मुझे पैदल चलना बहुत ही अच्छा लगता है। एक दिन की बात बताऊं घूमते-घूमते मैं, आदर्श-कॉलोनी की तरफ शहर में काफ़ी अंदर तक चला गया, फिर पैदल घर की ओर ही आ रहा था। कि रास्ते में बिजली के खंभे पर एक कागज चिपका हुआ था। अचानक मेरी नज़र उस पर पड़ी। पास जाकर देखा, तो उस पर लिखा था कि,
“इस रास्ते पर कल मेरा एक 50/- रु.का नोट गिर गया था। चूंकि मैं वृद्ध के साथ-साथ एक असहाय महिला हूँ। ये भी किसी मददगार ने दिये थे। इसलिए ये 50 रु मेरे लिए बहुत कुछ हैं। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। अतः जिस किसी भी महानुभाव को मिले कृपया इस पते :–>[xxx] पर पहुंचाने की कृपा करें।”
विशेष ;- कृपया मानवता के नाते ये “नेक-कार्य” अवश्य करें।
यह पढ़कर पता नहीं क्यों..? क्या ईश्वर कृपा हुई कि, मेरे हिर्दय में उस पते पर जाने की तीब्र-इच्छा होने लगी। पते के मुताविक मेरे कदम स्वतः उस ओर चल पड़े..एक काफ़ी संकरी सी गली के आखिर में एक आशियाना था। वहाँ जाकर मैंने आवाज लगायी, तो..
(एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई , ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वह अकेली ही रहती हों। लग रहा था उन्हें ठीक से दिखाई तक नहीं देता।
शायद उन्होंने भी, अनेकों हिंदुस्तानी भाइयों की तरह अपने बेटों को वो “तालीम” दिलवा दी थी जिससे मनुष्य सारे रिश्ते-नाते, हया-शर्म एवं दया-संवेदना आदि सब मानवीय गुणों को भूल कर सिर्फ “नोट छापने की मशीन” बन के रह जाता है। जिससे आज एक मां को मातहतों के जैसे अपना जीवन काटना पड़ रहा है। देखो कर्मों की क्या विडम्बना है ! माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा देते हैं, और ये औलाद है कि शादी के बाद अपनी दुनियाँ का दायरा सिर्फ “अपने बीबी बच्चों” तक ही निश्चित कर लेते हैं।
मैने, बाद में पूछा तो, मेरा अनुमान सही था। वर्षों पहले अच्छी नौकरी के चक्कर में उनके दोनों बेटे एक एक कर विदेश चले गए, वहीँ बस गए। तब से आज तक किसी ने भी पलट कर माँ की ओर नहीं देखा..?)
हां, मैंने कहा, “माँ जी आपका खोया हुआ 50/-रु का नोट मुझे मिला है। मैं उसी को देने आया हूँ।”
यह सुनकर, वह वृद्ध “देवी-तुल्य” माँ एकदम से रोने लगी… ये देख मैं भी कुछ भावुक सा हुआ..
फिर कुछ देर बाद वो बोली,
“बेटा ! तेरे जैसे अब तक करीब 50-60 लोग इसी तरह मुझे 50-50 रु के नोट दे कर जा चुके हैं,न तो मै पढ़ी-लिखी हूँ, न ही मुझे ठीक से दिखाई देता है। पता नहीं कौन फरिश्ता है जो मेरी इस हालत को देखकर “मदद” करने के उद्देश्य से ये सब लिख गया है। जो तुम जैसे देवदूत लगातार मेरी सहायता को चले आ रहे हो।”
मेरे बहुत कहने पर माँ जी ने वो रुपये रख तो लिए। पर उन्होंने मुझसे निवेदन करते हुए कहा, बेटा! वह मैंने नहीं लिखा है। क्योंकि मैं तो एक असहाय अनपढ़ हूँ। किसी ने मुझ पर तरस खाकर ये लिख दिया होगा । मग़र बेटा अब मेरे “खर्चने” के लायक लोग काफ़ी रुपये मुझे दे गए हैं। बेटा तू, जाते-जाते अब उस कागज़ को फाड़कर फेंक देना। भला मैं इतने रुपयों का क्या करूंगी..? ( एक माँ का संतोषी स्वभाव तो देखिये…)
‘मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी “माँ जी” ने शायद यही कहा होगा। लेकिन किसी ने भी उस कागज़ को फाड़ने की हिमांकत नहीं की।, तो फिर मैं, ही क्यों किसी के “नेक-कार्य” में दख़ल दूँ।
जिंदगी में हम कितने सही और कितने गलत हैं, ये सिर्फ दो ही जगह अंकित होता है।..
परमात्मा के यहाँ और अपनी ख़ुद की अंतरात्मा..में !!
मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति “कृतज्ञता” से लबालब हो गया, जिसने इस वृद्धा की सेवा का ये “नायाब-तरीका” ढूँढ निकाला था।
यदि जरूरत मंदों की कोई मदद करना चाहे, तो बहुत से मार्ग हैं , बस “सोच का दायरा” बढ़ा होना चाहिए। इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई.. और मांफ कीजियेगा मेरी अंतरात्मा ने एक माँ का निवेदन नहीं माना.. अर्थात मैं उस कागज को नहीं फाड़ सका।
मदद करने के उपाय तो कई-एक हो सकते हैं..सिर्फ व्यक्ति के हृदय (मन) में “कर्म” (अकर्म) करने की “तीव्र-इच्छा” का होना पहले आवश्यक है।
यहां मेरा खुद का ऐसा मानना है कि,
“कुछ नेकियाँ एवं अच्छाइयां”
“मानव-जीवन” हमें चुपके से ऐसी भी करते रहना चाहिए, जिनका ईश्वर के सिवाय..इस भू-लोक पर..
कोई “अन्य गवाह्” ना हो…!!
“ताकि “लोकप्रियता” के बाद मन में उत्पन्न होने वाले “अहम” से अपने आप को दूर रख सके।
धन्यवाद ; सभी को नमस्कार
युग पचहरा,
जन्मभूमि: श्री साहब सिंह (मुखिया जी) सदन, नीमगाँव
रेजीडेंस: पचहरा-हाउस, 88 A वसुन्धरापुरम, हाथरस।
【शिक्षक एवं विचारक】
contact No.
(8006943731)
लाजवाब सर् जी
LikeLike
Thanks Awasthi ji
LikeLike