहिए..

2-‘प्रतीक्षा’ परमात्मा की तरफ से होने वाली ईश्वरीय कृपा की.. ही की जानी चाहिए.. और

3-हमें समय-समय पर ‘समीक्षा’ ख़ुद की अवश्य करते रहना चाहिए।

ताकि हम अपने आपको दुनियाँ की अस्सी फ़ीसदी भटकी हुई बहुत बड़ी भीड़ से अलग रख पाने में कामयाब हो सकें।

वरना! ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की..’ वाली तर्ज पर

“ये सांसारी-लोग” किसी को भी शांति से जीने कहाँ देते हैं.. ?

मेरा आशय समझ रहे हो ना!..

जबकि, हम करते क्या हैं.. एकदम इसका उलट..

जैसे; हम लोग हरपल परमात्मा की परीक्षा, लेने की फ़िराक़ में रहते हैं..

प्रतीक्षा, सिर्फ अपने भौतिक-सुखों की करते हैं और किसी की नहीं..

और समीक्षा भी सदैव दूसरों की.. करते रहते हैं। अपनी कभी नहीं।

जो मेरे ख़्याल से निहायत ही..अर्थात सरा-सर ग़लत है। अब फ़ैसला आपके हाथ में है।आप अपने अन्तःकरण में झांकियेगा और देखिएगा कि, आप इन चीजों का अपने जीवन में कितना क्रियान्वयन कर पा रहे हैं….?

पढ़ने के लिए धन्यवाद👍

🙏🌹 राधे गोविंद🌹🙏

127-“सर्वश्रेष्ठ-शिक्षक”

सच में “सर्वश्रेष्ठ शिक्षक” ..कोई व्यक्ति नहीं..

वे मानक होते हैं जो व्यक्ति को ‘मानव-मूल्यों’ पर आधारित अपने कर्त्तव्य के प्रति सदैव अनुशासित और समर्पित रखते हुए सत्कर्म करते रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

जहां ‘ऊर्जा’ व्यक्ति को कर्म करने की सामर्थ्य प्रदान करती है वहीं ‘समय’ व्यक्ति को जीवन की कीमत का एहसास कराता रहता है।

किसी व्यक्ति द्वारा होने वाले दैनिक क्रिया कलापो में ‘समय एवं ऊर्जा’ का “उचित संश्लेषण” ही उसको सर्वश्रेष्ठ शिक्षक के दायरे में लाता है।

ऐसे गुरु में आस्था रखने वाले शिष्यों के ‘जीवन’ भी अवश्य सँवर जाते है।

जय हिंद👍 जय भारत

🌹🙏 राधे गोविंद 🙏🌹

126- “किरदार”

हम सबको को अपना “किरदार” सदैव बहुत अच्छे से निर्वहन करना चाहिए…..

क्योंकि..

मेरा ऐसा मानना है कि, जीवन की समाप्ति पर लोगों के ज़हन में हमारी ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ यदि कुछ वाकी रह जाता है, तो वह हमारी ‘छबि’ अर्थात “किरदार” ही रहा जाता है..

जो प्रारब्धवश हमने अनेक परिस्थितिओं से ताल-मेल बिठाते हुए ताउम्र ‘जिया’ होता है।

जैसा भी है.. विल्कुल वैसी ही लोगों के दिल-ओ-दिमांग में हमारी एक इमेज सेट हो जाती है..जो परिवार, समाज, संस्था एवं देश-दुनियाँ बिच ज़िन्दगी के बाद भी समय-समय पर लोगों द्वारा याद किया जाता रहता हैं। वही है है आपका “किरदार” है।

धन्यवाद👍

;YUG,पचहरा, नीमगाँव, राया, मथुरा 🙏🌹राधे गोविंद🌹🙏

125- “भाव”

” ‘भाव’ बिना बाजार में, वस्तु मिले ना ‘मोल’

तो ‘भाव’ बिना “प्रभु” कैसे मिलें, जो हैं..विल्कुल ‘अनमोल’ “

“बातचीत”…. भी यूं तो एक शब्द ही है, पर ‘स्वस्थ-मानसिकता’ के साथ ‘सच्चे-भाव’ से ‘बातचीत’ की जाए, तो मेरा ऐसा अनुभव है कि, दिलों के वर्षों पुराने मैल भी धुल जाते हैं।

बशर्ते कि ‘बातचीत’ करने के लिए दोनों पक्षों का “भाव” एक समान हो..!! क्यों..?

