146-“कमजोर-कड़ी”

परिवार,समाज व देश-दुनियाँ के स्तर पर चाहे हम किसी भी भूमिका में हों, जीवन की असल कसौटी ये है कि, हम परिस्थितिवश भी ख़ुद को कहीं ‘कमजोर-कड़ी’ साबित न होंने दें..

इसीलिए हमें समझना होगा : कि, ‘चरित्र’ एक वृक्ष है और चरित्र रूपी वृक्ष के फल और छाया हैं..”प्रतिष्ठा,यश,सम्मान” जो दुनियाँ दे बिच हम सबको चाहिए.. लेकिन विडम्बना इस बात की है कि, दुनियाँ में बहुत कम लोग हैं जो इस ‘वृक्ष’ का ध्यान रखते हैं, अर्थात उसे अच्छे से सींचते हैं,संवारते हैं। मग़र फिर भी अच्छे-अच्छे फल और घणी छाया की अपेक्षा सबको होती है।

क्यों भई! क्यों..? ऐसे लोगों के लिए बड़े बुजुर्गों ने पहले ही बोल दिया है..’बबूल बोने वाले को आम मिलेंगे कहाँ से..?

जब पहले ‘कर्म’ काँटे के किए हैं.. तो आज उन्हें ही गले लगाओ ना!’ अब दूर क्यों भागते हो..! ये एक सवालिया ‘प्रश्न-चिन्ह’ (?) है.. ऐसी “कमजोर-कड़ी” कहीं हम स्वयं ही, तो नहीं हैं..? विचारणीय है…

राधे गोविंद..राधे गोविंद

मेरे पाठकों और सभी शुभचिंतकों का दिन मंगलमय हो…👍

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