129- “सच्चा-सुख”

आपने कभी विचार किया है कि, जीवन का ‘सच्चा-सुख’ किस में है..? ये बहुत ही विचारणीय सवाल है।

“जिस प्रकार ‘पछतावा’ करते रहने से हमारा अतीत नहीं बदल सकता,

ठीक वैसे ही केवल ‘चिंता’ भी किसी का भविष्य नहीं संवार सकती।”

अगर ‘सच्चे-सुख’ की चाह रखते हो, तो “जब आँख खुली तभी सवेरा..” वाले सिद्धान्त से अपने विचारों और दैनिक क्रिया-कलापों में कमी जब-जब कमी पकड़ में आये तब-तब स्वतः सुधार करते रहो….

और जितना सम्भव हो सके, अपने आपको वर्तमान में ही रखो, अपने वर्तमान के हर पल को आनंद लेते हुए जीओ..

चाहे परिस्थिति विपरीत ही क्यों न हों…. क्योंकि मन सही तो सब सही।

किसी विद्वान ने बड़ा उचित लिखा है कि,”भविष्य भी उन्हीं का उज्ज्वल होता है जिनका वर्तमान साफ-सुथरा होता है।”

मेरे ख़्याल से जीवन का “सच्चा-सुख” भी शायद इसी गुत्थी में कहीं न कहीं उलझा हुआ है।

फ़ैसला आपके हाथ है कि, आप जीवन की गुत्थी को सुलझा कर ख़ुद पर लागू किस तरह कर पाते हैं..?

धन्यवाद👍

युग,पचहरा,नीमगाँव

🙏🌹 राधे गोविंद 🌹🙏

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