” ‘भाव’ बिना बाजार में, वस्तु मिले ना ‘मोल’
तो ‘भाव’ बिना “प्रभु” कैसे मिलें, जो हैं..विल्कुल ‘अनमोल’ “
“बातचीत”…. भी यूं तो एक शब्द ही है, पर ‘स्वस्थ-मानसिकता’ के साथ ‘सच्चे-भाव’ से ‘बातचीत’ की जाए, तो मेरा ऐसा अनुभव है कि, दिलों के वर्षों पुराने मैल भी धुल जाते हैं।
बशर्ते कि ‘बातचीत’ करने के लिए दोनों पक्षों का “भाव” एक समान हो..!! क्यों..?
धन्यवाद👍
योगेन्द्र सिंह पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा