150-“जीवन-लक्ष्य”

हर “शब्द” में गहराई होती है इससे हम सभी वाकिफ़ है .इसी से सम्बन्धित एक तथ्य की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जैसे;.👍

जब कभी किसी युवा से मै किसी को ऐसा सवाल करते हुए पाता हूँ कि, आपके “जीवन का लक्ष्य क्या है..?” तो न जाने क्यों मुझे ये प्रश्न सदैव अटपटा ही लगता है।

वैसे देखा जाए, तो आम तौर पर ये प्रश्न एकदम सामान्य है।

मग़र आप ये भी मान लीजिएगा इससे जटिल प्रश्न शायद ही कोई और हो।

प्रश्न की जटिलता ये है कि, इसका जो भी उत्तर होगा..वह ग़लत होगा..क्योंकि इस प्रश्न को जिस एंगल से मैं देख पा रहा हूं उससे तो ये सर्वथा ग़लत ही होगा..

मेरा आशय ये है कि इस प्रश्न के सारे के सारे उत्तर ग़लत ही होंगे..क्योंकि..

इस प्रश्न की प्रासंगिकता ही शक के दायरे में है।

अब मैं, आपसे ही पूछता हूँ कि, दुनियाँ में “जीवन” से बड़ी कोई और चीज़ भला.. है, क्या..?? जिसका कि कोई लक्ष्य हो सके…?

मानव-जीवन ही क्यों..? ‘जीवन’ चाहे किसी भी जीव-जंतु का ही क्यों न हो..??

मेरी नज़र में तो इस दुनियां रूपी दुखालय में “जीवन” ही स्वयं में “एक लक्ष्य” है,अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। फिर भला इसका लक्ष्य क्या होगा..? जीवन तो खुद ही एक लक्ष्य” है।

हाँ, इस वक़्त मुझे एक मंजर याद आ रहा है..

कि बचपन में हम लोग जब शाम को खेल के मैदान पर खेला करते थे..तब हमारे परिवार के बड़े हम बच्चों को एक रेस का कॉम्पटीशन देते थे..

कहा जाता.. कि चलो ! आओ बच्चो! तुम्हारे बीच एक “नींबू-चम्मच” रेस कराते हैं..

इसमें होता क्या था कि,एक समय में ट्रैक पर अधिक से अधिक तीन या चार बच्चे ही रेस में भाग लिया करते थे..

मग़र शर्त ये होती थी कि, “नींबू” चम्मच पर से किसी भी स्थिति में गिरना नहीं चाहिए..

हर प्रतियोगी को इस बात का विशेष ध्यान रखना होता था कि, शर्त को ध्यान में रखते हुए.. अपने प्रतिद्वंद्वी से कम समय में रेस के अन्तिम-पड़ाव पर पहुंचना होगा..तब कहीं रेस को जीतने की स्थिति बनती थी। और यदि किन्हीं कारणोंवश नींबू चम्मच से गिर गया तो शर्त के मुताबिक वह खिलाड़ी रेस से बाहर कर दिए जाता था।

क्या आपको नहीं लगता.. हमारी पूर्व-पीढ़ियों के “जीवन मार्ग” से कुछ भटक जाने के कारण.. यहां कुछ इस तरह का वातावरण बन गया है कि, संसार में आने के बाद होश सम्भालते ही हम सभी अपने आप को स्वतः ही न केवल “जीवन की इस रेस” में शामिल..अपितु ट्रैक पर खड़ा हुआ पाते हैं।

मेरे विचार से आप भी इस बात से इत्तिफाक रखते होंगे कि, संसार की ‘पूर्व-निर्धारित-व्यवस्था’ के अन्तर्गत सभी जीवों को अपने विकास के लिए “फ्री-विल” अर्थात ‘स्वतंत्र-इच्छा’ का प्रावधान है।

मग़र यहां बच्चों की “नींबू-चम्मच” वाली रेस की तरह ‘जीवन’ की इस रेस में भी एक शर्त है..

आप ‘जीवन’ की रेस में जीतने के लिए अपने सारे प्रयास करें..👍

मग़र “प्रसन्नता” रूपी नींबू आपके “स्वभाव” नामक चम्मच पर से किसी भी परिस्थिति में गिरना नहीं चाहिए.. जीवन के निर्धारित मानकों के दायरे में जीते हुए.. कोई यदि “जीवन-लक्ष्य” प्राप्त कर ले, तो निःसन्देह ही वह प्रशंसनीय है.. 👍

विचारक ; योगेन्द्र सिंह पचहरा, मुखिया परिवार नीमगाँव,राया,मथुरा से..