धन्यवाद👍

योगेन्द्र सिंह पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा

124- “स्थाई-पूँजी”

मनुष्य के पास सबसे बड़ी ‘स्थाई-पूँजी’ उसके अपने ‘अच्छे-विचार’ होते हैं..

क्योंकि ‘धन’ और ‘बल’ एक तो सदैव रहते नहीं हैं, दूसरे इनकी अधिकता किसी को भी गलत राह पर चलने को बाध्य कर सकती हैं।

किन्तु “अच्छे-विचार” मनुष्य को हमेशा सद्मार्ग पर चलते रहने को ही प्रेरित करते हैं।

इसलिए मेरा तो यही मानना है कि, इस दुनियाँ में मनुष्य के पास “विचार” से बड़ी कोई “स्थाई-पूँजी” है नहीं।

इसी सन्दर्भ में .. अंग्रेजी के एक बहुत ही मशहूर कवि ‘Mr.जॉन मिल्टन’ के वो शब्द यहाँ प्रासंगिक हैं..

He said that,

“Only two things are permanent in this world

No.1 Thinking,

No.2 implemented-Task on the basis of thought.

rest of things are not only temporary but also ephemeral.”

अर्थात “दुनियाँ में सिर्फ दो ही चीजें स्थाई हैं।

न.1 “सोच”

न.02 “विचार” यानि वैचारिक धरातल पर मनुष्य द्वारा खड़ा किया हुआ ‘कृतित्व’।

वरना दुनियाँ भर में ‘वो सब’ जो हम अपनी आँखों से देख रहें हैं न केवल ‘क्षणभंगुर’ है वल्कि पूर्णरूप से ‘अस्थाई’ है- टेंपरेरी है।

फ़ैसला आपके हाथ में है..”परमानैंट” की ओर अग्रसर होते हैं या अस्सी प्रतिशत भौतिक जगत की बड़ी भीड़ की तरह परम्परागत तरीके से “टेंपरेरी” जाल में ‘मनुष्य-जीवन’ को उलझाकर प्रायश्चित करते हुए एक दिन दुनियाँ को ‘गुडबाई’ कर जाते हैं।

धन्यवाद👍

🙏🌹 राधे गोविंद 🌹🙏

123- “सुपर-पॉवर”

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते समय “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहा, : हे पार्थ! तराजू पर पैर संभलकर रखना..अर्थात संतुलन बनाये रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो.. इस बात का तुम्हें खास खयाल रखना होगा, इस पर अर्जुन ने कहा :

“हे भगवन” सबकुछ अगर मुझे ही करना है , तो फिर आप क्या करोगे.. ??

वासुदेव हंसते हुए बोले : हे पार्थ , जो आप से नहीं होगा मैं वह करुंगा.?

पार्थ ने कहा : प्रभु! चलते-चलते ये भी बता दो, ऐसा क्या-क्या है जो मैं नहीं कर सकता.. ??

वासुदेव फिर हंसे और बोले : जिस अस्थिर , विचलित , हिलते हुए पानी में आज तुम मछली का निशाना साधोगे, मैं, उस विचलित पानी में ‘ठहराव’ पैदा करूँगा !!

इस वृतान्त का सहारा लेकर मैं “हम-सबसे” ये कहने का प्रयास करना चाह रहा हूँ, कि, हम चाहे..

कितने..! ही निपुण क्यूँ ना हों, कितने..! ही बुद्धिमान क्यूँ ना हों, कितने..! ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों जायँ..!!

लेकिन हम ‘मानव’ स्वंय हर परिस्थिति के ऊपर नियंत्रण तो नहीँ रख सकते ना ….

हम सिर्फ एक निश्चित सीमा तक अपना ‘प्रयास’ रूपी कर्म कर सकते हैं, मग़र.. हमारे ‘कर्म’ की सीमा से आगे की बागडोर जो संभालता है उस “सुपर-पॉवर”(ईश्वर) के आगे हम नतमस्तक हैं और सदैव रहेंगे…यही नियति है।

राधे गोविंद..राधे गोविंद👍

122- “युगपुरुष”

देश के पूर्व प्रधानमंत्री

‘परम श्रद्धेय चौधरी चरण सिंह जी’ की इस वर्ष 29 मई यानी शनिवार को उनकी पुण्यतिथि पड़ रही है … 

मेरा एक सैद्धांतिक प्रधानमंत्री को कोटि कोटि नमन है..🙏

“युगपुरुष” उनके जीवन पर बनी एक बहुत ही महत्वपूर्ण लघु फिल्म है……  

यदि हमें अपने देश को समझना है, खेती और किसानों की समस्याओं को करीब से जानना है, तो हमें परम श्रद्धेय चौधरी चरण सिंह जी के जीवन से गम्भीरतापूर्वक रब-रु होना होगा। चीजों के बारे में उनके दर्शन को ठीक से समझना होगा…

इस फिल्म को बनाने का एक मात्र उद्देश्य पूरे देश के कोने कोने में, प्रत्येक घर में परम श्रद्धेय चौधरी साहब की जीवनी और उनकी फिलोसोफी को लोगों तक पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य है।

अधिक गहराई में न जाते हुए  आप सभी से अनुरोध है कि यदि हो सके, तो एक दूसरे को फ़िल्म का लिंक अवश्य Share करें..ताकि भारत के कोइनूर को सच्ची श्रद्धांजली के रुप में आज की पीढ़ी तक एक सच्चे जन-सेवक की कहानी पहुँच सके। उनके बारे में सूक्ष्म में यही कहा जा सकता है कि,

“जन्मे वही हैं.., जो काल से न हारते,  चुनौती मान ‘जन्म’ को “कर्म” से सँवारते..”कर्म” से सँवारते.. कर्म से सँवारते 🙏

नीचे फिल्म का लिंक दिया है यदि युगपुरुष को नजदीक से महसूस करने में रुचि रखते हों, तो उस पर क्लिक कर आप “युगपुरुष” नामक फ़िल्म तत्काल अभी देख सकते हो.. धन्यवाद👍 https://www.youtube.com/watch?v=U1IVAv58F_8&t=43s  धन्यवाद👍 आपका अपना पचहरा,युग

121-अड़चन..?

इतिहास के पन्नों को उलट कर देखिये, तो आप पाएंगे कि, हमेशा सत्तारूढ़ शासक पर तानाशाह,भ्रष्ट व पद के दुरुपयोग जैसे अनेकों आरोप लगते रहे हैं..जो एक सामान्य सी बात है। देश के महत्वपूर्ण पदों पर शायद दूध के धुले व्यक्तित्व बमुश्किल ही काविज हुए हैं और सौभाग्य से हो भी जाए, तो उसे स्वीकारा नहीं जाता है। मेरे ख़्याल से ये सब कुर्सी की खामियाँ होती हैं।

विद्वानों द्वारा बताया जाता है.. केवल श्री कृष्ण ही 16 कला यानि सोलह आना..पूर्ण रूप में भगवान थे। श्री राम 12 कलाओं के साथ अवतरित हुए थे। कहते हैं उनमें ईश्वरीय-तत्व कम था।

इस आधार पर देखें,तो आज के सामान्य से व्यक्ति से सही होने की उम्मीद कैसे लगाई जा सकती है..? वैसे इस तथ्य पर तुलनात्मक अध्ययन करें, तो वर्तमान शासक में राष्ट्र-भाव अन्य नेताओं से तो अधिक ही है।

क्या आपको पता है कि अनेकों महत्वपूर्ण मुद्दों पर देश का जिम्मेदार पद पी.एम., सी.एम. जो भी.. यदि निर्णय लेने में कतरा रहे हैं, तो उनके सामने क्या ‘अड़चन’ हैं..?

ऐसे में जिम्मेदार पद जो भी कर पा रहे हैं वे भी काबिल-ए-तारीफ़ ही है।

देश में मुस्लिम और क्रिश्चियन का कार्ड खेलने वाली कांग्रेस ने जो प्लेट-फॉर्म दिया है …! ये तो देश में आने वाली हर सरकार के लिए सदैव बहुत बड़ी चुनौती बना रहेगा..

ऐसे टॉप-सीक्रेट जानना मेरे ख़याल से हरेक भारतवासी का हक़ बनता है… आओ, जानें ..

