112-“दो-टूक”

‘दो टूक’ यानि बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात अर्थात ‘खरी-बात’..को बोल देना।

एक बड़ा सवाल..?

आज लोगों द्वारा कॉरपोरेट को गाली देने का फ़ैशन सा बन गया है.. ?

शायद हम 800 साल ग़ुलाम इसीलिए भी रहे होंगे.. क्योंकि भारत ही नहीं दुनिया के हर समाज में कुछ तत्व ऐसे भी मौजूद रहते हैं..कि वे जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने की मानसिकता पाले हुए होते हैं !

●अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़रा अपनी नज़रें फैलाकर देखिएगा! आज जो भी देश महाशक्ति बने बैठे हैं उसमें काफ़ी योगदान उन देशों की कंपनियों का है। क्योंकि कंपनियाँ रेवेन्यू जेनरेट करके सरकारों को टैक्स के रूप में एक मोटी रकम देती हैं..और ये कंपनियाँ काफ़ी बड़े पैमाने पर वहां के युवाओं को रोज़गार भी देती हैं… जिससे सरकार पर बेरोजगारी का दबाव काफी हद तक कम हो जाता है। दूसरे उन कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी भी.. सरकार को टैक्स देते हैं…कम्पनियां देश के लिए कई तरीके से बहुत लाभकारी होती हैं।

जिससे सरकारें आर्थिक तौर पर मजबूत होती हैं। और देश में बड़े पैमाने पर विकास कार्य होते हैं… साथ ही मुफ्तवाली योजनाओं की फ़ंडिंग भी होती हैं। जो बहुत ही ज़रूरत मन्द लोगों जैसे; किसान-मजदूर व ग़रीबी रेखा के नीचे गुज़र-बसर कर रहे देश के नागरिकों के लिये की जातीं हैं।

● शायद आप जानते ही होंगे, कि दुनिया की एक प्रसिद्ध मैगज़ीन “फॉर्च्यून” हमेशां से एक सूची जारी करती आयी है… “Fortune-500” के नाम से.. इसमें दुनिया की टॉप 500 अमीर कंपनियों के नाम शामिल किये जाते हैं ।

इस सूची के अध्ययन से आपको पता चलता है कि जिस देश की जितनी कंपनियाँ इस सूची में हैं वह देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उतनी ही बड़ी महाशक्ति के रूप में उभर कर आता है.. जैसे वर्तमान में ‘फॉर्च्यून-500’ की सूची में..

नंबर वन पर ‘चीन’ रहा है जिसकी 124 कंपनियाँ फॉर्च्यून-500 में शामिल हैं…

नंबर टू पर अमेरिका है जिसकी 121 कंपनियाँ सूची में हैं..

68 कम्पनियों को लेकर नंबर थ्री पर जापान है।

● याद रखिए… भारत पर 100 साल राज किया था। वो भी एक कंपनी ही थी। जो ब्रिटेन की थी, जिसका नाम ‘ईस्ट इंडिया’ कम्पनी था।

ये भी एक कटु सत्य है कि, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने ही भारत जो सोने की चिड़िया कहा जाता था, भारत को लूट लूट कर ब्रिटेन को धनवान बना लिया।

अंग्रेजों की तो नहीं मग़र आज भी दुर्भाग्य से भारत अंग्रेजियत वाली मानसिकता की गिरफ्त में है आज के शासकों को ‘काले-अंग्रेज’ कह दिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

ये ‘देश-द्रोही’ नेता व कुछ ताइकून लॉबी अपना धन विदेशों में जमा करने में व्यस्त रहे हैं। जिससे देश की जड़ें लगातार खोखली की जाती रहीं हैं, चाहे सत्ता रूढ़ दल कोई भी क्यों न हों.. ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली कहावत इन मौका-परस्तों पर सही चरितार्थ होती है।

● दुर्भाग्य की बात ये है कि फार्च्यून-500 की लिस्ट में अभी भारत की गिनी चुनी दो चार कंपनियाँ ही हैं। और ये दो चार कंपनियाँ भी अपने देश के अंदर अपने युवक /युवतियों को नौकरियाँ जेनरेट करने और टैक्स देने के बावजूद भी गालियाँ खा रही हैं। ऐसे में जब स्वदेशी कंपनियों का ‘मनोबल’ ही गिरा दिया जाएगा तो देश में कंपनियाँ कैसे बढ़ेंगी..? फिर देश की तरक्की में कैसे अपना योगदान दे पायेंगी..?”

●आप जरा विचार कीजिए… आज हमारे देश की GDP 2.7 लाख करोड़ है लेकिन इससे ज्यादा बड़ा मार्केट तो अमेरिका की मात्र दो कंपनियों ‘एपल और माइक्रोसॉफ्ट’ का अकेले ही है। यानी जितना पैसा हम करोड़ों भारतीय मिलकर जेनरेट करते हैं उससे ज्यादा ये दो अमेरिकी कंपनियाँ ही कर देती हैं।

● अब आप ही देखिये जैसे देश में IT सेक्टर युवाओं के लिए लाखों नौकरियाँ जेनरेट करता है। तो क्या ये न्यायोचित है कि हम उसके मालिक ‘श्री नारायण मूर्ति’ जी को गालियाँ दें..?

