120-“मानो या ना मानो”

👇 निश्चित ही, एक दिन महामारी का ये काल समाप्त तो होना ही है..

परन्तु तब..

क्या आप अपने आप से नजर मिला पायेंगे..?

विचार कीजियेगा..

प्लाज्मा थेरेपी, जिसे ‘कॉन्सलसेंट प्लाज्मा थेरेपी’ भी कहा जाता है, ऐसा मान लो कि, ये कोरोनावायरस को ठीक करने की एक प्रक्रिया है। इस उपचार में, एक व्यक्ति से निकाले गए रक्त का पीला तरल पदार्थ, कोविड -19 से ठीक हुए व्यक्ति से लिया जाता है। और इस तरल-पदार्थ को रोगी में इंजेक्ट किया जाता है, जो अभी भी कोरोना संक्रमण से पीड़ित है। प्लाज्मा कोविड -19 को ठीक करने में सहायक है,

क्योंकि इसमें एंटीबॉडीज होते हैं। जब आपका शरीर किसी संक्रमण से लड़ने में कामयाब होता है, तो यह एंटीबॉडीज पैदा करता है, जो प्लाज्मा में जमा होती हैं। कोविड-19 से ठीक हो चुके व्यक्ति के प्लाज्मा को इंजेक्ट करने से, कोरोना मरीज़ के “तेजी से ठीक’ होने की संभावना बढ़ जाती है।

समस्या यह है कि प्लाज्मा दवाइयों की कंपनी द्वारा नहीं बनाया जा सकता। यह पूर्ण रूप से प्राकृतिक स्वतः व्यक्ति के ब्लड में मग़र एक सीमित मात्रा में ही बनता है।

दरअसल, प्लाज्मा इंसान के खून का तरल हिस्सा है। यह 91 से 92% पानी से बना और हल्के पीले रंग का होता है। यह आपके खून का करीब 55% हिस्सा है, बचे हुए 45% में RBC- रेड ब्लड सेल्स, WBC- व्हाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स वगैरह होती हैं।

विशेष;-यह केवल इन्सान से ही इन्सान को उपलब्ध हो सकता है।

याद रखें, आप संक्रमण के दौरान भी ‘प्लाज्मा’ दान कर सकते हो। क्योंकि आपका शरीर अभी भी एंटीबॉडीज पैदा कर रहा है।

वैसे तो, “यूएस फूड & ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन” के अनुसार, दान करने का सबसे अच्छा समय संक्रमण से पूरी तरह से ठीक होने के दो सप्ताह बाद है।

लेकिन हां, यदि आप प्लाज्मा दान करना चाहते हैं, तो आपको इस बात का सबूत दिखाना होगा कि, आपको कोविड -19 हुआ था। 18 से लगभग 60 वर्ष की आयु का कोई भी व्यक्ति निःसन्देह ‘प्लाज्मा’ दान कर सकता है,

सिवाय इसके कि कैंसर, डाइबिटीज़,हाई-ब्लड प्रेशर आदि कोई अन्य बीमारी उसे न हो।

कल देर रात मैं यह सोचकर अधिक चिंतित हो गया कि ऐसे लोकप्रिय व्यक्ति जो सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं उन्हें यदि प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा है, तो बाकी सामान्य लोग जो अपने प्रियजनों का जीवन बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं, उन बेचारों का क्या होगा..?

और यह परिस्थिति क्यों है? क्यों प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा है..?

जबकि देश में करोड़ों लोग को-रोना से ठीक हो चुके हैं..? जो बिना किसी ख़ौप के ‘प्लाज्मा’ डोनेट कर सकते हैं।

मग़र मैं, फिर वही घिसा-पिटा सवाल अपने आप से करूँ, तो अच्छा नहीं लगेगा सच तो यही है कि,

भई, आज हममें ‘मानवता’ वाक़ई नहीं बची है। हम केवल दिखावे के लिए ही स्वयं दयालु, दानवीर की एक्टिंग करते रहते हैं,

जबकि असल में हम किसी की कोई सहायता नहीं करना चाहते, इनमें वह लोग भी शामिल हैं जो सोशल मीडिया के मेरे कुछ मित्रों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही निःस्वार्थ सेवा से ही लाभान्वित हुए हैं,

परन्तु अब वे स्वयं मदद नहीं करना चाहते हैं..?

जबकि ऊपर बड़े स्पष्ट तरीके से डॉक्टर्स की सलाह पर बताया जा चुका है कि प्लाज्मा दान करने से आपको जरा भी नुकसान नहीं होगा,

हाँ, किसी बेचारे की जान अवश्य बच जायेगी।

याद रखें, जो एकबार चला गया वह कभी लौटकर नहीं आता।

लेकिन आपके कार्य आपके सु-कृत्य हमेशा के लिए आपकी आत्मा पर अंकित अवश्य हो जाते हैं। और एक न एक दिन, आपके कर्म आपके सामने आकर आप से हिसाब भी मांगते हैं।

एक दिन जब आपके पुत्र/ नाती/ पोते बड़े हो जायेंगे और जब वे पूछेंगे आपसे कि, “महामारी काल” में जहाँ सारी दुनिया निःस्वार्थ रात-रात भर जागकर दूसरों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर, प्लाज्मा, वेंटिलेटर आदि की व्यवस्था करने में जुटी थी, तब आप क्या कर रहे थे?

