50-रुको,ठहरो ! ज़रा..सोचो

माँ शारदे को नमन करते हुए, आज मैं, अपनी बात की शुरुआत सम्पूर्ण विश्व को संचालित करने वाली उस “परम-शक्ति” जिसे हम मनुष्य आत्माएं अपनी अलग-अलग धारणा, आस्था एवं मान्यताओं के कारण भिन्न-भिन्न धर्मों के चलते अनेक नामों से जानते हैं।

लेकिन मुझे यकीन ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि इस “तुलनात्मक-अध्ययन” को समझने के बाद लोगों की भ्रांतियां क़ाफी हद तक दूर हो जाएंगी।
क़ुरान शरीफ़ में ख़ुदा क्या है..क्या है परवरदिगार..?
“वल अव्वल, वल आख़िर।
वल ज़ाहिर,वल बातिन,
वहुवा वकुल्लई, शइन अलीम।”

हिंदी-अर्थ– वल अव्वल-वह सबसे पहले है।,
वल आख़िर-वही सबसे अंत में भी है।
वल ज़ाहिर-जो भी कुछ दिख रहा है वह सब वही है।
वल बातिन- जो हम देख पा रहे हैं केवल वही नहीं है..(जैसे;- किसी बड़ी चीज को हम देख रहे हैं मग़र उसके ओट में जो हम नहीं देख पा रहे हैं क्या वह हिस्सा होता नहीं है।अवश्य होता है.. विल्कुल ठीक वैसे ही..)
वहुवा वकुल्लई शइन-अलीम- “हर बात को जानने वाला ” अर्थात वो ही “परवरदिगार” है।

वेद क्या कहते हैं..? भगवान के हज़ारों नाम हैं…”अनादि न अंतः
व्यक्ता अवक्ता:
वहुश्रुता: सर्वज्ञ:”

हिंदी-अर्थ– अनादि है न अंतः-जिसका न आदि है न अंत है।
व्यक्ता अवक्ता: -जो व्यक्त हैं वो भी और जो अव्यक्त है वो भी। सब कुछ वही है।
बहु श्रुता सर्वज्ञ: – सबकुछ जानने वाला।
जो “चेतना” का श्रोत है। दरअसल वही “परमात्मा” है।

बाइबिल क्या कहती है..?
” I am the alpha.
End the omega
हिंदी-अर्थ- आदि और अंत में (First & the last) जो कुछ हूँ.. मैं ही हूँ।

मेरा इस विषय पर लिखने का मकसद एक ही है कि भारतीय समाज में जबरदस्ती बन बैठे हर मज़हब में कुछ ठेकेदार जो दिन प्रतिदिन अपनी मनगढ़ंत कहानियों से वैमनष्यता फैला कर लोगों में बहुत सी भ्रांतियां पैदा कर रहे हैं..मग़र ये भ्रांतियों इस Comparative- Study से काफी हद तक दूर हो सकती हैं। यदि इन धर्मों के बताए हुए मूलमन्त्र को समझ कर हम चलें…
ख़ुद को किसी भी मज़हब की दृष्टि से देख कर आप विचार करियेगा…कि, आप किससे लड़ रहे हो..? और क्यों लड़ रहे हो..? आख़िर हम जड़ में क्यों नहीं जाते..?
उन बातों में जो समानता है, एक रूपता है। परवरदिगार, कहो या परमात्मा या फिर “सार-तत्व” परब्रह्म जो भी..

