115-आख़िर क्यों..?

क्या आपको भी ऐसा ही लगता है..? कि,

इस दुनियाँ विच जिंदगी को सही आकार देने के लिए जिस प्रकार हमें संघर्ष करना होता है…!

ठीक वैसे ही जीवन को आसान एवं सरल तरीके से जीने के लिए उसे “समझना” और जरूरी है.!

अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो लालच के हाथों मजबूर.. दुनियाँ के लगभग अस्सी फ़ीसदी लोग अपने लालच की इस ‘अनियंत्रित और..और’ की रट में ईश्वर द्वारा दिए हुए ख़ूबसूरत ‘मानव-जीवन’ को एन्जॉय करने के बजाय ‘जीवन को ढ़ोने’ जैसी परिस्थितियों में फँसा लेते हैं।

दरअसल होता क्या है..,जो साथ जाना है.. उसे तो हम इग्नोर करते चले जाते हैं। और जो नश्वर है, क्षणभंगुर है, जो यहीं रह जाना है, उसे हम बड़े चाव से फेयर-अनफेयर हर तरीके से संजोने में लगे रहते हैं। और इसी में ‘मानव-जीवन’ के खूबसूरत पलों को खपा देते हैं..तभी इस सवाल को जगह मिलती है ..ऐसा

‘आख़िर क्यों..?’

शायद, हम लोग यदाकदा जीवन की सच्चाई को थोड़ा बहुत जान भी जाते हैं, तो भी वक़्त रहते हम उस रूप में ट्रांसफॉर्म नहीं हो पाते, जिस रूप में हमें तत्काल हो जाना चाहिए।

क्योंकि हमारे ज़हन में ‘और..और’ की रट अर्थात ‘लालच’ घर कर चुका होता है, जिससे हम अपनी “आदतों” को ही ठीक मानने को मजबूर रहते हैं। और शायद इसीलिए सब कुछ जानने-समझने के बाद भी हम अपने आपको सही रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाते..!

वैसे भी ट्रांसफॉर्म होने के लिए व्यक्ति में “विल पॉवर” का स्ट्रोंग होना बहुत आवश्यक है। मग़र ये गुण सामान्य नहीं, “बहुत..रेयर” है।

आप ही बताइये ! ये विडम्बना..है या नहीं !

चाहे ‘दो-क्षण’ के लिए ही सही इस ‘बिंदु’ पर अपने विवेक पूर्ण विचार से “आत्मचिन्तन” अवश्य कीजियेगा। 👍

; युग

🌹🙏🏻नमस्कार🙏🏻🌹

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