दूसरों से मदद लेकर स्वयं स्वस्थ होने के बाद आप कायरों की तरह कहीं घर में तो, नहीं छिप गए थे?”

मैं अपने कई लेखों में बार-बार आगाह करता रहा हूँ कि यह महामारी की सुनामी बहुत कुछ छोड़कर जाने वाली है। यह कुछ लोगों के चेहरे पर योद्धाओं तथा मददगारों वाली चमक छोड़ जायेगी,

तो वहीँ.. कुछ लोगों के चेहरे पर कायर, स्वार्थी, मौकापरस्त होने की अमिट कालिख भी पोत के जायेगी।

चुनाव आपका है.. कि आप अपने आपको किस पाले में खड़ा…देखते हैं..?

“सर्वे भवन्तु सुखिनः”

कोई “मानो या ना मानो” आज का सत्य तो यही है 🙏

119-“चारपाई..”

!! सरवाइकल !! या अनेक बीमारियों का वाजिब कारण मेरा तात्पर्य सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों क्या लकड़ी चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं।

हाँ, चारपाई भी कोई सायंस नहीं है , लेकिन वह एक समझदारी है कि शरीर को स्वास्थ्य के साथ-साथ उचित आराम कैसे दिया जा सकता है..?

चारपाई बनाना एक कला जरूर है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम दोनों लगते हैं। जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है

; क्योंकि रात हो या दोपहर!! लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की वह झोली जैसी बनावट ही स्वास्थ लाभ पहुंचाती है।

मग़र कमर-दर्द वालों के लिए हार्ड-बेड आवश्यक है, तो उसकी जगह लकड़ी के तख़्त हुआ करते थे।

दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह झोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की झोली का था , लकड़ी का सपाट बनाकर आज उसका भी आकर बिगाड़ दिया गया है।

चारपाई पर सोने गर्दन,कमर और पीठ आदि का दर्द कभी नही होता है। जबकि दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है।

एक और बात डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है , उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं , वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है। खटिये को धूप में रखने से उसके जर्म्स आदि भी नहीं रहते हैं।

अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है । गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है । बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शरीर का Acupressure होता रहता है । गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही कुछ और है। ताज़ी हवा , बदलता मौसम, तारों की छाव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बान की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।

सस्ते प्लास्टिक की रस्सी और पट्टी आ गयी है, लेकिन वह सही नहीं है। स्वदेशी चारपाई के बदले हजारों रुपये की दवा और डॉक्टर का खर्च बचाया जा सकता है..! धन्यवाद

118-“पूर्व-संस्कार”

“एक मासूम की प्रार्थना” ❣️❣️

एक बच्चा लगभग रोज अपने नानू को सन्ध्या-वंदन करते देखता था। ये रोजाना देखने से मासूम के अन्तर्मन में शायद इसे एक दिन स्वयं करने का भाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा था, किन्तु अभी वो छोटा था..दूसरे उसके नानू की घर पर नियमित मौजूदगी से उसे ये अवसर मिल भी नहीं पा रहा था।

एक दिन उसके नानू को ‘पंचायत चुनाव’ की सरकारी ड्यूटी के काम से न केवल बाहर जाना पड़ा, वल्कि शाम को उन्हें अपने बूथ पर रुकना भी था…मासूम को जिसका इंतज़ार था सौभाग्य से शायद उसे वो मौका मिल गया..था।

मौके का लाभ उठाते हुए वह जैसा रोजाना देखता था,वैसे ही ‘संध्या-वंदन’ करना शुरू कर दिया… मग़र उसके नानू की ड्यूटी शहर के नज़दीक ही थी,दूसरे उनके नवराते चल रहे थे, तीसरे उनकी ड्यूटी ‘बाई द वे’ रिज़र्व-पार्टी में आ गयी थी..इन सब कारणों से वे ‘सन्ध्या-वंदन’ के लिए दस-पांच मिनट की देरी से अचानक घर पर पहुँच जाते हैं..

अब नानू ने अपने उस मासूम साथी को, जो धीरे-धीरे नानू के फ़ास्ट फ़्रेंड की जगह लेता जा रहा था, बेहद प्रेरणादायक रूप से संध्या-वंदन करते हुए पाया.. वे चुपके से देखते रहे.., बच्चा आल्ती-पालती लगाकर उनके ही एक अंगोछे से अपने आपको चकमुद उढ़ाकर.. जैसे उन्हें रोजाना देखता था.. लगभग वैसे ही एकाग्र सी मुद्रा में..मानो, ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर मानकर अपनी मासूम सी तोतली जुबान में बुद्-बुदाते हुए..कुछ कहने का प्रयास कर रहा हो.. पहले, उसने ‘भगवान जी की जय’ बोली..जय बोलने के बाद उसने अपनी भाषा में जो कहा उसका भाव कुछ इस प्रकार है…कि,

हे प्रभु! आप मेरे ‘नानी-नानू’ को सदैव स्वस्थ रखियेगा, ये दोनों मुझे बहुत प्यार करते हैं और टॉफी,चॉकलेट,चिप्स आइस-क्रीम,खिलौने..और भी बहुत सारी चीजें दिलाते हैं..