149″अनौखा-आनंद”

अनौखा आनन्द कहें.. या फिर “परमानंद”

आम-आदमी के लिए आध्यात्मिक-दृष्टिकोण या समूचे विश्व में हर वर्ष मनाए जाने वाला “स्वास्थ्य दिवस” भले ही कोई माने या न माने मग़र इन सब का एक ही मक़सद होता है..कि, जीवन में “सेहत का ख़्याल व मन की प्रसन्नता” ही सर्वोपरि है। बाकी सब.., उसके बाद …

मग़र अफसोस ! जमीनी हकीकत एकदम इसके विपरीत होती है। जैसे,’बाकी सब, पहले ‘सेहत का ख़्याल व मन की प्रसन्नता’ के लिए कभी किसी के पास कोई समय ही नहीं होता..😢

जबकि, ये स्पष्ट है कि, दुनियाँ से कोई एक “सुई” सी चीज न ले के कभी गया है और नहीं भविष्य में कभी ले के जा सकेगा.. भले ही विज्ञान अपनी अक्ल के चाहे जितने घोड़े दौड़ा ले…

किसी के साथ ‘अनुचित क्रिया-कलाप’ ‘अनुचित वार्ता-लाप’ फिर क्यों… ?

क्या ही अच्छा हो कि हमेशा हर जगह सब कुछ ‘उचित” ही हो..?

विचारणीय बिंदु हैं।

दूसरे,

इस वेश-कीमती मानव-जीवन में इतनी भागमभाग फिर किस के लिए..?

जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए “कर्म” करने के पश्चात थोड़ा बहुत लोक-कल्याणकारी कार्यों में हाथ बटाकर मन में संतोष रखते हुए ज़िंदगी की राह पर “जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..” वाले भाव से चलते रहना…ही सार्थक है।

क्योंकि ‘जीवन’ चलने का नाम..है रुकने का नहीं।

इसीलिए सुबह हो या शाम..बस चलते रहें.. ये ही ‘जीवन’का स्वभाव है..

यहाँ मैं, ऐसा सोचता हूँ..कि, प्रारब्ध के वशीभूत हमारा जीवन चाहे ‘सुख’ के दौर से गुज़र रहा हो.. या फिर ‘दुःख’ के, लेकिन इस विचार से व्यक्ति को अपने अन्तर्मन में एक “अनौखा-आनन्द” अवश्य महसूस होता है..? पहले विचार कीजियेगा..तब मनन भी कीजियेगा..पढ़ने के लिए धन्यवाद👍

राधे गोविंद..राधे गोविंद 💐

; योगेन्द्र पचहरा,

जन्मभूमि: नीमगाँव

कर्मभूमि : जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस)

148-“Son of India”

दुनियाँ में बेईमान और भ्र्ष्टाचारियों का बाहुल्य दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है..

आज यदि कोई अपने फर्ज के प्रति ईमानदारी बरतता है तो लोग उसे “डैड-ऑनेस्ट” की संज्ञा देते हैं..हालांकि वह भी पूर्ण ईमानदार होने का ही पर्याय है।.. मग़र कुछ लोग ये व्यंग्यात्मक भाव में कहते हैं..

इस पर मुझे एक बात याद आ रही..कि,

एकबार किसी ‘चर्चा-परिचर्चा’ के दौरान किसी ने मुझसे सवाल करते हुए कहा था कि,

आप ही बताइए कि,” देश का नेता, होना कैसा चाहिए..? उस वक्त भी मैंने बेहिचक यही कहा था.. जो अभी भी कह रहा हूँ.. कि, न केवल किसी स्तर पर नेतृत्व करने के लिए वल्कि एक साफ-सुथरा जीवन जीने के लिए भी ईमानदारी की मिसाल। “भारत का लाल” अव्वल दर्जे का नेता यदि स्वस्थ मस्तिष्क से विश्लेषण किया जाय,तो अभी तक के भारतीय राजनीतिक इतिहास में तो एक ही है..पूर्व प्रधानमंत्री “श्री लालबहादुर जी शास्त्री” जो अनुकरणीय हैं।

यूँ तो उनकी ईमानदारी के अनेक किस्से लोकप्रिय हैं मग़र आज मैं उनके और उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री जी के दो-एक खास किस्सों का जिक्र करना चाहूँगा.

. देश के प्रधानमंत्री की हैसियत को ध्यान में रखते हुए.. भारत सरकार ने उन्हें एक इम्पोर्टेड-कार “इम्पाला” दे रखी थी जो उन दिनों काफ़ी महंगी और स्टैंडर्ड कार हुआ करती थी।

एक दिन उनके बेटे अनिल शास्त्री व सुनील शास्त्री के मन में आया कि चलो! इम्पाला कार का लुत्फ उठाते हैं अपने मित्र के पास घूम के आते हैं, जैसी कि, बच्चों की फ़ितरत होती है.. तो ड्राइवर ‘रामदेव’ जी से चाबी मांग ली और चले गए..

