150-“जीवन-लक्ष्य”

हर “शब्द” में गहराई होती है इससे हम सभी वाकिफ़ है .इसी से सम्बन्धित एक तथ्य की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जैसे;.👍

जब कभी किसी युवा से मै किसी को ऐसा सवाल करते हुए पाता हूँ कि, आपके “जीवन का लक्ष्य क्या है..?” तो न जाने क्यों मुझे ये प्रश्न सदैव अटपटा ही लगता है।

वैसे देखा जाए, तो आम तौर पर ये प्रश्न एकदम सामान्य है।

मग़र आप ये भी मान लीजिएगा इससे जटिल प्रश्न शायद ही कोई और हो।

प्रश्न की जटिलता ये है कि, इसका जो भी उत्तर होगा..वह ग़लत होगा..क्योंकि इस प्रश्न को जिस एंगल से मैं देख पा रहा हूं उससे तो ये सर्वथा ग़लत ही होगा..

मेरा आशय ये है कि इस प्रश्न के सारे के सारे उत्तर ग़लत ही होंगे..क्योंकि..

इस प्रश्न की प्रासंगिकता ही शक के दायरे में है।

अब मैं, आपसे ही पूछता हूँ कि, दुनियाँ में “जीवन” से बड़ी कोई और चीज़ भला.. है, क्या..?? जिसका कि कोई लक्ष्य हो सके…?

मानव-जीवन ही क्यों..? ‘जीवन’ चाहे किसी भी जीव-जंतु का ही क्यों न हो..??

मेरी नज़र में तो इस दुनियां रूपी दुखालय में “जीवन” ही स्वयं में “एक लक्ष्य” है,अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। फिर भला इसका लक्ष्य क्या होगा..? जीवन तो खुद ही एक लक्ष्य” है।

हाँ, इस वक़्त मुझे एक मंजर याद आ रहा है..

कि बचपन में हम लोग जब शाम को खेल के मैदान पर खेला करते थे..तब हमारे परिवार के बड़े हम बच्चों को एक रेस का कॉम्पटीशन देते थे..

कहा जाता.. कि चलो ! आओ बच्चो! तुम्हारे बीच एक “नींबू-चम्मच” रेस कराते हैं..

इसमें होता क्या था कि,एक समय में ट्रैक पर अधिक से अधिक तीन या चार बच्चे ही रेस में भाग लिया करते थे..

मग़र शर्त ये होती थी कि, “नींबू” चम्मच पर से किसी भी स्थिति में गिरना नहीं चाहिए..

हर प्रतियोगी को इस बात का विशेष ध्यान रखना होता था कि, शर्त को ध्यान में रखते हुए.. अपने प्रतिद्वंद्वी से कम समय में रेस के अन्तिम-पड़ाव पर पहुंचना होगा..तब कहीं रेस को जीतने की स्थिति बनती थी। और यदि किन्हीं कारणोंवश नींबू चम्मच से गिर गया तो शर्त के मुताबिक वह खिलाड़ी रेस से बाहर कर दिए जाता था।

क्या आपको नहीं लगता.. हमारी पूर्व-पीढ़ियों के “जीवन मार्ग” से कुछ भटक जाने के कारण.. यहां कुछ इस तरह का वातावरण बन गया है कि, संसार में आने के बाद होश सम्भालते ही हम सभी अपने आप को स्वतः ही न केवल “जीवन की इस रेस” में शामिल..अपितु ट्रैक पर खड़ा हुआ पाते हैं।

मेरे विचार से आप भी इस बात से इत्तिफाक रखते होंगे कि, संसार की ‘पूर्व-निर्धारित-व्यवस्था’ के अन्तर्गत सभी जीवों को अपने विकास के लिए “फ्री-विल” अर्थात ‘स्वतंत्र-इच्छा’ का प्रावधान है।

मग़र यहां बच्चों की “नींबू-चम्मच” वाली रेस की तरह ‘जीवन’ की इस रेस में भी एक शर्त है..

आप ‘जीवन’ की रेस में जीतने के लिए अपने सारे प्रयास करें..👍

मग़र “प्रसन्नता” रूपी नींबू आपके “स्वभाव” नामक चम्मच पर से किसी भी परिस्थिति में गिरना नहीं चाहिए.. जीवन के निर्धारित मानकों के दायरे में जीते हुए.. कोई यदि “जीवन-लक्ष्य” प्राप्त कर ले, तो निःसन्देह ही वह प्रशंसनीय है.. 👍

विचारक ; योगेन्द्र सिंह पचहरा, मुखिया परिवार नीमगाँव,राया,मथुरा से..

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