मेरा यानी ‘योगेन्द्र पचहरा’ का देश के “प्रबुद्ध-वर्ग” को कर बद्ध निवेदन है कि, इस साल गिफ्ट की अदला-बदली छोड़ ..कुछ नया विचार करें..👍
मीडिया के हाथों की कठपुतली न बनें..जनता-जनार्दन अपने खुद के विचार से चले और अपना जीवन अपने तरीके से जिये..
पिछले कई दशकों से जो एक परम्परा चल पड़ी है कि, विज्ञापनों के द्वारा जनता के जहन में वो भर दिया जा रहा है जो बड़ी-बड़ी कम्पनियां चाहती हैं।
इसीलिये वक्त रहते सम्भल जाएं अपने इस सुंदर जीवन की गाड़ी का रिमोट मीडिया के हाथों में न दें ।
इस “दीवाली” दोस्तों व रिश्तेदारों को एक नये भाव के साथ बिना किसी गिफ्ट के मिलें। आधी अंग्रेजी आधी हिंदी व उर्दू लव्ज़ बोलकर अपनी भाषा खराब न करें जैसे;- हैप्पी-दीवाली” या दीवाली-मुबारक.. हो बगेराह-बगेराह
सौहार्दपूर्ण मुद्रा में खुश होकर अपने सभी मिलने वालों को “शुभ-दीपावली” बोल दें यही काफ़ी है।
किसी उत्कोच से क्यों..? सभी को हिर्दय से न मिलें।
ये भी क्या परम्पराएँ हम शुरू कर बैठे कि, तुम मेरे यहाँ आना तो गिफ्ट लेते आना और मैं आऊंगा तो आपके घर से गिफ्ट लेता.. जाऊंगा। वाह रे!..वाह! असन्तुलित-इंसान! ये दोहरा आचरण.. कहाँ से सीखा..?
इस त्योहार पर हर वर्ष बड़ी-बड़ी कंपनियां चांदी काटती हैं और मध्यम वर्ग है कि, डिब्बों के रेट उलट-पलट कर देख रहा होता है.. कि, किस दोस्त को क्या देना है, कौन सा रिश्तेदार कितनी हैसियत का है। कोई दोस्त महंगा गिफ्ट देता है तो उसको गिफ्ट भी महंगा ही वापिस करना होगा और कोई हल्का दोस्त तो गिफ्ट भी हल्का दे दो। और कभी कभी तो पिछले वर्षो के गिफ्ट ही दे देते हे।
हर त्योहार पर 10 या 15 दिन पूर्व से एक योजनाबद्ध तरीके से टी.वी. या व्हाट्सएप आदि के माध्यम से पूरे देश में आम जनता के दिमांग को अपने रिमोट से घुमाने का माहौल बना दिया जाता है,
मेरे ख़्याल से आज के दौर में चल रहे विज्ञापनों के पैटर्न को यदि रीड करें ..तो क्या आपको नहीं लगता..? कि, हम टी.वी.के सामने नहीं लोगों को इडियट बनाने वाले किसी “इडियट-बॉक्स” के सामने बैठे हैं। और सारा मीडिया आपको ये बताने पर लगा है कि, कितना-कितना सामान कहाँ- कहाँ बेचा जा रहा है।
ये खबरें नहीं है दोस्तों ! ये आपका दिमाग घुमाने की साजिश है..वो ऐसा माहौल तैयार कर देते हैं कि, आपको लगे सारी दुनिया लगी-पड़ी है सामान खरीदने.. में, सिर्फ आप ही रह गए पीछे..
न केवल “प्रबुद्ध-वर्ग” से वल्कि मेरा तो सभी के लिए परामर्श है कि, त्यौहार पर. इस “विचार” पर काम करेंगे तो दीवाली की आड़ में लोगों का दीवाला निकलने से बच सकता है..👍
इस साल दोस्ती और प्यार को सेलिब्रेट करें….
बड़े-बुजुर्गों के आचरण से एक-दूसरे के प्रति “मुहब्बत या सिला-रहमी” जो हर-पल झलकती थी..हम रोजाना नहीं तो, कम से कम खुले दिल से उसे इस त्यौहार पर सेलिब्रेट करें..? और अपने रोजमर्रा के आचरण में लाने का संकल्प लें..एवं कुछ छोटे छोटे गिफ्ट्स जैसे; बिस्कुट ,लड्डू, फ्रूटी, मोमबती हो सके तो कपडे…इत्यादि उन गरीब बच्चों में जरूर बांटे जो आपको आते-जाते टुकर-टुकर देखते रहते हैं..त्यौहार पर आपसे अपने लिए कुछ रहम की उम्मीद जो पाले हैं।
मेरे ख़्याल से सच्ची “दिवाली” तो यही होगी। वरना, ये त्यौहार पर हर वर्ष आम-आदमी का “दिवाला” तो निकाल ही दिया जाता है…
भाइयो! बदलो समाज को, लाओ नए विचार।शुरु करो कुछ ऐसा…जो है जन-जन की पुकार।। 👍
; योगेन्द्र पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