फिर आगे का भाव था ! भगवान जी मेरे सभी दोस्तों को अच्छा रखना, वरना मैं रोज़ाना किसके साथ खेलूंगा..?

और मेरे ‘मम्मी+पापा’ को तो एकदम से ठीक रखियेगा,आपके बाद वो ही तो मेरे ‘सबकुछ’ हैं। लेकिन “भगवान सबका ध्यान रखने से पहले आप अपना ख़ुद का ध्यान अवश्य रखियेगा” क्योंकि आपको कुछ हो गया,तो “हम सबका” क्या होगा..?

ज़ाहिर है, एक मासूम की इतनी सहज और सरल प्रार्थना सुनकर. खुशी से नानू की आंखें तो भर ही आनी थी.. क्योकि ऐसे अद्भुत संस्कार इतने छोटे व मासूम से बच्चे में उन्होंने अब से पहले न कभी देखे थे,और न कभी सुने ही थे।

शायद यही “पूर्व-संस्कार” होते हैं..एक हिंदी कहावत के अनुसार ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। धन्यवाद 👍

; युग, पचहरा, शिक्षक, जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस

117-“कसौटी”

क्या आप भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं..?

कि हमारा जीवन प्रतिक्षण “कसौटी” पर होता है.. “जिस क्षण जीवन रूपी बॉल सुख के पाले में है उस वक़्त हमारे अनुभवों के साथ-साथ ‘अहंकार’ की परीक्षा चल रही होती है..?

और यदि हमारे ही कर्मों के तकाज़े से बॉल कहीं दुर्भाग्यवश दु:ख के पाले में चली जाय, तो उस वक़्त भी हमारे अपने अनुभवों के साथ-साथ हमारा ‘धैर्य’ परीक्षा की घड़ी में होता है।

इसीलिए यहाँ, मेरा ऐसा मानना है कि, दोनों परीक्षाओं में अव्वल आने पर ही हमारे जीवन की “कसौटी” लगभग पूरी समझी जाती है।

तब कहीं हमारा जीवन लोगों की ज़ुबान में ‘सफल’ या ‘परफ़ेक्ट’ जैसी संज्ञा पाने का हक़दार होता है, शायद,उससे पहले नहीं!!

धन्यवाद👍

; YUG,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

🌹 नमस्कारं🌹 🙏

116-“हम और हमारे पूर्वज”

आपको मानना पड़ेगा कि, ‘हमारे पूर्वज’ वाक़ई बहुत ज्ञानी थे!!

कहीं न कहीं भूल ‘हम’ से ही हुई है उनको समझने में..?

आप याद कीजिये जब किसी की मृत्यु होती थी तब 13 दिन तक उस घर में आवागमन करने वाले अपने घर पहुंचने पर शुद्धिकरण का विशेष ख़याल रखते थे।

ये ‘सेनेटाइजेशन’ नहीं था, तो क्या था..?

दरअसल, मृत्यु किसी बीमारी से हो, या वृद्धावस्था के कारण उस वक्त शरीर लगभग तमाम रोगों का घर हो जाता है।

रोग हर जगह न फैलें इसलिए आज की भाषा में ‘हमारे पूर्वजों’ ने बड़े सोच-विचार कर 14 दिन के लिए उस पूरे परिवार के लिए ये ‘क्वॉरंटीन’ व्यवस्था ही तो बनाई थी।

जो ‘शव’ को मुखाग्नि देता था उसको तो पूरे 14 दिन सख़्त ‘आइसोलेशन’ का पालन करना ही होता था..उसे हम घर वाले भी छूने से बचते थे..

13 दिन तक उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे।

तेरहवें दिन हर तरह से स्वच्छ होने के पश्चात, पुनः सिर के बाल हटवाकर पूर्ण शुद्धिकरण के बाद ही वह फिर से ‘सामान्य-जीवन’ में प्रवेश कर पाता था।

लेकिन सच में देखा जाय, तो अभी हम न तो ‘वैचारिक’ तौर पर ‘आधुनिक’ हैं और न हीं अपने देश की पारम्परिक व्यवस्थाओं में पूरी तरह ‘संस्कारित’ हो पाए हैं।

शायद इसीलिए ऐसी शुद्ध-परम्पराओं को भी ‘दकियानूसी’ कह डालते हैं

हमने बस ‘पाश्चात्य-जगत’ की कुछ चीजों की नकल क्या करली है, उसी से हम अपने को फॉरवर्ड समझने लगे हैं..?

