अंग्रेजी में कहें,तो रीयल-हैप्पीनैस यानि वास्तविक खुशी..जीवन में किसके पास होती है .??
आज उन मानकों पर बात करते हैं..
दरअसल, जब से ये दुनियाँ अपने प्रादुर्भाव आई है, तब से “सच्ची खुशी” की तलाश हर किसी को है।
स्वभावतः हर जीव में “प्रसन्नता” अनुभूत करने की चाह जो होती है। इसका मुख्य कारण है कि जीव के अंदर मौजूद “आत्मा” जिससे वह संचालित रहता है। वह न सिर्फ ईश्वरीय अंश है। अपितु अजर,अमर एवं अविनाशी भी है।
इसीलिए..आत्मा की प्रवृत्ति सर्वथा एंजॉयिंग के साथ साथ अन्य जीवों से बढ़कर स्वयं को नंबर एक पर रखने की होती है। ये सांसारिकता के कारण नहीं ये,तो जीव का ईश्वरीय गुण है। क्योंकि “God Element” विद्युत करंट की तरह चर अचर सब में व्याप्त है मगर “एक” है।
परन्तु इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि, मृत्युलोक में जन्मा हर जीव सदैव “परिस्थिति का दास” होता है। उसके पूर्व संचित कर्म.. जैसी परिस्थिति उसके सम्मुख प्रस्तुत करते रहेंगे, उसके जीवन की नियति वैसी ही बनती चली जायेगी।
यहां एक सच ये भी है कि, अमुक जीव की परवरिश जैसे वातावरण में हुई होती है.. उसकी रुचि, अभिरुचि भी कुछ कुछ वैसा ही आकार लेती चली जाती हैं।
सामान्यतः अनियंत्रित मन के कारण उलझा हुआ.. जीव मजबूरन अपना सारा जीवन उन्हीं चीजों के इर्द-गिर्द गुजार..ने को बाध्य रहता है..जब तक कि,वह किसी विहीकल की तरह अपने ब्रेन का गियर बदल, स्वयं को रूपांतरित (ट्रांसफॉर्म ) नहीं कर लेता।
हां, सकारात्मक-सोच का व्यक्ति अपने नियंत्रित मन के साथ स्वयं के चित्त में ..’मन की प्रसन्नता’, खुशी व आनन्द को ही तरजीह देता है ।
व्यक्ति के विचार, दैनिक क्रिया-कलाप अर्थात उसकी बॉडी-लैंग्वेज काफ़ी हद तक प्रदर्शित कर देती है..कि अमुक के जीवन में वास्तविक ‘प्रसन्नता’ है या फिर प्रसन्नता का अभिनय भर है।
सामान्यत: खुशी व प्रसन्नता ‘ जीव ‘ का ‘आत्मिक स्वभाव’ है। आध्यात्म कहता है कि जीवात्मा की मूल प्रवृत्ति ‘आनंदमय’ होती है।
विज्ञान की दृष्टि से देखें,तो इसके पीछे उन चार हारमोंस का भी काफी अहम रॉल है। जो प्राकृतिक रूप से मानव-शरीर में बनते हैं।
यही बजह है कि, एक छोटा बच्चा अपने जीवन के शुरुआती दिनों में सबसे ज्यादा खुश रहता है..क्योंकि उस अवस्था तक वह अपने प्राकृतिक-स्वभाव में होता है।
परन्तु जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती है.. उस पर परिवार,समाज, उसके फ्रेंड सर्कल और फिर दुनियां में व्याप्त अनेक प्रपंचों आदि का प्रभाव उसके दिलो-दिमाग पर पड़ने लगता है, तो उसकी प्रसन्न रहने की स्वाभाविक- प्रवृत्ति धीरे-धीरे गुम होती चली जाती है।
जबकि, मनोचिकित्सक सदैव बताते रहे हैं कि, व्यक्ति का हरपल खुश रहना ‘स्वास्थ्य एवं ज़िंदगी’ दोनों के लिए बेहद आवश्यक है।
जो भी ये परिस्थितियां है वे एक विचारक के मानस-पटल पर अवश्य कुछ सवाल उकेरती है..जैसे कि,
“दुनियाँ के इस दु:खालय में आकर..व्यक्ति का “प्रसन्न” रहना..क्या आसान काम है..??”
आंकड़े बताते हैं कि युग युगांतर से दुनियां की लगभग अस्सी फ़ीसदी आबादी हमेशा ‘डिग्ग्रेस-मोड’ पर अर्थात किसी न किसी भटकाव में रहती है।।
विचारक के मानस पटल पर आने वाले प्रश्न के जवाब में ये कहना गलत नहीं है कि, यहां भौतिक रूप से ‘प्रसन्न रहना’ तो वाकई संघर्षपूर्ण है..?