कुल मिलाकर हम गूदे को छोड़कर छिलकों पर लड़ाइयां लड़कर इस अमूल्य “मानव-जीवन” को क्यों बर्बाद कर रहे हैं।
अज्ञानताबस अपनों की जान ले रहे हैं, दुकानें लूट रहे है.. शहर के शहर फूंक रहे हैं। देश के कई राज्यों में तबाही मचा के रखी हुई है ।
सूफ़ी फ़क़ीर भी कहता है…
Un-al-haq-यानी–अहम ब्रह्मास्मि….. ( I am the same..) un-al-haq ये सूफ़ी फकीर बोलते है..
लेकिन हम हैं कि, लड़ने-झगड़ने से बाज नहीं आते। कुछ महानुभाव तो ऐसे लेखों को पूरा पढ़ते भी नहीं हैं, कुछ के पास जीवन के असल पहलू को नजदीक से देखने या समझने के लिए वक्त ही नहीं है। उन्होंने माया की अंधी दौड़ में जो हिस्सा ले रखा हैं।,..फिर सुधार की कोई गुंजाइश कहाँ..बचती है..?
वो कहेंगे ये सब हम पहले से जानते है क़ुरान, वेद, बाइबिल आदि धर्म ग्रँथ तो सब एक ही बात कहते है..
मग़र फिर भी वे अपने सारे कार्य इन पवित्र ग्रन्थों के मूल सिद्धांत से हट कर ही करते रहेंगे। और ये बात जग ज़ाहिर है..” कि कोई भी मज़हब हमें आपस में बैर करना कभी नहीं सिखाता, ये धर्म के ठेकेदार,जिन्हें पाखंडी कह दिया जाय, तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये भोली-भाली जनता को गुमराह करने का काम सिर्फ अपनी दुकान चलाने के लिए करते हैं, और करते रहेंगे, ऐसे पाखंडी हर मज़हब में बैठे हैं। अपनी आने वाली सन्तति को बचाना है, तो
विचार एवं निर्णय आपको और हमको स्वयं “करना होगा” ये न कहें , “करना.. है”..क्योंकि मनुष्य के सॉफ्ट-वेयर (Internal-Forces) में वैचारिक-रूपांतरण (Thoughts-transformation )की प्रक्रिया तो सही बात को सुनते या पढ़ते वक्त स्वतः ही सक्रिय होने लग जाती है। लेकिन लोगों की आत्मा पर जमी कार्मिक-लेयर व कुछ उनके निजी पूर्वाग्रह उन्हें दुविधा में डालने का काम जरूर करते हैं, तो
बस आपको जरूरत है उन्हें दरकिनार करते हुए एक “फाइनल-संकल्प” लेने की। देरी तो पहले से ही बहुत हो चुकी है।
यहां वेद एक और.. बात से पर्दा उठाते हैं कि, परब्रह्म “शक्ति” जिस से संसार संचालित होता है वह स्वतः है स्वचालित है। उसका खुद का कोई रूप या “नियत-आकार” नहीं है। इसीलिए वह “निराकार” है। दुनियाँ के कण कण में वह “GOD-PARTICLE” विद्यमान है।
“न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्थ नामः महाध्यसा ”
अर्थात कोई भी कलाकार उस शक्ति को “एक” मूर्ति रूप में “नियत” नहीं कर सकता। केवल परमात्मा के गुणों एवं चरित्र को प्रतिबिम्बित करने के उद्देश्य से पूर्व में हमारे प्रबुद्ध-जनों ने “प्रारम्भिक-अवस्था” के भक्तों को ईश्वरीय शक्तियों में आस्था व एकाग्रता जगाने के लिहाज से कुछ “प्रतीकात्मक – चिन्ह” बतौर जगह-जगह “सांकेतिक-चिन्ह रूप स्थापित कर दिए थे।
मग़र धर्म की आड़ में बैठे ठेकेदार (पाखंडी) इस व्यवस्था को ले उड़े और ऐसे ले उड़े कि गाँव-गाँव, नगर-नगर मठाधीश बन कर इस व्यवस्था को “एस की जिंदगी जीने” का जरिया बना लिया।
मेहनतकश इंसान की गाड़ी कमाई को दान एवं इष्ट के प्रतीकचिन्ह पर चढ़ावे के नाम से ये ढ़ोंग-ढ़पाड अब इतना आगे निकल गया है कि, इसने कमाई में बिजनिस को भी काफी पीछे छोड़ दिया हैं। बताइये ये सरासर पागलपन नहीं है तो क्या है..? धर्म का चोला पहनकर खुल्लमखुल्ला “अधर्म” हो रहा है।
