आध्यात्मिक दृष्टि से प्रत्येक जीवात्मा का ‘सम्बन्ध’ परम् पिता परमात्मा के साथ भी तो ‘विश्वास’ की बुनियाद पर ही टिका है। जो पूर्ण भावनात्मक है।
ठीक वैसे ही सांसारिक रिश्तों में ‘सम्बन्ध-निर्वहन’ के लिए ये “विश्वास” ही एकमात्र विकल्प है।
वेद-शास्त्रों के अनुसार संसार में ‘पति-पत्नी’ का “सम्बन्ध” सबसे ‘बड़ा-सम्बंध’ माना गया है। और माना क्या गया है, दरअसल ‘है भी’..ये सर्वमान्य है।
क्योंकि पूरे संसार में यही एक रिश्ता है, जो अपने बंधु-बांधवों के सम्मुख सर्व सम्मति से अग्नि को साक्षी मानकर ‘सात-वचन’ लेकर जोड़ा जाता है।
जबकि, अन्य ‘सम्बन्ध’ भारत में पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा मात्र हैं। हालांकि इनके साथ भी अपनी ‘सहनशक्ति’ से जितना सामंजस्य बिठाया जा सके अवश्य बिठाना चाहिए।
कायदे से ‘पति-पत्नी’ दोनों उसी वक़्त ‘भावनात्मक’ रूप से आपस में ‘अर्धांग’ बन जाते हैं। अर्धांग से मेरा मतलव वे लोग (वर-वधू) एक दूसरे की ‘अच्छाई-बुराई’ दोनों को स्वीकारते हुए अपने विवेकपूर्ण-विचारों द्वारा आपस में उचित सामंजस्य बिठा कर परिवार के अन्य सभी सदस्यों को विश्वास में लेकर अपने ‘गृहस्थ-जीवन’ में आगे बढ़ने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं।
विश्वास की मजबूती के लिए हम देवी-देवताओं के दाम्पत्य जीवन से लेकर अपने आस-पास सांसारिक अच्छे ‘पति-पत्नी’ या दम्पतियों (जोड़ों) से भी प्रेरणा ले सकते हैं
हर बार तो नहीं मग़र कई बार अपने साथी की कमियों को इग्नोर करने से भी दोषों का दमन एवं नए-नए गुणों का उदय होता है,जो जीवन को आनंददायक बनाता है।
“सम्बन्ध-निर्वहन” के लिहाज़ से न केवल ‘पति-पत्नी’ के ही रिश्तों में “विश्वास” का अहम रोल है, अपितु हर रिश्ते में “विश्वास” जरूरी है।
लेकिन “विश्वास” करने के सम्बंध में इस तथ्य की गंभीरता भी जान लीजियेगा।
जीवन में किसी पर विश्वास करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति अपने आप से ये अवश्य पूछ ले..? कि, वह ‘विश्वास’ कर किसका रहा है..?
किसी ‘अच्छी-सोच’ का या फिर किसी रिश्ते या पद के वर्चस्व का..?
किसी भी “सम्बन्ध” को खूबसूरती से निभाने के लिए मेरे ख़्याल से तो, ‘विश्वास’ ही एक आवश्यक फैक्टर है।
कोई भी मजबूत रस्सी अमूमन तीन डोरियों के आपस में अच्छी तरह बटने या लिपटने से बनती है।
मैं, ‘रस्सी’ की तीन डोरियों के उदाहरण द्वारा सरलीकरण करते हुए इस प्रकरण को ठीक से समझने का एक प्रयास कर रहा हूँ..
जिस प्रकार वे तीन डोरियाँ आपस में लिपटी हुई रह कर रस्सी की ताकत बनती हैं।
ठीक वैसे ही ‘रिलेशनशिप’ या किसी भी ‘सम्बन्ध’ के मामले में हर रिश्ते, में भी एक अटूट ‘विश्वास’ होता है। ‘रस्सी की तीन डोरियों’ की तरह इंसान की तीन प्रतिक्रियाओं को जानना और समझना नितान्त आवश्यक है।
1-आपकी ‘मुस्कान’ के पीछे छुपी हुई : आपकी पीड़ा।,
2-आपकी ‘गुस्सा’ के पीछे छुपा हुआ : आपका प्रेम।,
3-आपके ‘मोन’ के पीछे छुपी हुई; आपके शब्दों की वह ज्वालामुखी, जो परिवार,समाज या देश-दुनियाँ के बीच ‘सौहार्द’ बनाये रखने के लिए आवश्यक है।
जो व्यक्ति आपकी ये तीन बातें 1-मुस्कान,
2-गुस्सा, व
3-मोन
जैसी; प्रतिक्रियाओं की गहराई समझ लेता है, वह आपकी हर ‘स्थिति-परिस्थिति में सदैव आपके साथ खड़ा रहता है..! चाहे अमुक व्यक्ति उसकी अहमियत समझे या न समझे!
वह रिश्ते में बेटा,बेटी माता-पिता,भाई-बहन, भतीजे-भतीजी ‘पति-पत्नी’आदि में से ‘सम्बन्धों’ के आधार पर चाहे कोई भी हों..
क्योंकि जिसका सम्बन्ध ‘विश्वास’ की नींव पर टिका है। वो यूं ही नहीं डगमगाएगा।
मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर एक बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि, यदि हम ऊपर बताए गए मानकों पर चलें, तो हम जीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी खाई को भी पार कर जाते हैं।
जब आपको इन सांसारिक रिश्तों या सम्बन्धों को सादने के लिए इन सांसारिक लोगों पर ‘भरोसा’ करना आ जाता है, तो आप देखेंगे कि अपने इस अभ्यास से स्वतः ही धीरे-धीरे परम् पिता परमात्मा के साथ एक “अटूट-सम्बन्ध” बनाने में भी सक्षम हो जाते हैं। जो आपको जीवन में परम् आनन्द प्रदान करता है।
अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो ‘मनुष्य-जीवन’ का ध्येय भी यही है।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः….”
‘बड़ी सोच का बड़ा जादू’
वसुधैव कुटुम्बकम..
धन्यवाद
विचारक;
युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।