देर रात जब लोटे तो शास्त्री जी को पता चला..उन्होंने तत्काल सुनील शास्त्री व अपनी पत्नी ललिता शास्त्री जी को बुलाया..और सुनील के कंधे पर हाथ रखते हुऐ कहा..बेटे अब तुम सोलह वर्ष के होगए हो..इसलिए ऐसी गलती फिर से मत करिएगा..

ड्राइवर को बुलाया कहा, मीटर देखो गाड़ी कितने किलोमीटर चली है उसने बताया “चौदह कि.मी.”..

सुनील!’लॉग-बुक’ लाओ और लिखो उसमें..”कार व्यक्तिगत कार्य के लिए 14 किमी.प्रयोग की गयी” अपना नाम लिखो.. ; सुनील शास्त्री और

अपनी पत्नी से कहा, सेक्रेटरी ‘सहाय’ जी को बुलाकर इसका भुगतान कर देना..ऐसे! ईमानदार थे शास्त्री जी।

मग़र बच्चों ने इस घटना के बाद कहा.. अब घर पर अपनी गाड़ी भी तो होने चाहिए..उन्होंने कहा चलो एक फ़ीएट गाड़ी ले लेते हैं।

लेकिन हमारे पास इतने पैसे तो हैं नहीं..

शास्त्री जी ने तभी पंजाब नेशनल बैंक को लोन लेने के लिए एक एप्लीकेशन लिखी..दस मिनट के अंदर बैंक मैनेजर आ गया..और तुरन्त कागज़ात पूरे कराके चलने लगा. तब प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने कहा..बहुत बहुत धन्यवाद..👍 ऐसी ही तत्परता सामान्य आदमी के काम में भी दिखाया करो..👍

ये बात 1965 की है कार खरीद ली गयी।

ये हम सभी जानते हैं कि,1966 में अपनी कार-लोन की किश्त चुकाए बिना वे अचानक हम सबको छोड़ के दुनियाँ से चले गए।

जब श्रीमती इंदिरा गांधी प्राइम-मिनिस्टर बनीं,तो उन्होंने बैंक वालों से कहा, कि लोन का बाकी पैसा हम सरकारी खजाने से भर देंगे।

मग़र उसी वक़्त श्रीमती ललिता शास्त्री ने प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी को पत्र लिखा ..प्लीज आप ये मत करिए..इससे मेरे पति की आत्मा को बहुत कष्ट होगा। ये लोन मैं अपनी ग्रेच्युटी व पेंशन में से भर दूंगी। और यही हुआ..भी।

वही गाड़ी आज मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थित शास्त्री नामक म्यूजियम में खड़ी है।

शास्त्री-परिवार का ऐसा ही एक वाकया और है..जो हम सबके लिए प्रेरणादायी है..ये उस समय की बात है जब प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जेल में थे। तब उनकी पत्नी उनसे मिलने गयीं। आम का सीज़न था वे जानती थीं कि शास्त्री जी को आम बहुत पसन्द हैं, तो ‘दो आम’ चुपके से वे उनके लिए ले गयीं। लेकिन ये नियमों का उलंघन था जेल में बिना अनुमति के कोई किसी कैदी के लिए कुछ भी ले कर नहीं आ सकता। और शास्त्री तो पहले से ही “डैड-ऑनेस्ट” थे। ये देखते ही वे अपने आपको नहीं रोक सके अपनी पत्नी पर भभक पड़े..अरे ! ये क्या किया आपने, बहुत बड़ी गलती है ये।

अब तो ललिता जी रोने लग गयीं.. शास्त्री जी के मित्र ने कहा भाभी जी आप ‘आम’ छोड़ कर घर चली जाओ..बड़े दुखी मन से ललिता जी घर वापस चली गयीं।

बाद में मित्र ने कहा, “वो तो लायीं थी आपके लिए आम और उन्हें मिली फ़टकार..अरे भई किसी की भावना को तो समझना चाहिए.. और बात कहने का ढंग भी तो हो..”

अब शास्त्री जी भी दुःखी हो गए उन्होंने मित्र से कहा, अब क्या करूँ..?

तभी उन्होंने देखा एक कैदी जो बहुत दिनों से जेल में ही था वे दोनों आम उस कैदी को दे दिए।उसने वे बड़े ही चाव से खाये..मानो उसे तो अमृत ही मिल गया हो।

अब शास्त्री जी ने अपनी पत्नी को एक चिट्ठी लिखी..