और हमने, अपने साथियों को ‘ब्लडी इंडियन्स’ कहकर अपने आपको महान समझने की खुशफ़हमी पाल रखी हैं..

हाँ, पुराने समय में ठीक उसी प्रकार जब मां बच्चे को जन्म देती थी तो जन्म के 11 दिन तक बच्चे व माँ को कोई नही छूता था ताकि ‘जच्चा-बच्चा’ किसी इन्फेक्शन के शिकार ना हों जाय, ये आज का ‘सेफ टू टच’ नहीं था तो क्या था..??

भले ही हम इस परम्परा को पुराने रीति-रिवाज, रूढ़िवादी या ढकोसला कह कर..पल्ला क्यों न झाड़ लें,

आप ग़ौर कीजियेगा…भारत के अधिकतर घरों में ‘हैड ऑफ द फैमिली’ की ‘भूमिका’..पर प्रश्न चिन्ह..? है।

क्योंकि उनकी दोहरी नीतियों की पराकाष्ठा.. ने तथा परिवार के शेष सदस्यों में उस नीति को ‘सहन’ न कर पाने की सामर्थ्य ने ही अधिकांश परिवारों को ‘एकल-व्यवस्था’ में धकेल दिया है। मेरे ख़्याल से इन व्यवस्थाओं को कम तवज्जो मिलने का ये भी एक बहुत बड़ा कारण है।

वरना,आज भी जब किसी के ‘शव-यात्रा’ से लोग आते हैं..तो घर में प्रवेश यूं ही नहीं मिलता..बाहर ही हाथ पैर धोकर या स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है,

इसको भी हम अन्यथा ही लेते हैं..

आज भी गांवों में कुछ घरों में ये परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं। जब कोई भी बहू-बेटी या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी-बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वहां देहली पर जल नहीं बहा देती।

मग़र, दुःख इस बात का है कि, हम झूठी आधुनिकता के नाम पर अपनी ‘भारतीय-संस्कृति’ का समय-समय पर अपमान करते रहते हैं।

पहले,किसी ‘संक्रमित-कार्य’ जैसे साफ-सफाई करने व गाँवों में घेर आदि में काम करने वाले अपने साथियों से उस वक्त तक स्पर्श नहीं होते थे, जब तक वह स्नान न कर लें..

मग़र आज लापरवाही में ये सब भी बेमानी सा हो गया है।

आज फिर से वही ‘क्वॉरंटीन’ ‘आइसोलेशन’ जैसी व्यवस्थाएं मानने को हमें मजबूर होना पड़ रहा है।

लेकिन हममें समझने की सामर्थ्य हो, तो सदैव से हमारे धर्म-शास्त्रों का आधार भी पूर्ण वैज्ञानिक है।

मग़र उन बातों को तो हम सब ने भुला दिया और ‘मानव-धर्म’ का अपमान करते चले जा रहे हैं।

आज यह उसी की परिणति है कि पूरा विश्व इससे जूझ रहा है। आप अपने बड़े-बुजुर्गों से पूछियेगा, जब वह बाहर निकलते थे तो उनकी माँ उनको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ रख दिया करतीं थीं। क्योंकि ये दोनों ही चीजें वैज्ञानिक दृष्टि से कीटाणु रोधी होती हैं।

शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें।

लेकिन ‘कोरी-आधुनिकतावादी’ लॉबी ने आज ये सब भुला दिया है..?

अरे भई! समझिए अपने शास्त्रों के स्तर को, जब हम ‘सब समझेंगे’ मेरा दावा है, तभी हमारी आने वाली पीढियां समझ पाएंगी,तब कहीं आप देश को विश्व गुरु की सीमा बन सकेगा.!!👍

🙏🙏🌹🌹🙏🙏😊👌

विशेष;- 😷 मास्क लगाए, घर पर रहें और न केवल अपने को, अपितु परिवार के हर सदस्य को ‘करोना’ नाम की महामारी से सुरक्षित रखें..👍

115-आख़िर क्यों..?

क्या आपको भी ऐसा ही लगता है..? कि,

इस दुनियाँ विच जिंदगी को सही आकार देने के लिए जिस प्रकार हमें संघर्ष करना होता है…!

ठीक वैसे ही जीवन को आसान एवं सरल तरीके से जीने के लिए उसे “समझना” और जरूरी है.!

अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो लालच के हाथों मजबूर.. दुनियाँ के लगभग अस्सी फ़ीसदी लोग अपने लालच की इस ‘अनियंत्रित और..और’ की रट में ईश्वर द्वारा दिए हुए ख़ूबसूरत ‘मानव-जीवन’ को एन्जॉय करने के बजाय ‘जीवन को ढ़ोने’ जैसी परिस्थितियों में फँसा लेते हैं।

दरअसल होता क्या है..,जो साथ जाना है.. उसे तो हम इग्नोर करते चले जाते हैं। और जो नश्वर है, क्षणभंगुर है, जो यहीं रह जाना है, उसे हम बड़े चाव से फेयर-अनफेयर हर तरीके से संजोने में लगे रहते हैं। और इसी में ‘मानव-जीवन’ के खूबसूरत पलों को खपा देते हैं..तभी इस सवाल को जगह मिलती है ..ऐसा

‘आख़िर क्यों..?’

शायद, हम लोग यदाकदा जीवन की सच्चाई को थोड़ा बहुत जान भी जाते हैं, तो भी वक़्त रहते हम उस रूप में ट्रांसफॉर्म नहीं हो पाते, जिस रूप में हमें तत्काल हो जाना चाहिए।

क्योंकि हमारे ज़हन में ‘और..और’ की रट अर्थात ‘लालच’ घर कर चुका होता है, जिससे हम अपनी “आदतों” को ही ठीक मानने को मजबूर रहते हैं। और शायद इसीलिए सब कुछ जानने-समझने के बाद भी हम अपने आपको सही रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाते..!

वैसे भी ट्रांसफॉर्म होने के लिए व्यक्ति में “विल पॉवर” का स्ट्रोंग होना बहुत आवश्यक है। मग़र ये गुण सामान्य नहीं, “बहुत..रेयर” है।

आप ही बताइये ! ये विडम्बना..है या नहीं !

चाहे ‘दो-क्षण’ के लिए ही सही इस ‘बिंदु’ पर अपने विवेक पूर्ण विचार से “आत्मचिन्तन” अवश्य कीजियेगा। 👍

; युग

🌹🙏🏻नमस्कार🙏🏻🌹

114-“Morality” can be theft..

Do You Know..? “Morality” Can be theft..!!!

जी हाँ, मेरा ऐसा मानना है कि, अच्छे विचार व व्यवहार-कुशलता की खूबसूरती अर्थात नैतिकता को, किसी से चुराया या अन्य से सीख लेकर अपने अनुसरण में लाया जाना कोई ग़लत नहीं है…!

क्योंकि चेहरे की खूबसूरती अर्थात शारीरिक सुन्दरता तो उम्र के साथ-साथ फ़ीकी होती ही है…!

दूसरी बात.. ‘शरीर’ की ‘क्षणभंगुरता’ की सत्यता को ध्यान में रखते हुए हरपल व्यवहारिक तौर पर हमें मानवता के सही फ्रेम में आ ही जाना चाहिए…

लेकिन आपके अच्छे विचार व व्यवहारिकता की खूबसूरती एक पहचान के रूप में आपके सम्पर्क में आये लोगों के हिर्दय में एक लम्बे वक्त (सदैव) तक बनी रहती है…!!

‘उसे’ किसी स्थिति या परिस्थिति में खोना उचित नहीं है।

दरअसल, व्यक्ति की पहचान ही परिवार, समाज व देश-दुनियाँ बिच उसकी ‘छवि’ का एक आधार बनती है। उसे बहुत तवज्जो देने की दरकार है।

वसुधैव कुटुम्बकम.. नमस्कार 🙏आप सबका दिन मंगलमय हो

धन्यवाद; Yug Pachahara, नीमगाँव,राया,मथुरा।

113-“ज़हर”

एकबार किसी ने चाणक्य से पूछा! ये ज़हर क्या होता है।

चाणक्य ने बहुत ही सुंदर जवाब दिया !!

दुनियाँ की हर वह चीज़ जो व्यक्ति की ज़िन्दगी में जरूरत से अधिक है ‘ज़हर’ है।

फिर चाहे वह ‘ताकत’ है, ‘धन’ है, ‘भूख’ है, ‘लालच’ है, ‘अभिमान’ है, ‘आलस’ है, ‘ ‘महत्वाकांक्षा’ है, ‘प्रेम’ है या फिर ‘घृणा’ है।

जरूरत से ज्यादा हर चीज़ ज़हर ही है।

अनुकरणीय विचार..

धन्यवाद👍

सत्यमेव जयते

112-“दो-टूक”

‘दो टूक’ यानि बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात अर्थात ‘खरी-बात’..को बोल देना।

एक बड़ा सवाल..?

आज लोगों द्वारा कॉरपोरेट को गाली देने का फ़ैशन सा बन गया है.. ?

शायद हम 800 साल ग़ुलाम इसीलिए भी रहे होंगे.. क्योंकि भारत ही नहीं दुनिया के हर समाज में कुछ तत्व ऐसे भी मौजूद रहते हैं..कि वे जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने की मानसिकता पाले हुए होते हैं !

●अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़रा अपनी नज़रें फैलाकर देखिएगा! आज जो भी देश महाशक्ति बने बैठे हैं उसमें काफ़ी योगदान उन देशों की कंपनियों का है। क्योंकि कंपनियाँ रेवेन्यू जेनरेट करके सरकारों को टैक्स के रूप में एक मोटी रकम देती हैं..और ये कंपनियाँ काफ़ी बड़े पैमाने पर वहां के युवाओं को रोज़गार भी देती हैं… जिससे सरकार पर बेरोजगारी का दबाव काफी हद तक कम हो जाता है। दूसरे उन कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी भी.. सरकार को टैक्स देते हैं…कम्पनियां देश के लिए कई तरीके से बहुत लाभकारी होती हैं।

जिससे सरकारें आर्थिक तौर पर मजबूत होती हैं। और देश में बड़े पैमाने पर विकास कार्य होते हैं… साथ ही मुफ्तवाली योजनाओं की फ़ंडिंग भी होती हैं। जो बहुत ही ज़रूरत मन्द लोगों जैसे; किसान-मजदूर व ग़रीबी रेखा के नीचे गुज़र-बसर कर रहे देश के नागरिकों के लिये की जातीं हैं।

● शायद आप जानते ही होंगे, कि दुनिया की एक प्रसिद्ध मैगज़ीन “फॉर्च्यून” हमेशां से एक सूची जारी करती आयी है… “Fortune-500” के नाम से.. इसमें दुनिया की टॉप 500 अमीर कंपनियों के नाम शामिल किये जाते हैं ।

इस सूची के अध्ययन से आपको पता चलता है कि जिस देश की जितनी कंपनियाँ इस सूची में हैं वह देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उतनी ही बड़ी महाशक्ति के रूप में उभर कर आता है.. जैसे वर्तमान में ‘फॉर्च्यून-500’ की सूची में..

नंबर वन पर ‘चीन’ रहा है जिसकी 124 कंपनियाँ फॉर्च्यून-500 में शामिल हैं…

नंबर टू पर अमेरिका है जिसकी 121 कंपनियाँ सूची में हैं..

68 कम्पनियों को लेकर नंबर थ्री पर जापान है।

● याद रखिए… भारत पर 100 साल राज किया था। वो भी एक कंपनी ही थी। जो ब्रिटेन की थी, जिसका नाम ‘ईस्ट इंडिया’ कम्पनी था।

ये भी एक कटु सत्य है कि, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने ही भारत जो सोने की चिड़िया कहा जाता था, भारत को लूट लूट कर ब्रिटेन को धनवान बना लिया।

अंग्रेजों की तो नहीं मग़र आज भी दुर्भाग्य से भारत अंग्रेजियत वाली मानसिकता की गिरफ्त में है आज के शासकों को ‘काले-अंग्रेज’ कह दिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

ये ‘देश-द्रोही’ नेता व कुछ ताइकून लॉबी अपना धन विदेशों में जमा करने में व्यस्त रहे हैं। जिससे देश की जड़ें लगातार खोखली की जाती रहीं हैं, चाहे सत्ता रूढ़ दल कोई भी क्यों न हों.. ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली कहावत इन मौका-परस्तों पर सही चरितार्थ होती है।

● दुर्भाग्य की बात ये है कि फार्च्यून-500 की लिस्ट में अभी भारत की गिनी चुनी दो चार कंपनियाँ ही हैं। और ये दो चार कंपनियाँ भी अपने देश के अंदर अपने युवक /युवतियों को नौकरियाँ जेनरेट करने और टैक्स देने के बावजूद भी गालियाँ खा रही हैं। ऐसे में जब स्वदेशी कंपनियों का ‘मनोबल’ ही गिरा दिया जाएगा तो देश में कंपनियाँ कैसे बढ़ेंगी..? फिर देश की तरक्की में कैसे अपना योगदान दे पायेंगी..?”

●आप जरा विचार कीजिए… आज हमारे देश की GDP 2.7 लाख करोड़ है लेकिन इससे ज्यादा बड़ा मार्केट तो अमेरिका की मात्र दो कंपनियों ‘एपल और माइक्रोसॉफ्ट’ का अकेले ही है। यानी जितना पैसा हम करोड़ों भारतीय मिलकर जेनरेट करते हैं उससे ज्यादा ये दो अमेरिकी कंपनियाँ ही कर देती हैं।

● अब आप ही देखिये जैसे देश में IT सेक्टर युवाओं के लिए लाखों नौकरियाँ जेनरेट करता है। तो क्या ये न्यायोचित है कि हम उसके मालिक ‘श्री नारायण मूर्ति’ जी को गालियाँ दें..?

लेकिन भारत के लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। ये बात अपनी जगह सोलह आने सत्य है।

इसीलिए अपना देश 800 साल गुलाम रहा। हम अक्सर देखते हैं कि लोग जिस कंपनी या जिस विभाग में काम करते हैं उसी को गालियाँ देते हैं।

● यदि हम सकारात्मक नज़रिए से देखें, अंबानी के जियो की वजह से डेटा और इंटरनेट इतना सस्ता हो गया है कि मोबाइल पर ही आज बहुत से युवा कई एक तरह के बिज़नेस कर रहे हैं।

जैसे; मैं भी “Word-Press” पर अपनी वेबसाइट रजिस्टर्ड कराने के बाद अपने आर्टिकल्स पब्लिश करके थोड़ी सी रॉयल्टी पा रहा हूँ।

अपने देश के विद्यार्थी सस्ते ‘डाटा-पैक’-की ही बदौलत लॉकडाउन में ऑनलाइन पढाई कर पा रहे हैं.. और तमाम सारे काम आज ऑनलाइन हो रहे हैं। लेकिन ये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि उसी सस्ते डेटा का इस्तेमाल करके कई लोग Twitter पर Trend करवाते हैं… boycott Ambani..

