द्रौपदी के स्वयंवर में जाते समय “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहा, : हे पार्थ! तराजू पर पैर संभलकर रखना..अर्थात संतुलन बनाये रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो.. इस बात का तुम्हें खास खयाल रखना होगा, इस पर अर्जुन ने कहा :
“हे भगवन” सबकुछ अगर मुझे ही करना है , तो फिर आप क्या करोगे.. ??
वासुदेव हंसते हुए बोले : हे पार्थ , जो आप से नहीं होगा मैं वह करुंगा.?
पार्थ ने कहा : प्रभु! चलते-चलते ये भी बता दो, ऐसा क्या-क्या है जो मैं नहीं कर सकता.. ??
वासुदेव फिर हंसे और बोले : जिस अस्थिर , विचलित , हिलते हुए पानी में आज तुम मछली का निशाना साधोगे, मैं, उस विचलित पानी में ‘ठहराव’ पैदा करूँगा !!
इस वृतान्त का सहारा लेकर मैं “हम-सबसे” ये कहने का प्रयास करना चाह रहा हूँ, कि, हम चाहे..
कितने..! ही निपुण क्यूँ ना हों, कितने..! ही बुद्धिमान क्यूँ ना हों, कितने..! ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों जायँ..!!
लेकिन हम ‘मानव’ स्वंय हर परिस्थिति के ऊपर नियंत्रण तो नहीँ रख सकते ना ….
हम सिर्फ एक निश्चित सीमा तक अपना ‘प्रयास’ रूपी कर्म कर सकते हैं, मग़र.. हमारे ‘कर्म’ की सीमा से आगे की बागडोर जो संभालता है उस “सुपर-पॉवर”(ईश्वर) के आगे हम नतमस्तक हैं और सदैव रहेंगे…यही नियति है।
राधे गोविंद..राधे गोविंद👍
बिलकुल गुरु जी हमारी नाव(जीवन) ईश्वर ही पार करता है
राधे राधे गुरु जी
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Thanks
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