उन्होंने लिखा मैं अपने उस दिन के रूखे व्यवहार के लिये क्षमा चाहता हूँ।आपने जो किया वो ठीक ही रहा आपको सुनकर खुशी होगी वे दोनों आम एक ऐसे कैदी ने खाये जिसने जेल में होने के कारण दसों वर्षो से आम चखे तक नहीं थे। मैं फिर से आपको धन्यवाद देते हुए..अपने लिए आप से क्षमा मांगता हूँ।

जेल में रहने के दौरान एक बार श्री शास्त्री पैरोल पर अपने बीबी-बच्चों से मिलने आये,तो उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी बहुत कमजोर हो रहीं हैं तब जाते वक्त उन्होंने ललिता जी को कहा आप रोजाना एक गिलास दूध पिया करो..

वो बेचारी कर क्या सकती थी पति तो वापस चले गए जेल.. घर में पैसे थे ही नहीं, तभी उन्होंने अपनी बेटी से कहा, बेटा बाजार से एक ऐसा गिलास लाओ बहुत छोटा सा जैसा तुम्हारे गुड़िया-गड्ढों के हैं। ललिता जी ने रोज़ाना ऐसा ही “एक गिलास” दूध पिया जिससे पति की बात भी रह गयी, और कम पैसों में काम चल गया…

वाह! क्या ईमानदार थे वे लोग.. क्या आचरण की पवित्रता थी उनमें..!! अनुकरणीय..👍

; योगेन्द्र पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस

147″असली प्रसन्नता”

अंग्रेजी में कहें,तो रीयल-हैप्पीनैस यानि वास्तविक खुशी..जीवन में किसके पास होती है .??

आज उन मानकों पर बात करते हैं..

दरअसल, जब से ये दुनियाँ अपने प्रादुर्भाव आई है, तब से “सच्ची खुशी” की तलाश हर किसी को है।

स्वभावतः हर जीव में “प्रसन्नता” अनुभूत करने की चाह जो होती है। इसका मुख्य कारण है कि जीव के अंदर मौजूद “आत्मा” जिससे वह संचालित रहता है। वह न सिर्फ ईश्वरीय अंश है। अपितु अजर,अमर एवं अविनाशी भी है।

इसीलिए..आत्मा की प्रवृत्ति सर्वथा एंजॉयिंग के साथ साथ अन्य जीवों से बढ़कर स्वयं को नंबर एक पर रखने की होती है। ये सांसारिकता के कारण नहीं ये,तो जीव का ईश्वरीय गुण है। क्योंकि “God Element” विद्युत करंट की तरह चर अचर सब में व्याप्त है मगर “एक” है।

परन्तु इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि, मृत्युलोक में जन्मा हर जीव सदैव “परिस्थिति का दास” होता है। उसके पूर्व संचित कर्म.. जैसी परिस्थिति उसके सम्मुख प्रस्तुत करते रहेंगे, उसके जीवन की नियति वैसी ही बनती चली जायेगी।

यहां एक सच ये भी है कि, अमुक जीव की परवरिश जैसे वातावरण में हुई होती है.. उसकी रुचि, अभिरुचि भी कुछ कुछ वैसा ही आकार लेती चली जाती हैं।

सामान्यतः अनियंत्रित मन के कारण उलझा हुआ.. जीव मजबूरन अपना सारा जीवन उन्हीं चीजों के इर्द-गिर्द गुजार..ने को बाध्य रहता है..जब तक कि,वह किसी विहीकल की तरह अपने ब्रेन का गियर बदल, स्वयं को रूपांतरित (ट्रांसफॉर्म ) नहीं कर लेता।

हां, सकारात्मक-सोच का व्यक्ति अपने नियंत्रित मन के साथ स्वयं के चित्त में ..’मन की प्रसन्नता’, खुशी व आनन्द को ही तरजीह देता है ।

व्यक्ति के विचार, दैनिक क्रिया-कलाप अर्थात उसकी बॉडी-लैंग्वेज काफ़ी हद तक प्रदर्शित कर देती है..कि अमुक के जीवन में वास्तविक ‘प्रसन्नता’ है या फिर प्रसन्नता का अभिनय भर है।

सामान्यत: खुशी व प्रसन्नता ‘ जीव ‘ का ‘आत्मिक स्वभाव’ है। आध्यात्म कहता है कि जीवात्मा की मूल प्रवृत्ति ‘आनंदमय’ होती है।

विज्ञान की दृष्टि से देखें,तो इसके पीछे उन चार हारमोंस का भी काफी अहम रॉल है। जो प्राकृतिक रूप से मानव-शरीर में बनते हैं।

यही बजह है कि, एक छोटा बच्चा अपने जीवन के शुरुआती दिनों में सबसे ज्यादा खुश रहता है..क्योंकि उस अवस्था तक वह अपने प्राकृतिक-स्वभाव में होता है।

