👇 निश्चित ही, एक दिन महामारी का ये काल समाप्त तो होना ही है..
परन्तु तब..
क्या आप अपने आप से नजर मिला पायेंगे..?
विचार कीजियेगा..
प्लाज्मा थेरेपी, जिसे ‘कॉन्सलसेंट प्लाज्मा थेरेपी’ भी कहा जाता है, ऐसा मान लो कि, ये कोरोनावायरस को ठीक करने की एक प्रक्रिया है। इस उपचार में, एक व्यक्ति से निकाले गए रक्त का पीला तरल पदार्थ, कोविड -19 से ठीक हुए व्यक्ति से लिया जाता है। और इस तरल-पदार्थ को रोगी में इंजेक्ट किया जाता है, जो अभी भी कोरोना संक्रमण से पीड़ित है। प्लाज्मा कोविड -19 को ठीक करने में सहायक है,
क्योंकि इसमें एंटीबॉडीज होते हैं। जब आपका शरीर किसी संक्रमण से लड़ने में कामयाब होता है, तो यह एंटीबॉडीज पैदा करता है, जो प्लाज्मा में जमा होती हैं। कोविड-19 से ठीक हो चुके व्यक्ति के प्लाज्मा को इंजेक्ट करने से, कोरोना मरीज़ के “तेजी से ठीक’ होने की संभावना बढ़ जाती है।
समस्या यह है कि प्लाज्मा दवाइयों की कंपनी द्वारा नहीं बनाया जा सकता। यह पूर्ण रूप से प्राकृतिक स्वतः व्यक्ति के ब्लड में मग़र एक सीमित मात्रा में ही बनता है।
दरअसल, प्लाज्मा इंसान के खून का तरल हिस्सा है। यह 91 से 92% पानी से बना और हल्के पीले रंग का होता है। यह आपके खून का करीब 55% हिस्सा है, बचे हुए 45% में RBC- रेड ब्लड सेल्स, WBC- व्हाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स वगैरह होती हैं।
विशेष;-यह केवल इन्सान से ही इन्सान को उपलब्ध हो सकता है।
याद रखें, आप संक्रमण के दौरान भी ‘प्लाज्मा’ दान कर सकते हो। क्योंकि आपका शरीर अभी भी एंटीबॉडीज पैदा कर रहा है।
वैसे तो, “यूएस फूड & ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन” के अनुसार, दान करने का सबसे अच्छा समय संक्रमण से पूरी तरह से ठीक होने के दो सप्ताह बाद है।
लेकिन हां, यदि आप प्लाज्मा दान करना चाहते हैं, तो आपको इस बात का सबूत दिखाना होगा कि, आपको कोविड -19 हुआ था। 18 से लगभग 60 वर्ष की आयु का कोई भी व्यक्ति निःसन्देह ‘प्लाज्मा’ दान कर सकता है,
सिवाय इसके कि कैंसर, डाइबिटीज़,हाई-ब्लड प्रेशर आदि कोई अन्य बीमारी उसे न हो।
कल देर रात मैं यह सोचकर अधिक चिंतित हो गया कि ऐसे लोकप्रिय व्यक्ति जो सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं उन्हें यदि प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा है, तो बाकी सामान्य लोग जो अपने प्रियजनों का जीवन बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं, उन बेचारों का क्या होगा..?
और यह परिस्थिति क्यों है? क्यों प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा है..?
जबकि देश में करोड़ों लोग को-रोना से ठीक हो चुके हैं..? जो बिना किसी ख़ौप के ‘प्लाज्मा’ डोनेट कर सकते हैं।
मग़र मैं, फिर वही घिसा-पिटा सवाल अपने आप से करूँ, तो अच्छा नहीं लगेगा सच तो यही है कि,
भई, आज हममें ‘मानवता’ वाक़ई नहीं बची है। हम केवल दिखावे के लिए ही स्वयं दयालु, दानवीर की एक्टिंग करते रहते हैं,
जबकि असल में हम किसी की कोई सहायता नहीं करना चाहते, इनमें वह लोग भी शामिल हैं जो सोशल मीडिया के मेरे कुछ मित्रों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही निःस्वार्थ सेवा से ही लाभान्वित हुए हैं,
परन्तु अब वे स्वयं मदद नहीं करना चाहते हैं..?
जबकि ऊपर बड़े स्पष्ट तरीके से डॉक्टर्स की सलाह पर बताया जा चुका है कि प्लाज्मा दान करने से आपको जरा भी नुकसान नहीं होगा,
हाँ, किसी बेचारे की जान अवश्य बच जायेगी।
याद रखें, जो एकबार चला गया वह कभी लौटकर नहीं आता।
लेकिन आपके कार्य आपके सु-कृत्य हमेशा के लिए आपकी आत्मा पर अंकित अवश्य हो जाते हैं। और एक न एक दिन, आपके कर्म आपके सामने आकर आप से हिसाब भी मांगते हैं।
एक दिन जब आपके पुत्र/ नाती/ पोते बड़े हो जायेंगे और जब वे पूछेंगे आपसे कि, “महामारी काल” में जहाँ सारी दुनिया निःस्वार्थ रात-रात भर जागकर दूसरों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर, प्लाज्मा, वेंटिलेटर आदि की व्यवस्था करने में जुटी थी, तब आप क्या कर रहे थे?
दूसरों से मदद लेकर स्वयं स्वस्थ होने के बाद आप कायरों की तरह कहीं घर में तो, नहीं छिप गए थे?”
मैं अपने कई लेखों में बार-बार आगाह करता रहा हूँ कि यह महामारी की सुनामी बहुत कुछ छोड़कर जाने वाली है। यह कुछ लोगों के चेहरे पर योद्धाओं तथा मददगारों वाली चमक छोड़ जायेगी,
तो वहीँ.. कुछ लोगों के चेहरे पर कायर, स्वार्थी, मौकापरस्त होने की अमिट कालिख भी पोत के जायेगी।
चुनाव आपका है.. कि आप अपने आपको किस पाले में खड़ा…देखते हैं..?
“सर्वे भवन्तु सुखिनः”
कोई “मानो या ना मानो” आज का सत्य तो यही है 🙏