139-“फ्यूज-बल्व”

आप भी विचार-कीजियेगा ================== हाथरस में (अलीगढ़-आगरा बाई-पास पर नॉएडा पैटर्न पर बनी गेट-बन्द) पॉश कॉलोनी, वसुन्धरापुरम जिसमें मेरा भी घर है..उसमें अभी-अभी.. कुछ हफ्ते दस-दिन पूर्व एक बड़े आईएएस अफसर रहने के लिए आए हुए हैं..जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं।‌

ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान परेशान से रोज शाम को मेरे घर के सामने वाले पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को बहुत ही तिरस्कार भरी नज़रों से देखते.. और कई दिन तक तो किसी से बात तक नहीं करते थे।

आख़िर एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठ ही गए..और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे.. लेकिन उनकी वार्ता का विषय वही था –

“मैं इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं, मजबूरी में रहने आ गया हूं। वरना! मुझे तो दिल्ली में ही बसना चाहिए था और वो बुजुर्ग बड़े शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। उनकी अहम भरी बातों से परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाते हुए कहा कि, महोदय! आपने कभी “फ्यूज-बल्ब” देखे हैं..? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है। लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं। ये है‌ कि नहीं..? फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में मजबूरन सिर‌ हिला कर जब सहमति दी, तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति विल्कुल उस फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌। हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌।

मैं इस सिविल-सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे। सामने से सिंह-साहब आ रहे हैं वे सेना में ब्रिगेडियर थे। मिस्टर मेहरा जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को स्वयं कभी नहीं बताई, मुझे भी नहीं पर मैं, उम्र दराज हूँ,तो उन सबके सम्पर्क में आने के बाद उनकी बातों से भांप लिया हूँ।

एक और बात कहूँ..सारे फ्यूज़ बल्ब करीब-करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट का हो। कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं। जैसे; उगते सूरज को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। मग़र डूबते सूरज की कोई पूजा करते देखा है क्या..?

कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते..चलो ना भूलो लेकिन जिस समाज के लिए कुछ सराहनीय किया नहीं उसे किस हक से अहम दिखाते हैं..?

ऐसे लोग अपने घर के आगे‌ नेम प्लेट लगाते‌ हैं – रिटायर्ड आइएएस‌/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज‌ आदि – आदि। अब ये‌ रिटायर्ड IAS/IPS/PCS/तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/अध्यापक कौन-सी पोस्ट होती है भई..? ज़रा हमें भी बताओ..

माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या? अब इस बात के कोई मायने नहीं होते, बल्कि इस बात के कुछ मायने अवश्य होते हैं कि, पद पर रहते हुए.. आप इंसान कैसे‌ थे…आपने‌ कितनी जिन्दगियों को छुआ…आपने आम लोगों के हालातों को कितना महसूस किया, और फिर उन्हें कितनी तवज्जो दी…समाज को क्या दिया…कितने लोगों की मदद की…अभी वर्तमान में पद पर रहते हुए कभी किसी को घमंड आये तो बस आप भी याद कर लीजिएगा कि, एक दिन सबको “फ्यूज” होना ही है।

ये उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद उन्हें समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अरे भई! अभी भी वक्त है इस लेख को पढ़िए और चिंतन करिए तथा आपके द्वारा समाज का जो भी संभव हो सके उसका हित करिए तथा सभी को एक नेक शिक्षा मिल सके इसलिए आप भी इसे आगे फारवर्ड अवश्य करिये । धन्यवाद……👍 राधे गोविंद राधे गोविंद युग, पचहरा, 88A वसुन्धरापुरम, हाथरस

2 thoughts on “139-“फ्यूज-बल्व””

Leave a reply to Yogendra Singh Pachahara Cancel reply