आपको मानना पड़ेगा कि, ‘हमारे पूर्वज’ वाक़ई बहुत ज्ञानी थे!!
कहीं न कहीं भूल ‘हम’ से ही हुई है उनको समझने में..?
आप याद कीजिये जब किसी की मृत्यु होती थी तब 13 दिन तक उस घर में आवागमन करने वाले अपने घर पहुंचने पर शुद्धिकरण का विशेष ख़याल रखते थे।
ये ‘सेनेटाइजेशन’ नहीं था, तो क्या था..?
दरअसल, मृत्यु किसी बीमारी से हो, या वृद्धावस्था के कारण उस वक्त शरीर लगभग तमाम रोगों का घर हो जाता है।
रोग हर जगह न फैलें इसलिए आज की भाषा में ‘हमारे पूर्वजों’ ने बड़े सोच-विचार कर 14 दिन के लिए उस पूरे परिवार के लिए ये ‘क्वॉरंटीन’ व्यवस्था ही तो बनाई थी।
जो ‘शव’ को मुखाग्नि देता था उसको तो पूरे 14 दिन सख़्त ‘आइसोलेशन’ का पालन करना ही होता था..उसे हम घर वाले भी छूने से बचते थे..
13 दिन तक उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे।
तेरहवें दिन हर तरह से स्वच्छ होने के पश्चात, पुनः सिर के बाल हटवाकर पूर्ण शुद्धिकरण के बाद ही वह फिर से ‘सामान्य-जीवन’ में प्रवेश कर पाता था।
लेकिन सच में देखा जाय, तो अभी हम न तो ‘वैचारिक’ तौर पर ‘आधुनिक’ हैं और न हीं अपने देश की पारम्परिक व्यवस्थाओं में पूरी तरह ‘संस्कारित’ हो पाए हैं।
शायद इसीलिए ऐसी शुद्ध-परम्पराओं को भी ‘दकियानूसी’ कह डालते हैं
हमने बस ‘पाश्चात्य-जगत’ की कुछ चीजों की नकल क्या करली है, उसी से हम अपने को फॉरवर्ड समझने लगे हैं..?
और हमने, अपने साथियों को ‘ब्लडी इंडियन्स’ कहकर अपने आपको महान समझने की खुशफ़हमी पाल रखी हैं..
हाँ, पुराने समय में ठीक उसी प्रकार जब मां बच्चे को जन्म देती थी तो जन्म के 11 दिन तक बच्चे व माँ को कोई नही छूता था ताकि ‘जच्चा-बच्चा’ किसी इन्फेक्शन के शिकार ना हों जाय, ये आज का ‘सेफ टू टच’ नहीं था तो क्या था..??
भले ही हम इस परम्परा को पुराने रीति-रिवाज, रूढ़िवादी या ढकोसला कह कर..पल्ला क्यों न झाड़ लें,
आप ग़ौर कीजियेगा…भारत के अधिकतर घरों में ‘हैड ऑफ द फैमिली’ की ‘भूमिका’..पर प्रश्न चिन्ह..? है।
क्योंकि उनकी दोहरी नीतियों की पराकाष्ठा.. ने तथा परिवार के शेष सदस्यों में उस नीति को ‘सहन’ न कर पाने की सामर्थ्य ने ही अधिकांश परिवारों को ‘एकल-व्यवस्था’ में धकेल दिया है। मेरे ख़्याल से इन व्यवस्थाओं को कम तवज्जो मिलने का ये भी एक बहुत बड़ा कारण है।
वरना,आज भी जब किसी के ‘शव-यात्रा’ से लोग आते हैं..तो घर में प्रवेश यूं ही नहीं मिलता..बाहर ही हाथ पैर धोकर या स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है,
इसको भी हम अन्यथा ही लेते हैं..
आज भी गांवों में कुछ घरों में ये परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं। जब कोई भी बहू-बेटी या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी-बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वहां देहली पर जल नहीं बहा देती।
मग़र, दुःख इस बात का है कि, हम झूठी आधुनिकता के नाम पर अपनी ‘भारतीय-संस्कृति’ का समय-समय पर अपमान करते रहते हैं।
पहले,किसी ‘संक्रमित-कार्य’ जैसे साफ-सफाई करने व गाँवों में घेर आदि में काम करने वाले अपने साथियों से उस वक्त तक स्पर्श नहीं होते थे, जब तक वह स्नान न कर लें..
मग़र आज लापरवाही में ये सब भी बेमानी सा हो गया है।
आज फिर से वही ‘क्वॉरंटीन’ ‘आइसोलेशन’ जैसी व्यवस्थाएं मानने को हमें मजबूर होना पड़ रहा है।
लेकिन हममें समझने की सामर्थ्य हो, तो सदैव से हमारे धर्म-शास्त्रों का आधार भी पूर्ण वैज्ञानिक है।
मग़र उन बातों को तो हम सब ने भुला दिया और ‘मानव-धर्म’ का अपमान करते चले जा रहे हैं।
आज यह उसी की परिणति है कि पूरा विश्व इससे जूझ रहा है। आप अपने बड़े-बुजुर्गों से पूछियेगा, जब वह बाहर निकलते थे तो उनकी माँ उनको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ रख दिया करतीं थीं। क्योंकि ये दोनों ही चीजें वैज्ञानिक दृष्टि से कीटाणु रोधी होती हैं।
शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें।
लेकिन ‘कोरी-आधुनिकतावादी’ लॉबी ने आज ये सब भुला दिया है..?
अरे भई! समझिए अपने शास्त्रों के स्तर को, जब हम ‘सब समझेंगे’ मेरा दावा है, तभी हमारी आने वाली पीढियां समझ पाएंगी,तब कहीं आप देश को विश्व गुरु की सीमा बन सकेगा.!!👍
🙏🙏🌹🌹🙏🙏😊👌
विशेष;- 😷 मास्क लगाए, घर पर रहें और न केवल अपने को, अपितु परिवार के हर सदस्य को ‘करोना’ नाम की महामारी से सुरक्षित रखें..👍