उत्तर प्रदेश की ए श्रेणी में सुमार की जाने वाली संस्था जो अपनी अच्छी परम्पराओं के लिये लगभग पिछले आठ दशकों से जानी जाती है। ये वो संस्थान है, “जहाँ परम्पराएँ सदैव कानून से बढ़कर रहीं हैं।”
जी, वही माँ सरस्वती का मन्दिर जो आगरा – अलीगढ़ हाई वे पर सासनी में प्रवेश करते ही “करोड़ी लाल जैन इंटरमीडिएट कॉलेज,सासनी अर्थात “के.एल.जैन के नाम से स्थिति है। जिसका मैं भी एक छोटा सा पुजारी हूँ।
शायद मेरा कोई पूर्व-प्रारब्ध उदय हुआ होगा, जो 15 अगस्त,1994 दिन सोमवार को मुझे इस आदर्श संस्था में एक शिक्षक के रूप में तैनाती मिली, कुछ दिन बाद कक्षा में ‘शिक्षण-कार्य’ करते..करते मैंने महसूस किया कि कुछ विद्यार्थी पढ़ने में तो कहीं तक ठीक हैं। लेकिन उनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं हैं।
मग़र ये भी सत्य है कि, “महानता का पुष्प” हमेशा अभाव की दुर्गम पहाड़ियों पर ही खिला करता है।
व्यक्तिगत तौर पर एक शिक्षक का असली गुण “मित्रवत-व्यवहार” के जरिये धीरे-धीरे अपने छात्रों के दिल के करीब होते चले जाना है।
जब मैंने ऐसा महसूस किया,तो मैं अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के अतिरिक्त स्नेह, सहानुभूति, कुछ नैतिक एवं मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ
कैरियर के प्रति भी उन्हें थोड़ा थोड़ा जागृत..करता गया। इसके लिए मेरे अंदर अपने आपको अपडेट रखने की जिज्ञासा पनपने लगी।
अपने छात्रों के लिए जानकारियाँ जुटाने के लिहाज़ से मैं वक्त मिलते ही कॉलेज की लाइब्रेरी में जाकर कुछ ऐसी पुस्तकें खंगालने लगा.. जो व्यक्ति के ‘दिमांग की ऊँचाई’ बढाने में सहायक होती हैं।
क्योंकि कि छात्रों के ‘हिर्दय की गहराई’ बढ़ाने.. उन में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का समावेश करने.. और विद्यार्थियों के कोमल मन में अच्छे संस्कार..स्थापित करने के पहले “शिक्षक” में “समर्पण भाव” का होना नितांत आवश्यक है।
कोई व्यक्ति जब अपना ‘धेय’ निश्चित कर लेता है, तो ही वह एक अच्छा-नागरिक बन कर देश दुनियां की सेवार्थ तैयार हो पाता है।
मग़र छात्रों का आत्मीय रिश्ता भी सिर्फ कुछ ही शिक्षकों के साथ बन पाता है। जो शिक्षक उनके साथ एक हद तक मित्रवत जैसे हो जाते हैं।
वे शिक्षक जिनमें “शिक्षकत्व”(Pedagogy) अर्थात गुरुत्व होता है। जो पढ़ाई के अतिरिक्त कभी-कभी उनकी मनः-स्थिति की खैर-ख़बर भी ले लिया करते हैं। जैसे;
निर्धन छात्रों में फीस वक़्त पर न दे पाने की खिन्नता,अक्सर बनी रहती है।
गरीब-छात्रों का कॉलेज के लिए प्रोपर यूनिफार्म में न आना.. सुबह ईश वंदना के दौरान सबके सामने दण्डित होने का भय,
पुस्तकें आदि न होने पर कई बार कक्षा से निकाले जाने की विवशता..