परन्तु जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती है.. उस पर परिवार,समाज, उसके फ्रेंड सर्कल और फिर दुनियां में व्याप्त अनेक प्रपंचों आदि का प्रभाव उसके दिलो-दिमाग पर पड़ने लगता है, तो उसकी प्रसन्न रहने की स्वाभाविक- प्रवृत्ति धीरे-धीरे गुम होती चली जाती है।

जबकि, मनोचिकित्सक सदैव बताते रहे हैं कि, व्यक्ति का हरपल खुश रहना ‘स्वास्थ्य एवं ज़िंदगी’ दोनों के लिए बेहद आवश्यक है।

जो भी ये परिस्थितियां है वे एक विचारक के मानस-पटल पर अवश्य कुछ सवाल उकेरती है..जैसे कि,

“दुनियाँ के इस दु:खालय में आकर..व्यक्ति का “प्रसन्न” रहना..क्या आसान काम है..??”

आंकड़े बताते हैं कि युग युगांतर से दुनियां की लगभग अस्सी फ़ीसदी आबादी हमेशा ‘डिग्ग्रेस-मोड’ पर अर्थात किसी न किसी भटकाव में रहती है।।

विचारक के मानस पटल पर आने वाले प्रश्न के जवाब में ये कहना गलत नहीं है कि, यहां भौतिक रूप से ‘प्रसन्न रहना’ तो वाकई संघर्षपूर्ण है..?

परंतु अध्यात्म में इस बिंदु का कोई खास वजूद नहीं है।

क्योंकि दुनियां में अध्यात्म..से चलने वाली लॉबी मन में सदैव प्रफुल्लित रहती हैं। पहली बात,तो ये कि वे लोग” नश्वर संसार”, “शरीर की क्षण भंगुरता” जैसे तथ्यों को जानने के बाद.., संसार में हो रही Rat…Racing..(🐀……🐁) से दूर.. हर पल अपने इष्ट के स्मरण में .. जिंदगी को बहुत शांत भाव में जी..ते हैं।

भौतिक रूप से सुख-सुविधा या अपार सम्पत्ति जुटा लेने से कोई व्यक्ति,परिवार,समाज या फिर देश…’वास्तविक-प्रसन्नता’ को न तो अनुभव कर सकता है और न वह “रियल-हैप्पीनेस” वाले मानकों के दायरे में ही सुमार हो पाता है।

आप ही सोचिए.. अगर ऐसा होता, तो हम और आप आये दिन देखते हैं कि कितने लोग या फिर देश झूठ-मूंठ की बनावटी खुशी.. से अपने समाज या समूची दुनियाँ के सामने खुद को प्रसन्न दिखने का अभिनय अवश्य करते हैं। मगर वे वास्तव में प्रसन्न होते नहीं।

क्योंकि..

वास्तविक-खुशी या प्रसन्नता का आंकलन करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रबुध्द वर्ग ने कुछ मानक निर्धारित किये हुए हैं.. उनकी कसौटी पर जब कोई व्यक्ति या देश खरा पाया जाता है तब माना जाता है कि, अमुक व्यक्ति, समाज या फिर कोई देश सही राह पर चलते.. हुए “असली-प्रसन्नता” से उसका अन्तर्मन प्रफुल्लित है। निर्धारित मानकों के दायरे में रहकर..वह एक खुशहाल जीवन जी.. रहा है।

अर्थात अंतराष्ट्रीय-स्तर पर रिपोर्ट तैयार कर उसकी सिफारिश की जाती है कि,अमुक देश जो विश्व स्तर पर.. यू.एन.ओ द्वारा प्रति वर्ष तैयार की जाने वाली “वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स” W.H.I. (विश्व प्रसन्नता सूचकांक) में सुमार किये जाने योग्य है। प्रतिवर्ष उसकी तरफ से देशों की एक.. “टॉप टेन” सूची जारी होती है।

अन्यथा की स्थिति में सब बेमानी है, दिखावा है, बहुत बड़ा भटकाव है समूची दुनियां में खुद को प्रसन्न दिखाने का लोगों में एक अभिनयपूर्ण छलावा चल रहा है।

वास्तविक खुशी निर्धारण के ये महत्वपूर्ण छह मानक हैं..जो व्यक्ति, परिवार, समाज या फिर देश की “रियल-हैप्पीनेस” का धरातल बताए गए हैं.. निम्न हैं..

1-आय, 2-स्वास्थ्य, 3-जीवन-प्रत्याशा, 4-सामाजिक-सहयोग, 5- आज़ादी, 6-भरोसा।

यूनाइटेड नेशन्स सस्टेनेबल डिवलोपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क द्वारा इस वर्ष 147 देशों की सर्वे की गई जिसके आधार पर ..