लेकिन भारत के लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। ये बात अपनी जगह सोलह आने सत्य है।

इसीलिए अपना देश 800 साल गुलाम रहा। हम अक्सर देखते हैं कि लोग जिस कंपनी या जिस विभाग में काम करते हैं उसी को गालियाँ देते हैं।

● यदि हम सकारात्मक नज़रिए से देखें, अंबानी के जियो की वजह से डेटा और इंटरनेट इतना सस्ता हो गया है कि मोबाइल पर ही आज बहुत से युवा कई एक तरह के बिज़नेस कर रहे हैं।

जैसे; मैं भी “Word-Press” पर अपनी वेबसाइट रजिस्टर्ड कराने के बाद अपने आर्टिकल्स पब्लिश करके थोड़ी सी रॉयल्टी पा रहा हूँ।

अपने देश के विद्यार्थी सस्ते ‘डाटा-पैक’-की ही बदौलत लॉकडाउन में ऑनलाइन पढाई कर पा रहे हैं.. और तमाम सारे काम आज ऑनलाइन हो रहे हैं। लेकिन ये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि उसी सस्ते डेटा का इस्तेमाल करके कई लोग Twitter पर Trend करवाते हैं… boycott Ambani..

हैं ना ये बात शर्मनाक !!

● वास्तव में ये भारतीयों की एक मूल समस्या “ईर्ष्या” के ही कारण है। अपने देश के लोगों का मानसिक स्तर आज इतना गिर गया है कि, ज्यादातर लोग अपने सगे भाई की तरक्की को भी कम ही बर्दाश्त कर पाते हैं। बताओ! फिर ऐसे लोग पराऐ की तरक़्क़ी को कैसे सहन करेंगे..?

● रिलायंस इंडस्ट्री ₹ 67,000 करोड़ सिर्फ GST के रूप में देश को देती है, क्या वह कोई पाप कर रही है..? ऐसे ही टैक्सेस के दम पर प्रधानमंत्री देश में ग़रीबों के लिए सब्सिडी वाली योजनाएँ चला पाते हैं। और

● अगर आपके इस ग़लत रवैये से ये कंपनियाँ बंद हो जाएँगी तो ये सब्सिडी वाली योजनाएं भी बंद नहीं हो जाएगी क्या..?

● सुझाव;- हमें इन कंपनियों की तरक्की से सीखना चाहिए ना कि उन्हें गालियाँ देनी चाहिए। दूसरे व्यक्तिगत लाभ की सोच से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने देश की क्या स्थिति है..? क्या होनी चाहिए..? ज़रा विचार करना होगा..

जैसे; “इंडिया-गेट” कंपनी चावल की एक बड़ी ‘वर्ल्ड-कंपनी’ है। ये कंपनी पाकिस्तान से आए दो हिंदू शरणार्थी भाइयों ने शुरू की थी। तो हमें इन कंपनियों के मालिकों की मेहनत का सम्मान करना चाहिये ना कि उन्हें गालियाँ देनी चाहिए।

इसी तरह MDH वाले धर्मपाल गुलाटी.. पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आए थे… साइकिल पर मसाले बेचते थे। आज उनकी कंपनी दुनिया में मसाले एक्सपोर्ट करती है। हजारों लोगों को नौकरियाँ देती हैं। रेवेन्यू जेनरेट करके टैक्स के द्वारा सरकार का ख़ज़ाना भी भरती है।

इसी तरह बिना कुछ जाने समझे हम लोग अक्सर अडानी को भी गालियाँ देते रहते हैं। जबकि अडानी की सोलर कंपनी…दुनिया की सबसे बड़ी सोलर कंपनियों में शुमार है। ये कंपनी भी देश को प़ॉल्युशन फ्री बना रही है… देश के लाखों युवाओं को नौकरियाँ दे रही है… टैक्स जेनरेट करती है। तो क्या ये इन लोगों की गलतियां हैं.. ?

हमें, अपनी अज्ञानता के कारण दूसरों के स्वस्थ-योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए!!!

ये भी मैं, जानता हूँ कि, आप करेंगे.. तो वही,जो आपको करना है..

मग़र दोस्तो! राजनीति से हटकर समाज में नेताओं के कुछ पालतू ठेकेदारों की बर्गलाहट में न आ कर.. इस विषय पर एकबार ख़ुद के विवेकपूर्ण विचारों के आधार पर अपने अन्तःकरण से पूछियेगा..तब सोचिएगा… 👍 राधे गोविंद 🙏

विचारक ; YUG,पचहरा

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