हैं ना ये बात शर्मनाक !!

● वास्तव में ये भारतीयों की एक मूल समस्या “ईर्ष्या” के ही कारण है। अपने देश के लोगों का मानसिक स्तर आज इतना गिर गया है कि, ज्यादातर लोग अपने सगे भाई की तरक्की को भी कम ही बर्दाश्त कर पाते हैं। बताओ! फिर ऐसे लोग पराऐ की तरक़्क़ी को कैसे सहन करेंगे..?

● रिलायंस इंडस्ट्री ₹ 67,000 करोड़ सिर्फ GST के रूप में देश को देती है, क्या वह कोई पाप कर रही है..? ऐसे ही टैक्सेस के दम पर प्रधानमंत्री देश में ग़रीबों के लिए सब्सिडी वाली योजनाएँ चला पाते हैं। और

● अगर आपके इस ग़लत रवैये से ये कंपनियाँ बंद हो जाएँगी तो ये सब्सिडी वाली योजनाएं भी बंद नहीं हो जाएगी क्या..?

● सुझाव;- हमें इन कंपनियों की तरक्की से सीखना चाहिए ना कि उन्हें गालियाँ देनी चाहिए। दूसरे व्यक्तिगत लाभ की सोच से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने देश की क्या स्थिति है..? क्या होनी चाहिए..? ज़रा विचार करना होगा..

जैसे; “इंडिया-गेट” कंपनी चावल की एक बड़ी ‘वर्ल्ड-कंपनी’ है। ये कंपनी पाकिस्तान से आए दो हिंदू शरणार्थी भाइयों ने शुरू की थी। तो हमें इन कंपनियों के मालिकों की मेहनत का सम्मान करना चाहिये ना कि उन्हें गालियाँ देनी चाहिए।

इसी तरह MDH वाले धर्मपाल गुलाटी.. पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आए थे… साइकिल पर मसाले बेचते थे। आज उनकी कंपनी दुनिया में मसाले एक्सपोर्ट करती है। हजारों लोगों को नौकरियाँ देती हैं। रेवेन्यू जेनरेट करके टैक्स के द्वारा सरकार का ख़ज़ाना भी भरती है।

इसी तरह बिना कुछ जाने समझे हम लोग अक्सर अडानी को भी गालियाँ देते रहते हैं। जबकि अडानी की सोलर कंपनी…दुनिया की सबसे बड़ी सोलर कंपनियों में शुमार है। ये कंपनी भी देश को प़ॉल्युशन फ्री बना रही है… देश के लाखों युवाओं को नौकरियाँ दे रही है… टैक्स जेनरेट करती है। तो क्या ये इन लोगों की गलतियां हैं.. ?

हमें, अपनी अज्ञानता के कारण दूसरों के स्वस्थ-योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए!!!

ये भी मैं, जानता हूँ कि, आप करेंगे.. तो वही,जो आपको करना है..

मग़र दोस्तो! राजनीति से हटकर समाज में नेताओं के कुछ पालतू ठेकेदारों की बर्गलाहट में न आ कर.. इस विषय पर एकबार ख़ुद के विवेकपूर्ण विचारों के आधार पर अपने अन्तःकरण से पूछियेगा..तब सोचिएगा… 👍 राधे गोविंद 🙏

विचारक ; YUG,पचहरा

111-“सम्बन्ध”

आध्यात्मिक दृष्टि से प्रत्येक जीवात्मा का ‘सम्बन्ध’ परम् पिता परमात्मा के साथ भी तो ‘विश्वास’ की बुनियाद पर ही टिका है। जो पूर्ण भावनात्मक है।

ठीक वैसे ही सांसारिक रिश्तों में ‘सम्बन्ध-निर्वहन’ के लिए ये “विश्वास” ही एकमात्र विकल्प है।

वेद-शास्त्रों के अनुसार संसार में ‘पति-पत्नी’ का “सम्बन्ध” सबसे ‘बड़ा-सम्बंध’ माना गया है। और माना क्या गया है, दरअसल ‘है भी’..ये सर्वमान्य है।

क्योंकि पूरे संसार में यही एक रिश्ता है, जो अपने बंधु-बांधवों के सम्मुख सर्व सम्मति से अग्नि को साक्षी मानकर ‘सात-वचन’ लेकर जोड़ा जाता है।

जबकि, अन्य ‘सम्बन्ध’ भारत में पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा मात्र हैं। हालांकि इनके साथ भी अपनी ‘सहनशक्ति’ से जितना सामंजस्य बिठाया जा सके अवश्य बिठाना चाहिए।

