128-परीक्षा,प्रतीक्षा एवं समीक्षा..

वास्तव में ‘मानव-जीवन’ को शांतिपूर्ण तरीके से जीने के लिए हम सबका इन तीन शब्दों के साथ न्यायोचित व्यवहार लाजमी है।

1- ‘परीक्षा’ सांसारिक लोगों के व्यवहार की होनी चाहिए..

2-‘प्रतीक्षा’ परमात्मा की तरफ से होने वाली ईश्वरीय कृपा की.. ही की जानी चाहिए.. और

3-हमें समय-समय पर ‘समीक्षा’ ख़ुद की अवश्य करते रहना चाहिए।

ताकि हम अपने आपको दुनियाँ की अस्सी फ़ीसदी भटकी हुई बहुत बड़ी भीड़ से अलग रख पाने में कामयाब हो सकें।

वरना! ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की..’ वाली तर्ज पर

“ये सांसारी-लोग” किसी को भी शांति से जीने कहाँ देते हैं.. ?

मेरा आशय समझ रहे हो ना!..

जबकि, हम करते क्या हैं.. एकदम इसका उलट..

जैसे; हम लोग हरपल परमात्मा की परीक्षा, लेने की फ़िराक़ में रहते हैं..

प्रतीक्षा, सिर्फ अपने भौतिक-सुखों की करते हैं और किसी की नहीं..

और समीक्षा भी सदैव दूसरों की.. करते रहते हैं। अपनी कभी नहीं।

जो मेरे ख़्याल से निहायत ही..अर्थात सरा-सर ग़लत है। अब फ़ैसला आपके हाथ में है।आप अपने अन्तःकरण में झांकियेगा और देखिएगा कि, आप इन चीजों का अपने जीवन में कितना क्रियान्वयन कर पा रहे हैं….?

पढ़ने के लिए धन्यवाद👍

🙏🌹 राधे गोविंद🌹🙏

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