परंतु अध्यात्म में इस बिंदु का कोई खास वजूद नहीं है।
क्योंकि दुनियां में अध्यात्म..से चलने वाली लॉबी मन में सदैव प्रफुल्लित रहती हैं। पहली बात,तो ये कि वे लोग” नश्वर संसार”, “शरीर की क्षण भंगुरता” जैसे तथ्यों को जानने के बाद.., संसार में हो रही Rat…Racing..(🐀……🐁) से दूर.. हर पल अपने इष्ट के स्मरण में .. जिंदगी को बहुत शांत भाव में जी..ते हैं।
भौतिक रूप से सुख-सुविधा या अपार सम्पत्ति जुटा लेने से कोई व्यक्ति,परिवार,समाज या फिर देश…’वास्तविक-प्रसन्नता’ को न तो अनुभव कर सकता है और न वह “रियल-हैप्पीनेस” वाले मानकों के दायरे में ही सुमार हो पाता है।
आप ही सोचिए.. अगर ऐसा होता, तो हम और आप आये दिन देखते हैं कि कितने लोग या फिर देश झूठ-मूंठ की बनावटी खुशी.. से अपने समाज या समूची दुनियाँ के सामने खुद को प्रसन्न दिखने का अभिनय अवश्य करते हैं। मगर वे वास्तव में प्रसन्न होते नहीं।
क्योंकि..
वास्तविक-खुशी या प्रसन्नता का आंकलन करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रबुध्द वर्ग ने कुछ मानक निर्धारित किये हुए हैं.. उनकी कसौटी पर जब कोई व्यक्ति या देश खरा पाया जाता है तब माना जाता है कि, अमुक व्यक्ति, समाज या फिर कोई देश सही राह पर चलते.. हुए “असली-प्रसन्नता” से उसका अन्तर्मन प्रफुल्लित है। निर्धारित मानकों के दायरे में रहकर..वह एक खुशहाल जीवन जी.. रहा है।
अर्थात अंतराष्ट्रीय-स्तर पर रिपोर्ट तैयार कर उसकी सिफारिश की जाती है कि,अमुक देश जो विश्व स्तर पर.. यू.एन.ओ द्वारा प्रति वर्ष तैयार की जाने वाली “वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स” W.H.I. (विश्व प्रसन्नता सूचकांक) में सुमार किये जाने योग्य है। प्रतिवर्ष उसकी तरफ से देशों की एक.. “टॉप टेन” सूची जारी होती है।
अन्यथा की स्थिति में सब बेमानी है, दिखावा है, बहुत बड़ा भटकाव है समूची दुनियां में खुद को प्रसन्न दिखाने का लोगों में एक अभिनयपूर्ण छलावा चल रहा है।
वास्तविक खुशी निर्धारण के ये महत्वपूर्ण छह मानक हैं..जो व्यक्ति, परिवार, समाज या फिर देश की “रियल-हैप्पीनेस” का धरातल बताए गए हैं.. निम्न हैं..
1-आय, 2-स्वास्थ्य, 3-जीवन-प्रत्याशा, 4-सामाजिक-सहयोग, 5- आज़ादी, 6-भरोसा।
यूनाइटेड नेशन्स सस्टेनेबल डिवलोपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क द्वारा इस वर्ष 147 देशों की सर्वे की गई जिसके आधार पर ..
किसी व्यक्ति या फिर देश के जीवन में इन छह मानकों का संतुलन होता है,तो फिर पक्का वह आनंदित है, खुशहाल है। उसके जीवन की गाड़ी ट्रैक पर है। निःसंदेह उसके चित्त में ‘असली-खुशी’ अर्थात Real Happiness है।
इस वर्ष के ‘टॉप टैन कन्ट्रीज’ की रैंक विश्व प्रसन्नता सूची,2025 ….
1- फ़िनलैंड पिछले आठ वर्ष से लगातार (7.842) की रेंक लेकर नंबर वन पर बना हुआ है
2-डेनमार्क ( 7.620),
3- स्विट्ज़रलैंड (7.571),
4-आइसलैंड (7.554),
5-नीदरलैंड (7.464),
6-नॉर्वे (7.392),
7-स्वीडन (7.363),
8-लक्सेम्बर्ग (7.324),
9- न्यूज़ीलैंड (7.277),
10-ऑस्ट्रिया (7.268)
इस वर्ष अपने देश भारत की रैंक 118 है। जबकि पिछले वर्ष भारत 126 वें पायदान पर था।
चलो! ये भी हम भारतीयों के लिए एक खुशी की ही बात है.. चाहे धीमी गति से ही सही हम लगभग पिछले एक दशक से..लगातार “प्रसन्नता” की ओर बढ़ने.. लगे हैं।
Thanks for reading & responding👍
विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा, मुखिया परिवार,
नीमगाँव से..