कायदे से ‘पति-पत्नी’ दोनों उसी वक़्त ‘भावनात्मक’ रूप से आपस में ‘अर्धांग’ बन जाते हैं। अर्धांग से मेरा मतलव वे लोग (वर-वधू) एक दूसरे की ‘अच्छाई-बुराई’ दोनों को स्वीकारते हुए अपने विवेकपूर्ण-विचारों द्वारा आपस में उचित सामंजस्य बिठा कर परिवार के अन्य सभी सदस्यों को विश्वास में लेकर अपने ‘गृहस्थ-जीवन’ में आगे बढ़ने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं।

विश्वास की मजबूती के लिए हम देवी-देवताओं के दाम्पत्य जीवन से लेकर अपने आस-पास सांसारिक अच्छे ‘पति-पत्नी’ या दम्पतियों (जोड़ों) से भी प्रेरणा ले सकते हैं

हर बार तो नहीं मग़र कई बार अपने साथी की कमियों को इग्नोर करने से भी दोषों का दमन एवं नए-नए गुणों का उदय होता है,जो जीवन को आनंददायक बनाता है।

“सम्बन्ध-निर्वहन” के लिहाज़ से न केवल ‘पति-पत्नी’ के ही रिश्तों में “विश्वास” का अहम रोल है, अपितु हर रिश्ते में “विश्वास” जरूरी है।

लेकिन “विश्वास” करने के सम्बंध में इस तथ्य की गंभीरता भी जान लीजियेगा।

जीवन में किसी पर विश्वास करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति अपने आप से ये अवश्य पूछ ले..? कि, वह ‘विश्वास’ कर किसका रहा है..?

किसी ‘अच्छी-सोच’ का या फिर किसी रिश्ते या पद के वर्चस्व का..?

किसी भी “सम्बन्ध” को खूबसूरती से निभाने के लिए मेरे ख़्याल से तो, ‘विश्वास’ ही एक आवश्यक फैक्टर है।

कोई भी मजबूत रस्सी अमूमन तीन डोरियों के आपस में अच्छी तरह बटने या लिपटने से बनती है।

मैं, ‘रस्सी’ की तीन डोरियों के उदाहरण द्वारा सरलीकरण करते हुए इस प्रकरण को ठीक से समझने का एक प्रयास कर रहा हूँ..

जिस प्रकार वे तीन डोरियाँ आपस में लिपटी हुई रह कर रस्सी की ताकत बनती हैं।

ठीक वैसे ही ‘रिलेशनशिप’ या किसी भी ‘सम्बन्ध’ के मामले में हर रिश्ते, में भी एक अटूट ‘विश्वास’ होता है। ‘रस्सी की तीन डोरियों’ की तरह इंसान की तीन प्रतिक्रियाओं को जानना और समझना नितान्त आवश्यक है।

1-आपकी ‘मुस्कान’ के पीछे छुपी हुई : आपकी पीड़ा।,

2-आपकी ‘गुस्सा’ के पीछे छुपा हुआ : आपका प्रेम।,

3-आपके ‘मोन’ के पीछे छुपी हुई; आपके शब्दों की वह ज्वालामुखी, जो परिवार,समाज या देश-दुनियाँ के बीच ‘सौहार्द’ बनाये रखने के लिए आवश्यक है।

जो व्यक्ति आपकी ये तीन बातें 1-मुस्कान,

2-गुस्सा, व

3-मोन

जैसी; प्रतिक्रियाओं की गहराई समझ लेता है, वह आपकी हर ‘स्थिति-परिस्थिति में सदैव आपके साथ खड़ा रहता है..! चाहे अमुक व्यक्ति उसकी अहमियत समझे या न समझे!

वह रिश्ते में बेटा,बेटी माता-पिता,भाई-बहन, भतीजे-भतीजी ‘पति-पत्नी’आदि में से ‘सम्बन्धों’ के आधार पर चाहे कोई भी हों..

क्योंकि जिसका सम्बन्ध ‘विश्वास’ की नींव पर टिका है। वो यूं ही नहीं डगमगाएगा।

मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर एक बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि, यदि हम ऊपर बताए गए मानकों पर चलें, तो हम जीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी खाई को भी पार कर जाते हैं।

जब आपको इन सांसारिक रिश्तों या सम्बन्धों को सादने के लिए इन सांसारिक लोगों पर ‘भरोसा’ करना आ जाता है, तो आप देखेंगे कि अपने इस अभ्यास से स्वतः ही धीरे-धीरे परम् पिता परमात्मा के साथ एक “अटूट-सम्बन्ध” बनाने में भी सक्षम हो जाते हैं। जो आपको जीवन में परम् आनन्द प्रदान करता है।

अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो ‘मनुष्य-जीवन’ का ध्येय भी यही है।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः….”

‘बड़ी सोच का बड़ा जादू’

वसुधैव कुटुम्बकम..

धन्यवाद

विचारक;

युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।