154 “पुरुषार्थ”

आपको मालूम है, “क्रिया” केवल वर्तमान काल में ही होती है। न भूतो न भविष्यति”

जब ‘क्रिया’ होकर समाप्त हो जाती है, तब वह वर्तमान से भूतकाल में जरूर चली जाती है।

उसी प्रकार जब ‘क्रिया’ शुरू भी न हुई हो, सम्भवतः हो..ने वाली हो, तब वह ‘भविष्यत-काल’ के आवरण में प्रस्तुत की जाती है।

मग़र सक्रिय रूप में ‘क्रिया’ सदैव, होती “वर्तमान-काल” में ही है।

कायदे से जो व्यक्ति अपने जीवन में निरन्तर ‘पुरुषार्थ’ करता है उसका भविष्य उज्जवल होता है। और भूतकाल में रूपान्तरित हुआ उसका पुरुषार्थ अन्य लोगों के लिए प्रेरणादायी..भी होता है।

उदाहरण के तौर पर जैसे कोई व्यक्ति कहता है,

“उसने भोजन लिया।” यहां खाने की ‘क्रिया’ समाप्त हो गयी।

यह भूतकाल है। और उसी प्रकार दूसरा वाक्य में,

“वह भोजन लेगा।”

इसमें खाने की ‘क्रिया’ अभी शुरू ही नहीं हुई.. सम्भवतः हो..गी। ये भविष्यत-काल है।

इसीलिए,

समय की गति के कारण ‘क्रिया’ वर्तमान से भूत व भविष्य में रूपान्तरित जरूर हो जाती हैं।

“वह भोजन खाता है।”

ये ‘क्रिया’ वर्तमान काल में है। जो एक दार्शनिक सिद्धांत है।

अब आप गौर कीजियेगा.. जो आपके जीवन में समस्याएं आती हैं, उनको हल करने के लिए इस दार्शनिक-सिद्धांत के आधार पर व्यक्ति को “पुरुषार्थ” करना ही चाहिए, या कोई न कोई “क्रिया” करनी ही होगी।

दरअसल, व्यक्ति द्वारा की गई सकारात्मक “क्रिया” या”कर्म” को ही “पुरुषार्थ” कहा गया है।

और ये “क्रिया या पुरुषार्थ” जो भी कहें.. वह सदैव ‘वर्तमान-काल’ में ही होता है।

वास्तविक ‘क्रिया’ तो वही है, जो इंसान के भविष्य को संवारती है।”

दूसरे, बीते हुए समय को तो आप बदल नहीं सकते। वह तो बीत गया, और अनुभव देकर चला गया।

अतः प्रत्येक जीवन का ठोस आधार वर्तमान का “पुरुषार्थ” होता है।

इसलिए यदि आप अपना भविष्य सुधारना चाहते हैं, तो आपको वर्तमान काल में किए जाने वाले ‘पुरुषार्थ’ के प्रति सकारात्मक होने के साथ-साथ ईमानदार एवं पूर्ण समर्पित होना होगा।

ध्यान रहे.. ‘पुरुषार्थ’ किये बिना.. केवल योजनाएं बनाते रहने से सुखद परिणाम न तो कभी आए हैं और न कभी आएंगे।

संसार की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए जीवन को कठिन बनाने वाली समस्याओं पर पहले से विचार करें

“जैसे भूख-प्यास, आंधी-तूफान, बाढ़-भूकंप, महामारी, मंहगाई और बुढ़ापा आदि..से

ठीक तरीके से और समय से निपटने के लिए एक निश्चित रणनीति के तहत तैयारी करनी होती है। वो भी वर्तमान में..

यहाँ मेरा अनुभव कहता है कि,

“जिसने अपना वर्तमान सम्भाल लिया..उसे बीस फीसदी खुदके प्रारब्ध या पूर्व-संस्कारों के अतिरिक्त जीवन में कोई अन्य प्रभावित नहीं कर सकेगा। लगभग अस्सी फीसदी ‘वर्तमान-पुरुषार्थ’ के बल पर वह अपने भविष्य की तरफ से निश्चिन्त भी हो सकेगा।

मग़र यहाँ मैं, अपने बड़े-बुजुर्गों के अनुभव से भी पूर्ण सहमत हूँ कि,

कई बार ये अदृश्य सा बीस फ़ीसदी “प्रारब्ध” लोगों के जीवन में ऐसा भारी पड़ जाता है कि, सबकुछ तहस-नहस कर जाता है। ‘जब आँख खुली तभी सबेरा’ वाले सिद्धांत के आधार पर..

हम सबको अपने ‘कर्म’ की चाल हर हाल में सही रखनी चाहिए.. ऐसा सबक दे जाता है।

“यदि आपका वर्तमान “पुरुषार्थ” करते हुए बीत रहा है, तो आपका भविष्य काफ़ी सुरक्षित है।

जिस प्रकार आप आने वाले वक्त में सुरक्षित यात्रा करने के लिए पहले से ही अपना रेलवे या विमान आदि के लिए रिजर्वेशन करवा लेते हैं। तो उस रिजर्वेशन से आपकी यात्रा न केवल सुखद वल्कि सुरक्षित एवं तनावमुक्त भी हो जाती है।

ठीक वैसे ही जीवन के सभी क्षेत्रों में हमें समय से उचित पुरुषार्थ करना होगा।

पढ़ने के लिए.. आपका बहुत-बहुत 👍 धन्यवाद

3 thoughts on “154 “पुरुषार्थ””

  1. 🙏🏻🙏🏻बहुत खूब श्रीमान जी 🙏🏻🙏🏻
    श्रीमान जी मुझे बहुत ख़ुशी होती है कि,
    जब मैं सोचता हूं कि मेरे प्रिय गुरु जी आर्टिकल
    लिखते है मैं उनके द्वारा विद्यालय में पढ़ता हूं 🙏🏻🙏🏻🌹🌹🌹🌹🌹

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