आदि कुछ चीजें बड़े विद्यालयों में भले ही एक रूटीन चेक अप में आती हैं। मग़र ऐसी व्यवस्थाएं आर्थिक रूप से बेवश छात्रों की कुछ चिंताएं अवश्य बढ़ा देती हैं।
जिससे न केवल उनकी पढ़ाई बाधित होती है। वल्कि उनका अंतर्मन भी काफ़ी कुपित रहता है।
ये सब आंकलन करने के बाद, धीरे-धीरे उनकी इन समस्याओं के कुछ हद तक निदान में अपनी सामर्थ्य के मुताबिक जितना सहयोग बन पड़ता है हम शिक्षक, एवं हमारे स्टाफ के कई एक लोग..समय समय पर करते रहते हैं ! शायद इससे हम शिक्षकों व स्टाफ मेंबर्स का अपने विद्यार्थियों के साथ स्वतः ही एक “आत्मीय रिश्ता” बन जाता है।
मेरे सेवाकाल के दूसरे सत्र अर्थात जनवरी,1995 में शायद मेरे कुछ पारिवारिक-संस्कारों, दूसरे मेरी पूज्यनीय मां सहित उन सभी गुरुओं ( शिक्षकों ) का आशीर्वाद जिन्होंने मुझे पढ़ाया था व कुछ अच्छी मित्र मंडली की संगति, इन सबसे अधिक शायद ब्रह्ममंडीय संवाद ईश्वर प्रदत्त सद्बुद्धि..आदि से मुझे कुछ ऐसी प्रेरणा होती चली गईं ..कि मैंने अपने खाली पीरियड्स में अपनी दिनभर की सभी कक्षाओं के ‘पुअर’ बट ‘लेबोरियस’ स्टूडेंट्स को किसी खाली क्लास रूम में बैठाकर उनके कमज़ोर चैप्टर्स में मदद करना शुरू कर दिया..
हालांकि हमारे विद्यालय में अधिकतर शिक्षकों द्वारा “अतिरिक्त-कक्षाओं” का चलन बहुत पहले से है।
इस “जन-कल्याण” सम्बन्धी कार्य में अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पित होकर तन्मयता से जुटे रहना ही शायद किसी शिक्षक को
“A teacher by choice”
की परिधि में लाता है।
इस सब से मेरे मन को जो सुकून मिलता है। शायद उसे शब्दों में, कभी बयां नहीं किया जा सकेगा।
हाँ, सौभाग्यवश जब कभी उन मेधावियों या उनके संरक्षकों से, ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर यकायक भेंट हो जाती है, तो उस वक्त एक शिक्षक का अन्तर्मन गदगद जाता है।
मेरे जीवन की “असल कमाई” बिना किसी ‘अपेक्षा’ के इन मेधावियों के ह्रदय की वो “गहराई” है। जिन्होंने एक “शिक्षक” को उसमें जगह दी है। इसके लिए.. कम से कम मैं, तो उनका सदैव आभारी रहूंगा।
शायद ऐसे प्रेम को विद्वानों ने अपनी भाषा में “अनकंडीशनल-लव” अर्थात ‘बिना शर्त वाले प्रेम’ की संज्ञा दी हुई है।
एक बार की बात बताऊँ, मेरे कुछ अज़ीज शिष्यों में से कॉलेज छोड़ने के बहुत दिनों बाद अपना कैरियर सेट हो जाने पर उसी आत्मीय-रिश्ते से जुड़े हुए कुछ ओल्ड-बॉयज का “एक पुराना ग्रुप” मुझसे मिलने मेरे “88-A वसुन्धरापुरम, हाथरस” वाले घर पर अचानक चला आया।
इस बात के लिए वे सभी बधाई के पात्र हैं।
क्योंकि आज वे अच्छे कैरियर के साथ साथ लगभग देश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। जैसे; लेक्चरर, यू .पी. पी.सी.एस., एम.पी. पी.एस.सी.,राजस्थान आर.ए.एस., लोअर पी.सी.एस., इंजीनियर्स, डॉक्टर्स,प्रोफेसर्स आदि।
जब वो आये, तो मैं बहुत सरप्राइज था! हाँ, मुझे अच्छा लगा कि, वे अपने शिष्य स्वरूप में ही आए थे वरना, उनके पदों के प्रोटोकॉल के अनुसार एरिया वाइज पुलिस के सायरन-वायरन के साथ आए होते,तो उनके साथ इतने इत्मीनान से बैठ कर बात भी नहीं हो पाती।
जब ड्राइंग रूम में बैठ गए..,तो मैंने, शुरुआत उनके “रूटीन वर्क ” के साथ की, औऱ उनसे मेरा सबसे पहला सवाल यही था कि,
आज आप जहाँ भी हैं, संतुष्ट हैं..?