किसी व्यक्ति या फिर देश के जीवन में इन छह मानकों का संतुलन होता है,तो फिर पक्का वह आनंदित है, खुशहाल है। उसके जीवन की गाड़ी ट्रैक पर है। निःसंदेह उसके चित्त में ‘असली-खुशी’ अर्थात Real Happiness है।

इस वर्ष के ‘टॉप टैन कन्ट्रीज’ की रैंक विश्व प्रसन्नता सूची,2025 ….

1- फ़िनलैंड पिछले आठ वर्ष से लगातार (7.842) की रेंक लेकर नंबर वन पर बना हुआ है

2-डेनमार्क ( 7.620),

3- स्विट्ज़रलैंड (7.571),

4-आइसलैंड (7.554),

5-नीदरलैंड (7.464),

6-नॉर्वे (7.392),

7-स्वीडन (7.363),

8-लक्सेम्बर्ग (7.324),

9- न्यूज़ीलैंड (7.277),

10-ऑस्ट्रिया (7.268)

इस वर्ष अपने देश भारत की रैंक 118 है। जबकि पिछले वर्ष भारत 126 वें पायदान पर था।

चलो! ये भी हम भारतीयों के लिए एक खुशी की ही बात है.. चाहे धीमी गति से ही सही हम लगभग पिछले एक दशक से..लगातार “प्रसन्नता” की ओर बढ़ने.. लगे हैं।

Thanks for reading & responding👍

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा, मुखिया परिवार,

नीमगाँव से..

146-“कमजोर-कड़ी”

परिवार,समाज व देश-दुनियाँ के स्तर पर चाहे हम किसी भी भूमिका में हों, जीवन की असल कसौटी ये है कि, हम परिस्थितिवश भी ख़ुद को कहीं ‘कमजोर-कड़ी’ साबित न होंने दें..

इसीलिए हमें समझना होगा : कि, ‘चरित्र’ एक वृक्ष है और चरित्र रूपी वृक्ष के फल और छाया हैं..”प्रतिष्ठा,यश,सम्मान” जो दुनियाँ दे बिच हम सबको चाहिए.. लेकिन विडम्बना इस बात की है कि, दुनियाँ में बहुत कम लोग हैं जो इस ‘वृक्ष’ का ध्यान रखते हैं, अर्थात उसे अच्छे से सींचते हैं,संवारते हैं। मग़र फिर भी अच्छे-अच्छे फल और घणी छाया की अपेक्षा सबको होती है।

क्यों भई! क्यों..? ऐसे लोगों के लिए बड़े बुजुर्गों ने पहले ही बोल दिया है..’बबूल बोने वाले को आम मिलेंगे कहाँ से..?

जब पहले ‘कर्म’ काँटे के किए हैं.. तो आज उन्हें ही गले लगाओ ना!’ अब दूर क्यों भागते हो..! ये एक सवालिया ‘प्रश्न-चिन्ह’ (?) है.. ऐसी “कमजोर-कड़ी” कहीं हम स्वयं ही, तो नहीं हैं..? विचारणीय है…

राधे गोविंद..राधे गोविंद

मेरे पाठकों और सभी शुभचिंतकों का दिन मंगलमय हो…👍

145-‘Destiny’ vs ‘Free-Will’

You know..

“Life is a journey from DESTINY to FREE-WILL”

For an example In short, we can define .. ” Height of our body is “Destiny” & the weight of our body is “Free-Will”

But I think it’s a very serious & mind over matter so….

So taking it minutely I studied some great profound scholars for the purpose of self awareness, Many questions often rise.. that,

No.1 ” How much of our actions are dictated by Destiny..?

No.2 How much of life is a result of our conscience-choice..?

No.3 Are we the builders of our Destiny..? ”

There are very serious questions…

During the study I got that…

The philosophical schools of thought believe different things..

There are two Prominent & Dramatically opposite views…

No.1- Determinism :–

according to determinism..Everything is predetermined (Pre-destined).

No.2- Free-Will :–

it gives us ‘first’ complete freedom of choice to do something.. in our life

If we go in Ancient Eastern philosophies, we find greater emphasis on ‘Determinism,’ while there has been bigger support for ‘Free-Will’ among modern libertarians.

Today, the rise of ‘Individualism’ in modern society has furthered the notion that we create our own reality sharing up the concept of ‘Free-Will’.

Determinism:–

Represents the view is casually determined by an unbroken chain prior occurrences.

The philosophy of ‘Karma’ decrees that human beings primarily act out the effects of ‘Past Karma’.

Meanwhile ‘Free-Will’ supports the existence of our rational agency through which we can exercise control over our decision.

It also implies that nature’s universal laws donot force any power over ‘Individual-Will’.

How to reconcile this with our intuitive-belief that we are able to make independent decisions to create our own ‘Destiny’ through vision, talent & commitment.

Personal experience often supports the view that we choose the career. We want to pursue, decide on the food. We want eat, determine the extent if hand-work. We put in, have the freedom to choose our leisure activities and so on.

The debate between “Determinism” & “Free-Will” has to examine whether the laws of nature are casually deterministic of our actions.

The whole universe is governed by the law of Nature..Such as the cycle of ‘Birth’, ‘Death’ & again ‘Karma’

But mostly mind-set.. Destiny is nothing unfolding scientific & spiritual progress merely helps us.

understand these laws a bit better. The law of “KARMA” also tells us that our experiences are dictated by our own cumulative ‘Stored -KARMA’ that’s why some people instinctively get angry in a situation that leaves other calm, why some are predisposed to be ambitious and others not.

It is pre-arranged in our karmic psyhe, we are born with this ‘Karmic-psyhe’ and every interactions with environment. It means we generate and store additional-Karma which done by free-desire to that extent,all our decisions come from a Pre-programmed disposition.

Even though.. we may confuse them with ‘Free-Choice’

Infact,they are at best an outcome of our constrained by our Hereditary & Environmental limitations. We know that Shri Ramkrishna paramhans..,Swami Vivekanand’s Guru explained it thus;

Man is like a cow tied to a pole with a rope, bound by the “Karmic- Debts” , “Human-Nature” & the amount of “Free-Will”. She has analogous only to the rope allows. The argument strengthens the case for laws of the nature to be casually deterministic of our lives.

So does Free-Will exist at all..? Yes, but it comes into play only when we make a conscious choice that we would not be governed by conditioned responses. Our ability to make meaningful choices is determined by our level of mindfulness at that moment how aware. ! We are our true identity and how connected we are..! with our inner conscienceness, alive inside each of us, can be path to examining every situation with new awareness.

But for this we need to let go of conditioned responses and let our inner wisdom guide us.

In the end Swami Ramkrishna completed his explanation of ‘Free-Will’ saying that ” As one progresses on the journey of spirituality, the rope of freedom becomes longer .” Allowing for greater access to authentic ‘Free-Will’.

Thanks for reading👍

; Yogendra Singh, Pachahara,

Jain Inter College,Sasni, Hathras

K L Jain Inter college, Sasni,Hathras

144-“सेहत”

बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में शंकर नाम का एक वृद्ध व्यक्ति रहता था। उसकी उम्र अस्सी साल से भी ऊपर थी पर वो चालीस साल के व्यक्ति से भी स्वस्थ लगता था। लोग बार बार उससे उसकी सेहत का रहस्य जानना चाहते पर वो कभी कुछ नहीं बोलता था ।

एक दिन राजा को भी उसके बारे में पता चला और वो भी उसकी सेहत का रहस्य जाने के लिए उत्सुक हो गए। राजा ने अपने गुप्तचरों से शंकर पर नज़र रखने को कहा। गुप्तचर भेष बदल कर उस पर नज़र रखने लगे।

अगले दिन उन्होंने देखा की शंकर भोर (सुबह) में उठ कर कहीं जा रहा है , वे भी उसके पीछे लग गए। शंकर तेजी से चलता चला जा रहा था , मीलों चलने के बाद वो एक पहाड़ी पर चढ़ने लगा और अचानक ही गुप्तचरों की नज़रों से गायब हो गया। गुप्तचर वहीँ रुक उसका इंतज़ार करने लगे।

कुछ देर बाद वो लौटा , उसके हाथ में कुछ छोटे-छोटे से फल थे और उन्हें खाता हुआ चला आ रहा था..

गुप्तचरों ने अंदाज़ा लगाया कि हो न हो , शंकर इन्ही रहस्यमयी फलों को खाकर इतना स्वस्थ है। अगले दिन दरबार में उन्होंने राजा को सारा किस्सा कह सुनाया..

राजा ने उस पहाड़ी पर जाकर उन फलों का पता लगाने का आदेश दिया , पर बहुत खोज-बीन करने के बाद भी कोई ऐसा असाधारण फल वहां नहीं दिखा।

अंततः थक-हार कर राजा ने शंकर को दरबार में हाज़िर करने का हुक्म दिया।

राजा ;

शंकर , इस उम्र में भी तुम्हारी इतनी अच्छी सेहत देख कर हम प्रसन्न हैं , बताओ , तुम्हारी सेहत का राज क्या है ?

