155-“जड़-चेतन”

“मन एक जड़ पदार्थ है। जबकि आत्मा चेतन पदार्थ है। जो मनुष्य आत्माएं, इस तथ्य को समझ लेती हैं, स्वामी विवेकानंद के अनुसार केवल वे ही मन को नियंत्रण में रखकर इस जीवन रूपी सल्तनत पर ठीक से राज्य कर पाती हैं। अर्थात वे आत्माएं राजा बन पाती हैं। और यदि कुछ आत्माएं ये नहीं समझ पाती हैं, वे जीवनपर्यंत मन का गुलाम बनने के लिए मजबूर रहती हैं।

संसार में दो प्रकार के पदार्थ होते हैं।

जड़ और चेतन

“जड़ पदार्थ में अपनी कोई इच्छा, स्वयं कुछ क्रिया करने की योग्यता, ज्ञान आदि गुण नहीं होते।

जबकि चेतन पदार्थ में ये सब गुण होते हैं।

चेतन पदार्थ अपनी इच्छा से, अपने ज्ञान से स्वयं क्रियाशील हो सकता है।

जैसे, स्कूटर कार हवाई जहाज इत्यादि जड़ पदार्थ हैं। ये स्वयं क्रिया नहीं कर सकते। क्योंकि इन में अपनी कोई इच्छाशक्ति, ज्ञान आदि नहीं होता।

इसलिए मनुष्य आत्मा ही अपनी इच्छा और ज्ञान आदि से इन सब जड़ पदार्थों का संचालन करती है।

मन एक जड़ पदार्थ है। जैसे.. चेतन-ड्राइवर, स्कूटर, कार, रेल, हवाई जहाज इत्यादि जड़ पदार्थों को चलाता है। ठीक वैसे ही “चेतन्य आत्मा” जड़ रूपी “मन” का संचालन करती है।

“मन चंचल,तो होता है मगर इसकी चंचलता उन पर कहीं अधिक हावी रहती है जो धर्म या शास्त्र विरुद्ध रहते हैं। लेकिन कोई भी जड़ पदार्थ स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता। उसमें कोई अपना ज्ञान, एवं प्रयत्न आदि करने की क्षमता होती ही नहीं।”

आत्मा अपनी इच्छा ज्ञान प्रयत्न आदि गुणों से मन को क्रियाशील बनाती है। मन में विचार उठाती है। फिर मन के माध्यम से इंद्रियों को प्रेरित करके इंद्रियों तथा शरीर आदि सब जड़ पदार्थों को सक्रिय करके अपने अनुरूप स्तेमाल करते हुए लाभ लेती है।

“यदि हम मनुष्य इस बात को ठीक से समझ लें, मन और बुद्धि दोनों को अपनी चेतन्य आत्मा द्वारा संचालित होने दें, तो ‘आत्मा’ मन, बुद्धि, इंद्रियों और शरीर आदि लगभग सभी जड़ पदार्थों का राजा बनकर शासन कर सकेगी।

तब इन सभी वस्तुओं का संचालन करके आपका जीवन न केवल सुखमय बल्कि आनंदमय हो जायेगा।”

परंतु आजकल लोग इस बात को न तो ठीक से जानते हैं और नहीं समझते हैं।

“अधिकांश लोग जो जीवन की सही राह से भटके हुए हैं..वे मन को ही ‘चेतन’ पदार्थ समझ बैठते हैं। ये ठीक वैसे ही है जैसे ये कॉमन सी बात कि, चंद्रमा में अपना कोई प्रकाश नहीं होता वह सूर्य के प्रकाश से चमकता हैं। वैसे ही ये मन भी सदैव चेतन्य आत्मा से चलता है। लेकिन कितने लोगों के जहन में ये तथ्य सही रूप में हैं..?

इसलिए वे अपने अज्ञान के कारण पहले तो मन को चेतन मानकर उसे क्रियाशील कर देते हैं, मन में ढेर सारी इच्छाएं उत्त्पन्न कर लेते हैं, ढेर सारी योजनाएं बनाते रहते हैं, और फिर अपनी अविद्या या मूर्खता के कारण मन को चेतन मानकर उसके दबाव से उन इच्छाओं की पूर्ति में लग जाते हैं जो एकदम निरर्थक हैं।

जैसे; उदाहरण के तौर पर कोई ड्राइवर पहले तो स्वयं कार को बहुत तेज चला देता है। फिर जब कार नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तब वह उसे रोकने की कोशिश करता है। परंतु कार में गति का दबाव इतना अधिक होता है, कि वह चाहते हुए भी कई बार उसे रोक नहीं पाता। तब कार का ड्राइवर ऐसा अनुभव करता है, कि कार उसको नहीं चला रहा, बल्कि अब कार उसे घसीटकर लिए जा रही है। इस स्थिति का दोषी कार नहीं, बल्कि वही ड्राइवर ख़ुद होता है जिसने उसकी ऐसी स्थिति बनाई है।” ठीक वैसे ही अज्ञानी लोग अपने मन को उस “अनियंत्रित कार” वाली स्थिति में पहुंचा देते हैं फिर.. असहज होने पर.. परेशान होते हैं।

दरअसल, होता क्या है अज्ञानी लोगों की

आत्मा पहले तो मन को बहुत तीव्र गति से चलाती है। उसकी चंचलता में फंस जाने पर एकबार को रोकना चाहती भी हैं, लेकिन तब तक मन इतना अनियंत्रित स्थिति में हो चुका होता है, कि आत्मा उसे चाहते हुए भी रोक नहीं पाती।

“जैसे ड्राइवर कार को चलाता है, कार ड्राइवर को नहीं। ऐसे ही चेतन आत्मा मन को चलाती है, मन आत्मा को नहीं।”

अनियंत्रित स्थिति का दोषी मन नहीं, बल्कि आत्मा ही होती है। इस स्थिति में व्यक्ति ऐसा अनुभव करता है कि, जैसे वह मन को नहीं चला रहा, बल्कि मन उसे घसीटे चला जा रहा है। क्योंकि यहां पर आत्मा मन के वशीभूत हो जाती है यह सब स्थिति आत्मा की अपनी अविद्या के कारण ही उत्पन्न होती है। कृपया हमें आत्मा की अविद्या से बचने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।

इस प्रकार गंभीरतापूर्वक इस सत्य को समझ कर यदि आप अपने मन को नियंत्रित रखें, तो ‘जीवन’ अवश्य सुखमय हो जाएगा ।

“अब आप शरीर तो धारण कर ही चुके हैं। मन इंद्रियां आपके पास हैं, और आप प्रतिदिन इनका संचालन भी कर रहे हैं।

यदि आप मन को जड़ पदार्थ समझते हुए अपनी इच्छा अनुसार इसका संचालन करें, तो यह आपके ‘नौकर की तरह’ काम करेगा। और यदि ऐसा नहीं समझेंगे, तो यह आपका ‘राजा बन बैठेगा, लेकिन अयोग्य राजा.. ये आप जानते ही हैं कि, जब किसी कारण अयोग्य को किसी स्तर पर तैनाती मिल जाती है, तो क्या होता है। ठीक उसी प्रकार वह स्वयं ही अपनी अविद्या के कारण इस मन के पीछे घिसटते हुए चला जाता है।, और अनेकों दु:ख भोगता है।” तो मेरा ऐसा मानना हैं कि, क्यों न समय रहते सही तथ्य को समझकर जीवन का संचालन उचित तरीके से किया जाय..

राधे गोविंद राधे गोविंद

धन्यवाद👍

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