धीरे-धीरे डिस्कशन आगे बढ़ा.. बात लाइफ में बढ़ते “तनाव” और
सत्तासीनों के हस्तक्षेप से आज हर विभाग में काम के अनावश्यक “दबाव” की जो जमीनी हकीकत है। बात उस पर आ गई, जो अब शायद हर विभाग के लिए एक सामान्य सी बात हो गई है।
इस मुद्दे पर सभी एक मत थे कि, भले ही वे अब आर्थिक एवं समाजिक रूप से काफी सम्पन्न.. एवं देश व प्रदेश के महत्वपूर्ण ओहदों पर काबिज़ हैं..,
फिर भी वे लगभग एक सुर में बोले, गुरुदेव !
अब हमारी जिंदगी में सुकून व आनंद तो नहीं रह गया है, जिसकी अपेक्षा आम या खास हर इंसान को होती है।
मैं, शुरू से ही बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहा था।………..लेकिन “अतिथि देवो भव..” के विचार से..
फिर अचानक मैं एक बहाना करके उनके बीच से निकला, और थोड़ी देर बाद लौटकर उनको ड्राइंग-रूम से डाइनिंग-हॉल में चलने का आग्रह करते हुए.. बोला! चलो! अब आप सभी डाइनिंग हॉल में आइए ..
डायनिंग-हॉल में बैठते ही मैंने कहा!
“प्रिय मित्रो!
इस बात के लिए..मैं क्षमा चाहूंगा..आप सब के इस “सरप्राइजिंग-आगमन” से पूर्व मैडम ‘नीरज चौधरी’, जिनका नाम घर की नेम प्लेट पर देखकर..आप एक बार को मेल कैंडिडेट समझकर थोड़ा कन्फ्यूज हो गए थे, वे आपकी आंटी कॉलोनी के ही मन्दिर पर भागवत सुनने गई हुई हैं। ऐसी स्थिति में उनको डिस्टर्ब न करने के भाव से..
आपके लिये जैसी भी बना पाया हूं.. गरमा-गरम “स्वीट-कॉफी” मैंने तैयार कर दी है। इसलिए आप लोग कॉफी में कोई मीन मेक न निकालते हुए..
अब प्लीज “कपबोर्ड” से अपने लिए कप उठाने का तकल्लुफ स्वयं ही कर लीजियेगा….
हमारे “पुरातन-छात्र” जो “वर्तमान के ऑफिसर्स” हैं। बिना किसी तकल्लुफ़ के फ्रैंकली उठे….
किचन में कई तरह के कप रखे हुए थे,
सभी अपने लिए “अच्छे से अच्छा” कप उठाने में जुट गए।
किसी ने “क्रिस्टल का शानदार कप” उठाया, तो किसी को “पोर्सिलेन का कप” पसंद आया….. किसी ने “कांच का,तो किसी ने चीनी मिट्टी का कप” उठाया।
जब सभी ने अपनी अपनी पसंद के प्यालों में मेरी बनाई हुई “स्वीट-कॉफी” ले ली।
तब मैंने कहा!
अगर आपने ध्यान दिया हो तो, कपबोर्ड में जो “कप” दिखने में अच्छे क्या..जो मँहगे थे,
आपने उन्हें ही चुना..है !!
और साधारण दिखने वाले कप की तरफ आप में से किसी ने देखा तक नहीं….है।
क्या आपको नहीं लगता ! अपने लिए “सबसे अच्छे की चाह रखना..” आज के लोगों का एक स्वभाव सा बन गया है।…..
