अनौखा आनन्द कहें.. या फिर “परमानंद”
आम-आदमी के लिए आध्यात्मिक-दृष्टिकोण या समूचे विश्व में हर वर्ष मनाए जाने वाला “स्वास्थ्य दिवस” भले ही कोई माने या न माने मग़र इन सब का एक ही मक़सद होता है..कि, जीवन में “सेहत का ख़्याल व मन की प्रसन्नता” ही सर्वोपरि है। बाकी सब.., उसके बाद …
मग़र अफसोस ! जमीनी हकीकत एकदम इसके विपरीत होती है। जैसे,’बाकी सब, पहले ‘सेहत का ख़्याल व मन की प्रसन्नता’ के लिए कभी किसी के पास कोई समय ही नहीं होता..😢
जबकि, ये स्पष्ट है कि, दुनियाँ से कोई एक “सुई” सी चीज न ले के कभी गया है और नहीं भविष्य में कभी ले के जा सकेगा.. भले ही विज्ञान अपनी अक्ल के चाहे जितने घोड़े दौड़ा ले…
किसी के साथ ‘अनुचित क्रिया-कलाप’ ‘अनुचित वार्ता-लाप’ फिर क्यों… ?
क्या ही अच्छा हो कि हमेशा हर जगह सब कुछ ‘उचित” ही हो..?
विचारणीय बिंदु हैं।
दूसरे,
इस वेश-कीमती मानव-जीवन में इतनी भागमभाग फिर किस के लिए..?
जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए “कर्म” करने के पश्चात थोड़ा बहुत लोक-कल्याणकारी कार्यों में हाथ बटाकर मन में संतोष रखते हुए ज़िंदगी की राह पर “जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..” वाले भाव से चलते रहना…ही सार्थक है।
क्योंकि ‘जीवन’ चलने का नाम..है रुकने का नहीं।
इसीलिए सुबह हो या शाम..बस चलते रहें.. ये ही ‘जीवन’का स्वभाव है..
यहाँ मैं, ऐसा सोचता हूँ..कि, प्रारब्ध के वशीभूत हमारा जीवन चाहे ‘सुख’ के दौर से गुज़र रहा हो.. या फिर ‘दुःख’ के, लेकिन इस विचार से व्यक्ति को अपने अन्तर्मन में एक “अनौखा-आनन्द” अवश्य महसूस होता है..? पहले विचार कीजियेगा..तब मनन भी कीजियेगा..पढ़ने के लिए धन्यवाद👍
राधे गोविंद..राधे गोविंद 💐
; योगेन्द्र पचहरा,
जन्मभूमि: नीमगाँव
कर्मभूमि : जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस)