151-“बाप-बेटी”

🙏 बाप और बेटी👨‍👧🙏

बेटी की विदाई के वक्त बाप सबसे आखिरी में ही क्यों रोता है..?

चलिए आज इस विषय पर विस्तार से बात करते हैं.. बाकी सब तो उस माहौल में.. भावुक होकर रो देते हैं,

पर माँ-बाप उस बेटी के बचपन से विदाई तक बीते हुए हर एक पल को याद कर-करके हिर्दय की गहराइयों से रोते हैं..

एक और बात..

माँ बेटी के रिश्तों पर तो बात बहुत होती है,

पर “बाप और बेटी” का रिश्ता भी बहुत गहरा होता है.. समुद्र से भी कहीं अधिक गहरा..

आज इसी को फ़ोकस करके मैं,अपने विचारों को एक ‘लेख’ की शक्ल देने का प्रयास कर रहा हूँ..

आपने अक्सर देखा होगा, हर बाप अपने बेटे को डराता है, ..धमकाता है..और, कभी-कभी तो पीट भी देता है।

पर वही बाप अपनी बेटी की हर गलती को झूठ-मूठ की नकली दादागिरी दिखाते हुए.. उसकी माँ के विश्वास पर अक्सर नजर अंदाज कर देता है।

बेटे ने कुछ मांगा तो मना देगा.. पर बेटी ने धीरे से भी कुछ कहा होगा, तो बाप वो भी सुन लेता है, और जेब में कुछ हो न हो पर बाप सदैव बेटी की इच्छा पूरी करने का हर सम्भव प्रयास करता है।

मेरे ख़्याल से “बाप” शब्द को यदि परिभाषित किया जाय तो,.. शायद कुछ यूँ कहा जायेगा..कि, “दुनिया उस बाप का सब कुछ लूट ले तो भी वो हार नहीं मानता, मग़र बेटी की आंख के आंसू देखकर.. भले ही अंदर से बिखर जाए..लेकिन फिर भी उसकी खुशियों के लिए जी..जान लगा दे..मेरे ख्याल से वही ‘बेटी का बाप’ होता है।”

बेटी भी जब तक मायके में होती है, तो उसकी हर बात में बाप का घमंड झलकता है। वो बात-बात पर किसी को क्या.. अपने भाई तक को तपाक से बोल देती है..”पापा को आने दे फिर बताती हूँ.. तुझे!”

बेटी घर में रहती तो, माँ के आंचल में है, पर बेटी की हिम्मत सदैव बाप ही होता है।

बेटी की जब शादी में विदाई होती है तब वो सबसे मिलकर रोती तो है, पर जैसे ही विदाई के वक्त बाप की ओर देखती है, तो वह अपने आपको रोक नहीं पाती.. लिपट जाती है बाप के सीने से और बाप को ऐसा कस के पकड़ती है.. जैसे ; आमतौर पर माँ अपने बेटों को पकड़े रहती हैं।

क्योंकि उस बच्ची को पता है ये बाप ही है, जिसके दम पर मैने अपनी हर जिद पूरी की है। खैर.. बाप खुद रोता है..परन्तु बेटी की पीठ थप थपा कर उसे हिम्मत भी देता है, कि ये दुनियाँ की रीति है.. मग़र बेटा ! मैं दो-चार दिन बाद आऊँगा.. और तुम्हें लिवा लाउँगा। दिल छोटा क्यों करते हो।

और फिर वो अपनी मासूम-बिटिया की याद में अपने ज़ज़वात रोक नहीं पाता..घर के किसी कोने में जाकर रो.. ही देता है, उस वक़्त सिर्फ एक बेटी का बाप ही समझ सकता है कि, उसकी हालत क्या होती है..अपनी स्थिति वो बेटी की माँ को भी शेयर नहीं कर पाता।

वरना, एक मर्द कमज़ोर पड़ जायेगा।

जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में न केवल हक़ से आती है,वल्कि बड़ी शान से आती है। और घर में किसी भी बात के लिए ज़िद कर लेती है.. और कोई कुछ कहे भी तो डट के बोल भी देती है कि, मेरे बाप का घर है, तो मेरा भी घर है।

लेकिन बाप मर जाता है.. तब बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि अब बेटी आ गई है। और वो बेटी उस दिन लगभग अपनी हिम्मत हार सी जाती है। वह अब उसी माइके में खुद को पराया महसूस करने लग जाती है।

क्योंकि उसकी हिम्मत बाप के जाने से बहुत कमजोर पड़ जाती हैं..

ध्यान दीजियेगा बाप की मौत के बाद वही बेटी किसी चीज़ के लिए कभी अपने भाई के घर जिद नही करती है, वह खुद को काफ़ी रूपांतरित कर लेती है। जो मिला खा लिया, जो दिया ले लिया..शायद बाप के बिना उस घर में एक खालीपन सा औरों की अपेक्षा उसे कहीं अधिक खलता है.. !

क्योंकि जब तक उसका बाप था, तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है। आगे लिखने की मेरी हिम्मत नही है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि, हर माँ-बाप के लिए बच्चे उनकी जिंदगी होते हैं, पर बाप की असल जान.. बेटी में ही होती है।

भले ही वो कभी ऐसा बोल नहीं पाता, मग़र ये सच है। और उसी तरह बेटी के लिए ‘बाप’ दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और उसका घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है। इसीलिए ये रिश्ता न केवल बहुत अजीब है..अपितु पूरी तरह से ‘फीलिंग-बेस्ड’ है।

वास्तव में “बाप-बेटी” का प्रेम व स्नेह समुद्र से भी कहीं अधिक गहराई लिए हुए होता है।

ये लेख सभी प्यारी बेटियों और उनके पिताओं को समर्पित है..👍

; पचहरा, योगेंद्र सिंह

नीमगाँव, राया,मथुरा।🙏🙏👨‍👧👩‍👧🙏🙏

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