‘लड़की’ यानी ‘नारी-शक्ति’ जिस पर हर घर-परिवार का प्रबंध-तंत्र निर्भर होता है। घर के बहू-बेटों का आपसी सामंजस्य ठीक है। तो ऐसा कहा जाता है कि, सब ठीक है वरना कदम-कदम पर नजरें..नीची होती हैं।
जब युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करके शादी के बाद ‘गृहस्थ-जीवन’ में कदम रखते हैं, तो उनके लिए वह एक नया परिवेश होता है या फिर यूं समझलें कि, एक प्रकार से उनका नई कक्षा में प्रवेश होने जैसा है..
विशेषकर बेटियों के लिए.. अब ये आवश्यक नहीं कि, उनके मायके वाले घर की तरह बिस्तर पर ही चाय या कॉफी मिले, जब चाहे तब सोए या जब चाहे तब जगें..
ये आवश्यक नहीं, जैसा घर में अपने जन्म देने वाले पिता का स्वभाव था, वैसे ही नए घर वाले पापा अर्थात ससुर जी का स्वभाव भी हो। औऱ जैसा मम्मी का था वैसा ही सासु माँ का भी हो..?
तो इस नई क्लास में उन्हें आवश्यकता होती है सभी रिश्तों के साथ सामंजस्य बैठाने की, अर्थात एडजस्ट करने वाले ‘जीवन-मूल्यों’ को अमल में लाने की, क्योंकि एकैडमिक डिग्रियां तो ऑफिसियल होती हैं।
भारतीय-संस्कृति’ में ‘गृहस्थ-जीवन’ के लिए व्यवहारिक तौर पर..संस्कार.. “धीरज,नम्रता,सहनशीलता,मधुरता और सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए ..मुस्कराकर चलने की कला जैसे ‘जीवन-मूल्य’ बेहद जरूरी हैं।”
लेकिन विडम्बना इस बात की है कि, अध्ययन-काल के समय खुशहाल-जीवन के लिए इन आवश्यक विषयों को हमारे शिक्षण-संस्थानों में व कुछ अति आधुनिक परिवारों में फ़ोकस ही नहीं किया जाता। वहां तो बस यही वातावरण बनाया हुआ है कि किसी भी तरह कागजी डिग्रियां हासिल कर लो तो तुम्हें एक अच्छा पति या अच्छी पत्नी मिल सकती है। और यदि सौभाग्यवश कहीं मैरिट-सैरिट चली तो नौकरी भी हो जाएगी..
लेकिन शादी के बाद कुछ समझदार लड़के या लड़कियां बहुत जल्द ये समझ जाते हैं कि अपने रिश्तों के साथ अच्छे से सामंजस्य बैठाने के लिए उन कागजी डिग्रियों को साइड में रखकर ‘संस्कार व जीवन-मूल्यों’ को अधिक तरज़ीह देनी होगी। ऐसा करने से वे अपने जीवन में वाँछनीय ऊंचाइयों को छूने के साथ-साथ न केवल अपने दोनों कुलों की शान बनकर वल्कि भारतीय-समाज के लिए भी एक सुख-शांति से भरा हुआ आदर्श-जीवन जीने की एक प्रेरणादायक ‘मिसाल’ कायम कर जाते हैं।
मग़र कुछ अड़ियल स्वभाव के युवक-युवती संस्कार व जीवन मूल्यों को इग्नोर करके अपना जीवन अंधकारमय बना लेते हैं। क्योंकि वे किसी ग़लत-फ़हमी या किसी रिश्ते आदि से ग़लत निर्देशन मिलते रहने के कारण परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने के बजाय तोड़-फोड़ वाले मार्ग पर चल पड़ते हैं। अर्थात ‘पथ-भ्रष्ट’ हो जाते हैं। वे हिम्मत हारे हुए नाकाम लोगों की तरह कायरता पूर्ण निर्णय लेकर अपनी जीवन-लीला समाप्त करने..या कभी-कभी धमकियाँ दे दे कर जीवन की गाड़ी को खींचने की नाकाम कोशिश में अपनी उन्नति करने की अवस्था को यूँ ही जाया कर देते हैं..
जबकि आप ध्यान दीजियेगा कि, पुराने समय में परिवार के बड़े बुजुर्ग भले ही ऑन पेपर बहुत पढ़े-लिखे नहीं होते थे.. लेकिन ‘अनुशासन’ नाम के पाठ को उन्होंने अपने जीवन में दिल से अपनाया होता था.. जो कि.. किसी देश,समाज,संस्था,परिवार या फिर व्यक्ति को हर स्तर पर सम्मान के साथ खड़े रहने के लिए नितान्त आवश्यक है।
इसके लिए “डिसिप्लिन इज द बैक बॉन” को अच्छे से अमल में लाना होगा।
संस्कारों का ये बेस ही था.. जो पुराने समय में बहू-बेटे बड़े बुजुर्गों का बुढ़ापे तक केवल सम्मान ही नहीं करते थे,अपितु पूरे मन से उनकी आख़िरी सांस तक ठीक से सेवा करते रहने को अपना धर्म मानते थे।
जो मूल्यों की गिरावट के कारण आज रेयर हो गया है। तभी बढ़े चिंतिंत मन से आज किसी के भी द्वारा अक्सर कह दिया जाता है कि..
इस क्षेत्र में आज युवाओं की उदासीनता को देखते हुए.. एजुकेशन के मुद्दे पर बड़ी आसानी से “डिग्रीज..हैव नो रिचुअलस.. कह दिया जाता है। जो विचारणीय है…👍
युग,पचहरा,
नीमगाँव, राया,मथुरा।