देश में पुनः मनमोहन सरकार बनने के बाद👇

जनता पर मुस्लिम क्रिस्चियन आरक्षण का कहर ढाया गया..! जो देश की आम जनता को आजतक पता ही नहीं है।

देखिये..

राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद : 49 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 45 हिन्दू : 4

उप राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद : 7 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 7 हिन्दू : 00

मंत्रियो के कैबिनेट सचिव कुल पद : 20 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 19 हिन्दू : 1

प्रधानमंत्री कार्यालय मे कुल पद : 35 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 33 हिन्दू : 2

कृषि-सिचंन विभाग मे कुल पद : 274 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 259 हिन्दू : 15

रक्षा मंत्रालय मे कुल पद : 1379 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 1331 हिन्दू : 48

समाज-हैल्थ मंत्रालय कुल पद : 209 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 192 हिन्दू : 17

वित्त मंत्रालय मे कुल पद : 1008 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 952 हिन्दू : 56

ग्रह मंत्रालय मे कुल पद : 409 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 377 हिन्दू : 32

श्रम मंत्रालय मे कुल पद : 74 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 70 हिन्दू : 4

रसायन-पेट्रो मंत्रालय कुल पद:121 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 112 हिन्दू : 9

राज्यपाल-उपराज्यपाल कुल पद : 27 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 20 हिन्दू : 7

विदेश मे राजदूत : 140 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 130 हिन्दू : 10

विश्वविद्यालय के कुलपति पद : 108 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 88 हिन्दू : 20

प्रधान सचिव के पद : 26 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 20 हिन्दू : 6

हाइकोर्ट के न्यायाधीश : 330 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 326 हिन्दू : 4

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश : 23 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 20 हिन्दू : 03

IAS अधिकारी : 3600 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 3000 हिन्दू : 600

PTI कुल पद : 2700 मुस्लिम-क्रिस्चियन : 2400 हिन्दू : 300

1947 से अब तक किसी सरकार ने इस तरह से सविँधान को अनदेखा और उसका खुला उल्लंघन नहीं किया!

कॉंग्रेस की नजरों में तो,जैसे मुस्लीम से श्रेष्ठ, ईमानदार, योग्य, अनुभवी और मेहनती किसी दूसरी जातियों में हैं ही नहीं…!!

क्या ये सब कानून का उल्लंघन और सविँधान की खिलाफत नहीं थी,

मान्यवर ! वैसे तो आप बहुत समझदार हैं। इसीलिए मेरा विश्वास है कि आप समय रहते..सम्भल जाएंगे..

इन व्यक्तिगत लाभ-हानियों से उठकर आज देश को जिस नज़रिए से देश के नागरिकों को देखना चाहिए.. उसी से देखिये..

वरना! आज तो सही कामों के होने पर भी एक षडयंत्र के तहत दुष्प्रचार के हाथों मजबूर हम भटकाव में आकर जो मन में आता है..वर्तमान सत्ता के ख़िलाफ़ उलूल-जलूल कुछ भी कहते रहते हैं। हरपल एक ‘कराहट’ सी निकलती रहती है ..

अगर वक़्त रहते नहीं सम्भले, तो न केवल घर वार वल्कि जीवन भर इकठ्ठी की हुई सारी ताम-झाम तो छोड़नी ही होगी, वल्कि अपने बीबी-बच्चों की इज़्ज़त बचाने के लिए..भी एक दिन गिड़गिड़ाएंगे..

मग़र अफ़सोस उस समय हमारी कोई सुनने वाला तक न होगा!! आज जो तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों की परवाह करके कुछ कर रहा है, लेकिन वह तुम्हें ज़हर दिख रहा है..

लगभग सात दशकों से देश के नेताओं की तुष्टीकरण-नीति के तहत पनप रही साज़िसें व देश के ख़िलाफ़ योजनाबध्द तरीके से बढ़ाई जा रही मुस्लिम आबादी आदि की हकीकत जिस दिन जान जाओगे, अपनी बेहोशी से जाग जाओगे, तो..मेरा दावा है, आपके पैरों तले जमीन खिशक जायेगी..

अपने घर में बैठ कर आरोप लगाने में..अर्थात देश के वास्तविक हालात समझने में और देश के जिम्मेदार, चाहे छोटे या बड़े किसी भी पद पर बैठ कर उसके साथ ‘न्याय’ करने में.. जमीन आसमान का फर्क होता है। धन्यवाद