मेरे ख़्याल से यही वो “एक चीज़ है”
जो हमारी जिंदगी में आये दिन “समस्याएंँ” और “तनाव” लेकर आ रही है। जिसकी चर्चा आप अभी ड्राइंग रूम में कर रहे थे।
मान्यवर! क्या इस बात से कोई इनकार कर सकेगा कि “कप” के अच्छे या महंगे होने से
“कॉफी” या किसी भी “पेय पदार्थ” की क्वालिटी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता..।
ये “कप” तो बस एक साधन है, जिसके माध्यम से हम “कॉफी” या कोई “पेय पदार्थ” पीते हैं….
दरअसल, आपको जो चाहिए थी…..
वो “स्वीट-कॉफ़ी”, न कि, “कप”
एम आई राइट..?
पुनः मांफ कीजियेगा, आज आप भले ही ऑफिसर्स हैं,
मग़र अभी भी आप एक “सामान्य मानसिकता” के शिकार हैं।
क्योंकि आप सभी सबसे अच्छे कप के पीछे.. ही गए ..?”
इसी दौरान एक और बात मैंने ऑब्जर्व की, अपनी चॉइस का अच्छा “कप” लेने के बावजूद भी आप संतुष्ट नहीं हुए..? बल्कि चुपके-चुपके तुलनात्मक नज़रों से दूसरों के “कप्स” भी निहार रहे थे.. कि किसने कैसा कप लिया है..??
अब मेरी एक बात ध्यान से समझिए…
“ये ” जिंदगी” भी बिल्कुल इस “कॉफ़ी” की तरह ही है…..
ठीक उसी प्रकार हमारी नौकरी, पैसा, पोजीशन,
“कप” की तरह हैं।
लेकिन सदैव ध्यान रहे.. ये पोजिशन, पैसा..रुतबा आदि। बस “जिंदगी जीने के ‘साधन’ मात्र होते हैं।
इन्हें कभी “ज़िन्दगी” समझने की गलती मत कर बैठिएगा। और यदि कभी ऐसा हुआ, तो बहुत बड़ी भूल हो जाएगी।
दूसरी बात हमारे पास कौन सा “कप” है…..?
ये ना तो हमारी जिंदगी को “डिफाइन” करता है और ना ही हमें वैचारिक स्तर पर “ट्रांसफॉर्म” करने की सामर्थ्य रखता है।
इसीलिए
यदि चिंता कभी करो भी, तो सिर्फ “कॉफ़ी” यानी “जिंदगी” की।
“कप” की, तो कभी नहीं ।
दुनिया के सबसे खुशहाल
लोग वे नहीं होते ,
जिनके पास सब कुछ
सबसे बढ़िया अथवा ब्रान्डेड होता है…..
वल्कि खुशहाल वे लोग कहीं अधिक होते हैं, जिनके पास जो भी होता है,
वे उसका इस्तेमाल न सिर्फ “बड़े-अच्छे” से करते हैं, अपितु फुल एन्जॉय के साथ करते हैं।
वे जीवन को भरपूर तरीके से जी..ते हैं…….! आम लोगों की तरह ढोते नहीं !
इतिहास गवाह है। ऐसे लोग दुनियाँ की अंधी दौड़ में न तो कभी शामिल हुए हैं और न कभी होंगे।
इसीलिए, बन्धुवर! सदा हंँसते-मुस्कराते रहें.. और जीवन को पूरी सादगी एवं सिद्दत के साथ जियें
“प्रत्येक जीव” में “स्वयं” को देखें, ताकि पाप-कर्म से बचे रहें। सबसे प्रेम करें…..प्रति “पल” जी..ने का प्रयास करें।
धन्यवाद
: योगेंद्र सिंह पचहरा,
के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।
Shi baat hai sir je
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you are always right Sir ji
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Thanks
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Thanks अर्जुन पंडित
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सर आप बहुत महान हो 🙏🙏
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वेशक, मग़र आप जैसे अच्छे शिष्यों की बदौलत👍
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