बड़ों की ‘छत्रछाया’, ‘हमारी संस्कृति’ और ‘हमारे संस्कार’ हम पर बोझ नहीं हैं।
अपितु ये हमारे सुरक्षा कवच हैं। इन्हें बचा कर और सम्भाल कर रखियेगा।
जैसे; अगर आप किसी को नमस्कार ये सोचकर करते हो कि वो भी आपको करेगा, तो ऐसी ‘नमस्कार’ या ‘दुआ-सलाम’ व्यर्थ है। क्योंकि किसी भी प्रकार का आभार/अभिनंदन व्यक्ति अपने अच्छे संस्कारों की वजह से करता है, न कि अहंकार की वजह से .!!
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हिर्दय से प्रणाम/ नमस्कार / वन्देमातरम् आपका दिन मंगलमय हो🙏🙏🌹 ।।
साभार
; योगेन्द्र पचहरा ,
नीमगाँव,राया,मथुरा।
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