शंकर कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला , ” महाराज , मैं रोज पहाड़ी पर जाकर एक रहस्यमयी फल खाता हूँ , वही मेरी सेहत का रहस्य है। “ठीक है चलो हमें भी वहां ले चलो और दिखाओ वो कौन सा फल है।

सभी लोग पहाड़ी की ओर चल दिए , वहां पहुँच कर शंकर उन्हें एक बेर के पेड़ के पास ले गया और उसके फलों को दिखाते हुए बोला, हुजूर , यही वो फल है जिसे इस मौसम में,तो अक्सर मैं रोज खाता हूँ।

राजा क्रोधित होते हुए बोले , “तुम हमें मूर्ख समझते हो , यह फल हर रोज हज़ारों लोग खाते हैं , पर सभी तुम्हारी तरह सेहतमंद क्यों नहीं हैं ?”

शंकर विनम्रता से बोला , ” महाराज , हर रोज़ हजारों लोग जो फल खाते हैं वो बेर का फल होता है , पर मैं जो फल खाता हूँ वो सिर्फ बेर का फल नहीं होता

…वो मेरी मेहनत का फल होता है। इसे खाने के लिए मैं रोज सुबह 10 मील पैदल चलता हूँ जिससे मेरे शरीर की अच्छी वर्जिश हो जाती है और सुबह की स्वच्छ हवा मेरे लिए जड़ी-बूटियों का काम करती है। बस यही मेरी सेहत का रहस्य है। राजा शंकर की बात समझ चुके थे , उन्होंने शंकर को स्वर्ण मुद्राएं देते हुए सम्मानित किया। और अपनी प्रजा को भी शारीरिक श्रम करने की नसीहत दी।

शिक्षा:-

मित्रों, आज टेक्नोलॉजी ने हमारी ज़िन्दगी बिलकुल आसान बना दी है , पहले हमें छोटे -बड़े सभी कामों के लिए घर से निकलना ही पड़ता था , पर आज हम Internet के माध्यम से घर बैठे-बैठे ही सारे काम कर ले रहे हैं। ऐसे में जो थोड़ा बहुत Physical Activity के मौके होते थे वो भी खत्म होते जा रहे हैं , और इसका असर हमारी सेहत पर साफ़ देखने लगा है।

W.H.O. अर्थात विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक , आज दुनिया में 20 साल से ऊपर के 35% लोग Overweight हैं और 11 % Obese हैं। ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सेहत का ध्यान रखें और रोज़-मर्रा के जीवन में शारीरक श्रम को महत्त्व जरूर दे।।👍

🙏🙏

जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। यानी श्रद्धा और सबूरी में जिएं

143-“स्माइल प्लीज”

जी हाँ, आप तो बस मुश्कराते रहिए…!!

जैसे; आंखें छोटी जरूर हैं मग़र !! ताकत उनमें सारी दुनिया देखने की होती है।

ठीक वैसे ही ज़िन्दगी एक हसीन ख़्वाब की तरह है। जिसमें जीने की चाहत होनी चाहिये.. मेरा ऐसा मानना है कि, ‘ग़म खुद ही ख़ुशी में बदल जायेंगे.. आपको सिर्फ “मुस्कुराने की आदत” होनी चाहिये !!’

🌹🙏 राधेगोविंद🌹🙏🏼

142-“अपेक्षा”

मानो या ना मानो

किसी ने ‘Silence is gold’ यूं ही नहीं कह दिया होगा.. कोई तो बजह रही होगी!!

मांफ कीजियेगा मेरा अबतक का अनुभव मुझे भी कुछ ऐसा ही कहने को मजबूर कर रहा है… “शायद खामोशियाँ ही बेहतर हैं,शब्दों से तो लोग अक्सर रूठ.. जाया करते हैं”

जिंदगी गुजर रही है, सबको खुश करने में, मग़र जो मुझ से खुश हुए इस जहां की परिभाषा में वे अपने नहीं कहे जाते!! और जो अपने कहे जाते हैं दरअसल उन्हें इतनी अपेक्षाएं हैं कि, वे कभी खुश ही नहीं हो पाये..?👍

धन्यवाद

; युग, पचहरा,नीमगाँव,राया,मथुरा

🙏राधे गोविंद🙏

141-“पथ-प्रदर्शक”

किसी के भी द्वारा की गयी अपनी आलोचना और बड़े बुजुर्गों द्वारा दी गयी प्रत्येक नसीहत को हमेशां धैर्य से सुनें और उन पर मनन करें क्योंकि.. ये बातें हमारी आत्मा पर जमी हुई मैल रूपी ‘कार्मिक-लेयर’ को हटाने में डिटर्जेंट का काम करती हैं !! अर्थात यही बातें, सदैव हमारी ‘पथप्रदर्शक’ होती हैं जो हमें जीवन के पथ पर चलते समय पथभ्रष्ट होने से बचाती हैं। धन्यवाद👍

युग,पचहरा,नीमगाँव

🙏🌹जय श्री कृष्णा🌹🙏🏻