प्रबुद्ध-वर्ग मेरे कहने का आशय बखूबी समझ रहै हैं कि, मैं क्या कहना चाह रहा हूँ…
वर्तमान भारत में जो समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं और रुकने का नाम नहीं ले रहीं। इस विषय पर..
अगर “To the point” बात करूँ तो मैं काफ़ी दिन से देख रहा हूँ कि,
“अधर्म ने धर्म का लबादा ओढ़ लिया है” और उसी आड़ में सारी सही चीजों को ध्वस्त करता हुआ निरन्तर आगे बढ़ता चला जा रहा है।
और हम भारतीय लोग जाति-धर्मों में ऐसे बंटे हुए.. हैं कि, मूक-दर्शक बने निरीह नजरों से न केवल देख रहे हैं, वल्कि कुछ तो इतनी बेहोशी में हैं कि इस “विध्वंशक-लीला” को सही का प्रमाण-पत्र भी दे रहे हैं। विडम्बना तो देखिये,अधर्म को ही धर्म मानते चले जा रहे हैं।
इसे समझने के लिए थोड़ा इतिहास के पन्नों में झांकिए..इस देश में हमने अपनी बेहोशी में “सती-प्रथा” को एक सही और धार्मिक-परम्परा समझते हुए भारत की असंख्य बेटियों को काफी लम्बे अर्से तक जबरदस्ती मार-पीट कर चिताओं में जिंदा जलाया है। मग़र जब हम जागरूक हुए, तो समझ आया कि, ये तो सरासर पागलपन था।”अधर्म” था। और इस मुद्दे पर हमने सही राह पकड़ ली।
ऐसे ही आज अनेकों कार्य धर्म की आड़ लिए जघन्य पापों को अंजाम दे रहे हैं। खुले आम “अधर्म” हो रहा है। और हम “सती-प्रथा” वाले वक्त की तरह वैसे ही उसे धर्म समझे चले जा रहे हैं।
उदाहरण स्वरूप दीपावली को ही ले लो, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अयोध्या लौटने की खुशी की धार्मिक आड़ लेकर प्रति वर्ष लगभग छह हज़ार करोड़ रुपये का बारूद हमारे ही लोगों द्वारा आसमान में भर दिया जाता है। जो न केवल प्रदूषण देता है, अपितु धन की बर्वादी के साथ-साथ दीपावली पर बोनस के रूप में कई युवाओं और बच्चों के साथ अनेकों दुर्घटनाएं भी देता है, जो किसी किसी को तो जीवन भर के लिए अपंग बना जाता है।
इस बिगड़े हुए रूप को भी क्या आप “धर्म” कह पाओगे..?
जश्न तो मर्यादाओं में रहकर आपसी सौहार्द के साथ मनाये जाते हैं।
धन में इस तरह आग लगाने से तो बेहतर है हम उस दिन देश के असहाय जानवरों, पक्षियों और कुछ जरूरतमंद इंसानों को…
अपनी सामर्थ्य के मुताविक कम से कम एक वक्त का अच्छा भोजन, वस्त्र आदि जरूरतों की ओर ध्यान दिया जाय, तो कम से कम आप अपनी अगली पीढ़ी के लिए दुआएँ तो कमा सकते हैं।

करने को तो इस देश में बहुत कुछ संभावनाएं हैं। बस आवश्यकता है खुद का आत्मावलोकन करके “सही दिशा में कदम”उठाने की।
इस लेख की समाप्ति पर काफ़ी भारी बोझ मेरे सिर से आज उतर गया है। वाक़ई मैं अपने आपको काफ़ी हल्का महसूस कर रहा हूँ। मैं, इस जिम्मेदारी के बोझ तले प्रतिदिन अकेला कुपित होता था। मग़र अपना ये विचार आप से शेयर करके, आज मुझे ऐसा लग रहा है कि मैने आपके कंधों को भी इस जिम्मेदारी में शामिल कर लिया है। अब मैं ही अकेला नहीं हूँ, मेरे असंख्य साथी मेरे देश के साथ हैं। जाति-मजहबों से ऊपर उठकर हम सभी भारतीय भाई-बहनों की ये एक नैतिक जिम्मेदारी है। अब हम सभी राह से भटके हुए उन साथियों से एक साथ बोलें..! “रुको, अब और कितना भटकोगे, ठहरो ! ज़रा..सोचो !”फिर आगे बढ़ो…
!!जय हिन्द जय सनातन!!
Public-writer

:युग,नीमगाँव

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